भारत के नए संसद भवन का उद्घाटन रविवार को किया जाएगा. इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐतिहासिक रूप से अहम 'सेंगोल' की स्थापना करेंगे. इसे एक निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक माना जाता है. सेंगोल को राजा महाराजाओं के समय से सत्ता हस्तांतरण के वक्त इस्तेमाल किया जाता था. इसका भारत के एक प्रतापी राजा से खास कनेक्शन है. ये वही राजा हैं, जिन्होंने एशिया की सबसे बड़ी नौसेना बनाई थी.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे लेकर कहा है, 'इस पवित्र सेंगोल को किसी संग्रहालय में रखना अनुचित है. सेंगोल की स्थापना के लिए संसद भवन से अधिक उपयुक्त, पवित्र और उचित स्थान कोई हो ही नहीं सकता. इसलिए जब संसद भवन देश को समर्पण होगा, उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी जी बड़ी विनम्रता के साथ तमिलनाडु से आए, अधीनम से सेंगोल को स्वीकार करेंगे.'
किस राजा से है कनेक्शन?
सेंगोल को हिंदी में राजदंड कहा जाता है. इसका इस्तेमाल चोल साम्राज्य से होता आ रहा है. जब इस साम्राज्य का कोई राजा अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता था, तो उसे सत्ता हस्तांतरण के रूप में सेंगोल देता था. सेंगोल देने की परंपरा चोल साम्राज्य से ही चली आ रही है. तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक माना जाता है. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि मौर्य और गुप्त वंश में भी सेंगोल का इस्तेमाल हुआ करता था. चोल साम्राज्य के मशहूर शासक राजाराज चोल और उनके बेटे राजेंद्र चोल रहे हैं.
चोल साम्राज्य का इतिहास क्या है?
चोल वंश का इतिहास काफी बड़ा है, इसलिए इसे चार भागों में बांटा गया है. इस दक्षिण भारतीय राजवंश को लेकर कहा जाता है कि यह न केवल भारत बल्कि दुनिया में सबसे लंबे दौर तक चले राजवंशों में से एक है. इनका राज 2000 साल तक चला. इसकी शुरुआत गुमनाम है, लेकिन मध्यक्रम यानी तीसरा भाग, सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. तब ही इसे साम्राज्य का दर्जा मिला था. ये मदुरै से शुरू हुआ. मध्यक्रम में इसका इतना विस्तार हुआ कि भारत के आसपास के देशों पर भी नियंत्रण हासिल हो गया.
पहला दौर
शुरुआती चोल शासक मुख्य रूप से एक क्षेत्र पर राज करते थे. इसे आज के समय में तमिलनाडु कहते हैं. चोल शासकों से जुड़ी सबसे पहली जानकारी 2300 साल पहले मिलती है. यहां तक कि संगम साहित्य में भी इसका जिक्र है. साथ ही सम्राट अशोक के शिलालेख संख्या 13 में भी. हालांकि पहले दौर में इसे साम्राज्य का दर्जा नहीं मिला था.
पहले दौर में 300 ईसा पूर्व से 200 ईसवी तक चोल राजाओं के नाम और दूसरे साक्ष्य मिले हैं. तमिल साहित्य से लेकर कांस्य पट्टिकाओं तक में इस कालखंड के 15 से अधिक चोल राजाओं के नाम हैं.
दूसरा दौर
इतिहासकारों ने इस वंश का दूसरा दौर 200 ईसवी से 800 ईसवी तक को निर्धारित किया है. इसे चोल राजवंश का अज्ञात काल भी कहते हैं. यानी इस वक्त से जुड़ी ज्यादा जानकारी नहीं है. तब चोल वंश दबा हुआ था. इसके पीछे की वजह में माना जाता है कि तब दक्षिण में पल्लव और पांड्या राजवंशों का प्रभुत्व बढ़ गया था. यानी उन्होंने अपना प्रचार प्रसार अधिक कर लिया था. तभी चोलों से जुड़ी कोई जानकारी सामने नहीं आ पाई.
तीसरा दौर
ये दौर 848 ईसवी से लेकर 1070 ईसवी तक चला. इसी दौर में साम्राज्य का सबसे अधिक विस्तार हुआ. इस चरण में चोल वंश के दो सबसे बहादुर और पराक्रमी राजा थे. इनमें पहले राजा राजाराज-I चोल थे, यानी पोन्नियिन सेल्वन और दूसरे उनके बेटे राजेंद्र चोल-प्रथम थे.
तीसरे दौर यानी मध्यकालीन चोल शासन की स्थापना 848 ईसवी में हुई थी. इसे स्थापित करने वाले चोल राजा विजयालय थे. उन्हें ही कई बार चोल वंश का संस्थापक कहा जाता है. उनके बाद जो राजा आए, यानी सुंदर चोल के वक्त, उन राजाओं ने पांड्या, पल्लव, राष्ट्रकूट और चेर शासकों से कई युद्ध लड़े. इन्हीं युद्धों में लगातार जीत मिलने के बाद चोल शासकों ने एक बड़ा दक्षिण भारतीय क्षेत्र चोल साम्राज्य के अधीन कर लिया था. इनकी राजधानी तंजौर बनी. जिसे आज तंजावुर कहा जाता है. यह तमिलनाडु में है.
985 ईसवी में राजाराज चोल राजा बने थे. उन्होंने पल्लव, पांड्या, चालुक्य और चेर राजाओं के कई और क्षेत्रों को जीतकर चोल साम्राज्य में शामिल कर लिया. इन्हीं राजा के शासन काल में चोल साम्राज्य का विस्तार दूसरे देशों तक हुआ. सबसे पहले उन्होंने सीलोन (सिंघल राज्य जिसे आज श्रीलंका बोलते हैं) पर आक्रमण किया था. इस पर जीत भी दर्ज की.
1014 ईसवी में राजाराज के बेटे राजेंद्र चोल राजा बने और जो क्षेत्र उनके पिता ने जीते, उन्होंने उसके उत्तर में विस्तार किया. उन्होंने ओडिशा और बंगाल के कई क्षेत्र जीते. उन्होंने वापस आकर दक्षिण भारत में कृष्णा नदी पर एक नगर की स्थापना की और इसे गंगईकोंडाचोलपुरम नाम दिया. मतलब कि गंगा पार कर उसके आगे के राजाओं को हराना. बंगाल की खाड़ी का नाम चोल झील रख दिया. इस साम्राज्य की सेना उस वक्त एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी नौसेना थी.
राजेंद्र चोल ने अपनी इसी मजबूत नौसेना के बल पर समुद्री प्रांतों के आसपास के स्थान अपने शासन में शामिल कर लिए. इनमें मालदीव, श्रीलंका, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर जैसे तमाम देश शामिल थे. साथ ही चीन के साथ भी व्यापार होता था. इसके लिए बाकायदा राजेंद्र चोल ने अपने राजनयिक चीन भेजे थे. उन्होंने वहां अपने दूतावास तक बनाए.
इसी समय में राजाओं ने ढेरों मंदिर बनवाए. भारतीय संस्कृति दूर दूर तक फैली. मंदिरों के जरिए कल्याणकारी कार्य कराए जाते थे. इंडोनेशिया तक में ऐसे मंदिर हैं, जो चोल राजाओं ने बनवाए थे.
हुआ ये था कि पांड्या और पल्लव आपस में लड़ रहे थे. बीच में चोल राजा आए और पल्लवों की मदद की. पांड्याओं को हराया. इससे पल्लव खुश हो गए और विस्तार करने की छूट दे दी. बस तभी 848 ईसवी में इस राजवंश की स्थापना हो गई.
चौथा दौर
चोल साम्राज्य का चौथा और आखिरी दौर 11वीं से 13वीं सदी के बीच रहा. फिर धीरे धीरे इस साम्राज्य का पतन होने लगा. राजाराज यानी पोन्नियिन सेल्वन और राजेंद्र चोल के बाद विराराजेंद्र (1063-1067 ईसवी), अथीराजेंद्र (1067-1070 ईसवी) और कुलोट्टुंगा I (1070-1122 ईसवी) आए. ये ज्यादा खास नहीं रहे. इनके बाद आए राजेंद्र-III. ये आखिरी चोल शासक थे. इन्हें जटावर्मन् सुंदरपांड्य-II ने हरा दिया था.
आसान भाषा में बात करें, तो सबसे पहले पांड्याओं को चोलों ने हराया. फिर चोलों को पांड्याओं ने हराया. और फिर पांड्याओं को मलिक कफूर ने हरा दिया. जो अकाउद्दीन खिलजी का कमांडर था. मुगल शासक तब दक्षिण भारत तक पहुंच गए थे.