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सरिस्का में फिर सुनाई देने लगी बाघों की दहाड़

विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली के उत्तर पूर्वी हिस्से में 866 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले देश-विदेश में खासी पहचान वाले राजस्थान के अलवर स्थित सरिस्का अभयारण्य एक बार फिर बाघों की दहाड़ से गूंजने लगा है.

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विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली के उत्तर पूर्वी हिस्से में 866 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले देश-विदेश में खासी पहचान वाले राजस्थान के अलवर स्थित सरिस्का अभयारण्य एक बार फिर बाघों की दहाड़ से गूंजने लगा है.

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कुछ साल पहले वनविभाग की सुस्ती और अवैध शिकार के कारण यह अभ्‍यारण्य बाघ विहिन हो चुका था. लेकिन केन्द्र एवं राज्य सरकार की पहल से सरिस्का अभ्‍यारण्य के एक बार फिर बाघों से आबाद होने की शुरूआत कुछ महिनों से शुरू हो गयी है.

राजस्थान के वन राज्य मंत्री राम लाल जाट के अनुसार अभ्‍यारण्‍य को बाघों से फिर से आबाद करने के लिये कुछ समय पहले सवाई माधोपुर स्थित राष्ट्रीय रणथम्भौर अभ्‍यारण्‍य से एक के बाद एक तीन बाघों का पुनर्वास किया गया था. उन्होंने बताया कि 20 जुलाई को एक बाघ और फिर 28 जुलाई को एक बाघिन को रणथम्भौर से स्थानान्तरित किया गया है. {mospagebreak}

उन्होंने कहा कि लम्बे चौडे क्षेत्रफल, घने जंगल की वजह से सरिस्का बाघों के लिये अनुकूल अभयारण्य है. जाट के अनुसार सरिस्का में बाघों के पुर्नवास से आने वाले सालों में बाघों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद बढ़ी है जबकि पूरा विश्व बाघों की आबादी घटने के संकट से जूझ रहा है. वन विभाग सूत्रों के अनुसार वर्ष 2005 में राजस्थान में बाघों की संख्या मात्र 26 थी, जो अब बढ़कर 44 हो गई है. इसमें रणथम्भौर में 39 और सरिस्का में पुनर्वास किए पांच बाघ शामिल हैं.

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उन्होंने बताया कि रणथम्भौर में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ ही बड़ी समस्या अब यह होने लगी है कि वहां का क्षेत्रफल बाघों के लिए कम पड़ने लगा है. सूत्रों के अनुसार मौजूदा समय रणथम्भौर में करीब 282 वर्ग किलोमीटर मुख्य क्षेत्र ही बाघों के लिए बचा है. रणथम्भौर अभ्‍यारण्‍य में 1112 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र घोषित किया गया है जिसमें इंसानों की आबादी भी रहती है.

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने बफर क्षेत्र से लोगों को स्थानांतरित करने के प्रयास भी इधर निरंतर किए है परन्तु अभी भी बहुत से लोग अपना स्थान छोड़ने के लिए राजी नहीं है. उन्होंने बताया कि राज्य सरकार के प्रयासों के से तैतीस परिवारों को स्थानांतरित किया जा चुका है. इससे वहां साठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाघों के लिए खाली हो गया है परन्तु इस दिशा में अभी और प्रयास किए जाने हैं. {mospagebreak}

हालांकि स्वैच्छिक रूप से लोगों को बाघ संरक्षित क्षेत्र से स्थानांतरित करने के लिए सरकार ने 102 करोड़ रूपये मंजूर किए हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्री ने कहा कि बाघ संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों को वनों के संरक्षण में भागीदारी देने पर जोर दिया जा रहा है ताकि बाघों को संरक्षित किया जा सके. इसमें लोगों की भागीदारी जरूरी है. बाघ संरक्षण के लिए जरूरी है कि बाघों के प्राकृतिक वास और मुख्य शिकारगाहों को बचाया जाए. पारिस्थितिकी संतुलन के लिए भी बाघों को होना जरूरी है.

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वन विभाग के एक आला अधिकारी ने कहा कि रणथम्भौर अभ्‍यारण्‍य इलाके में रह रहे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का लगातार आग्रह किया जा रहा है उनसे बातचीत की जा रही है. अभ्‍यारण्‍य क्षेत्र में रहने वाले लोगों को विचार कर इस इलाके को छोड़ने का फैसला करना चाहिए ताकि आने वाले समय बाघ उनके लिए खतरा नहीं बने और उनका जीवन सुरक्षित रहे.

अधिकारी का कहना है कि शिकारी इन लोगों को बहकावे में लेकर अपने मकसद को पूरा करने की कोशिश में रहते है लेकिन अब कड़े सुरक्षा प्रबंध और कडाई के कारण शिकारियों के नापाक इरादे पूरे नहीं होंगे. उन्होने रणथम्भौर में पिछले दिनों बाघ द्वारा दो लोगों को मार देने पर कहा कि अवैध रूप से अभ्‍यारण्‍य इलाके में घुसने वालों को आगाह करने के बावजूद चोरी छिपे जाने के कारण यह स्थिति बनी है.

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