
राजस्थान के धौलपुर जिले में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की अनूठी मिसाल जिले के एक दंपत्ति ने पेश की हैं जो जिलेवासियों के लिए प्रेरणादायक बन गई है. जिले के रहने वाले एक प्रतिष्ठित परिवार की यह कहानी जितनी मार्मिक है, उतनी ही प्रेरणादायक भी है.
धौलपुर के एक जाने-माने डॉक्टर के घर पर बेटी के जन्म पर बहुत धूमधाम से खुशियां मनाई गई लेकिन धीरे-धीरे यह खुशियां तब काफूर हो गई जब बेटी के बढ़ने के साथ ही पता चला कि बेटी दिव्यांग है. दरअसल बच्ची मंद बुद्धि और मूक बधिर थी. डॉक्टर राधेश्याम गर्ग और उनकी पत्नी मधु गर्ग ने इसे ईश्वर की नियति मानकर स्वीकार कर लिया और यहां से शुरू हुई डॉक्टर दंपति की अग्नि परीक्षा.
उन्होंने बेटी के इलाज के लिए उसे देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया. बेटी को लेकर वो एक शहर से दूसरे शहर तक चक्कर लगाते रहे. डाक्टर राधेश्याम गर्ग और मधु गर्ग ने बेटी की शिक्षा और परवरिश के लिए धौलपुर के आस-पास के जिलों में विशेष मंद बुद्धि विद्यालय या रिहेबिलेशन सेंटर की तलाश शुरू की लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी.
इसके बाद बेटी मयूरी को दंपति ने हैदराबाद के विशेष स्कूल में प्रवेश दिलाया. डॉक्टर राधेश्याम गर्ग ने सोचा कि जितना पैसा हम हैदराबाद में खर्च कर रहे हैं, उस पैसों से जिले में ही विशेष स्कूल खोला जा सकता हैं और चालीस बच्चों को पढ़ाया जा सकता है.
मयूरी के माता-पिता मधु गर्ग और डॉक्टर राधेश्याम गर्ग ने सोचा कि धौलपुर जिले और उसके आस-पास के कितने लोग होंगे, जिन्हें हमारी जैसी संतान हुई होगी. वो भी हमारी तरह ही परेशान हो रहे होंगे क्यों ना एक विशेष मंद बुद्धि स्कूल खोला जाए जिसमें हमारी बेटी के साथ-साथ और अन्य लोग भी अपने बच्चों को जीवन की मुख्यधारा से जोड़ सके.
इस संकल्प के साथ ही वर्ष 2000 में डॉक्टर राधेश्याम गर्ग और मधु गर्ग ने मानसिक और निशक्त बच्चों के लिए मयूरी विशेष विद्यालय की नींव रखी. शुरुआत में उनकी बेटी सहित विद्यालय में मात्र 6 ही बच्चे थे. वर्ष 2004 में निनुआराम चैरिटेबल पब्लिक वेलफेयर सोसायटी के अन्तर्गत मूक बधिर विद्यालय की स्थापना की. मूक बधिर, मंद बुद्धि बच्चों की परवरिश और पुनर्वास का अभियान को 6 बच्चों से शुरू हुआ था, वह आज कारवां बनता जा रहा है और 318 बच्चों को जीवन मुख्य धारा से जोड़ चुका है.
विद्यालय में बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए कई तरह की वोकेशनल एजुकेशन के साथ जीवन की हर परिस्थिति में खड़े रहने की भी ट्रेनिंग दी जा रही है. धौलपुर के आसपास के क्षेत्र में यह अपनी तरह का इकलौता विद्यालय है जिसमें मंद बुद्धि और मूक बधिर बच्चों का पुनर्वास हो रहा है.
डॉक्टर राधेश्याम गर्ग और मधु गर्ग इस विद्यालय को और भी बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं. दोनों के इस निस्वार्थ भाव से किए जा रहे कार्य को लेकर स्कूल को दो राज्य स्तरीय और सात जिला स्तर पर अवार्ड भी मिले हैं. स्कूल द्वारा 17 नेत्र शिविर लगाए हैं जिसमें दो हजार से अधिक लोगों के सफल ऑपरेशन किये गए और सात दिव्यांग शिविर लगा डेढ़ हजार से अधिक लोगों को उपकरण प्रदान किये हैं.
जिले के मयूरी विशेष विद्यालय में मूक बधिर बच्चों के लिए कक्षा पहली से आठवीं तक की शिक्षा दी जाती हैं और मंद बुद्धि बच्चों को प्री प्राइमरी, प्राइमरी और सेकेंडरी तक शिक्षा दी जाती है. जो बच्चे वोकेशनल में सिलाई, पेंटिंग, फैब्रिक्स सीखना चाहते हैं उन्हें सिखाया जाता है. इस विद्यालय के बच्चे अब जयपुर, करौली सहित अन्य बड़े शहर में आगामी कक्षाओं में पढ़ रहे हैं.