कानपुर में अग्निहोत्र नगर स्थित अग्नि मंदिर में अग्निहोत्र जयंती का आयोजन किया गया. जिसमें महामृत्युंजय यज्ञ और सामूहिक अग्निहोत्र किया गया. इस दौरान सैंकड़ों भक्तों ने पूजा अर्चना कर वेदों के अनुसार हवन में सूर्य अस्त के दौरान आहुति दी गई. 22 फरवरी 1963 को शुरू किया गया अग्निहोत्र यज्ञ अभियान शहर ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैल चुका है.
बताया जा रहा है कि अग्निहोत्र यज्ञ को लेकर कई रिसर्च हुए हैं, जिनकी रिपोर्ट के बाद साधक जुड़ते चले गए. अग्निहोत्र परिवार से अब लाखों लोग जुड़ चुके हैं. गुरुवार को विश्वभर में लाखों साधक परिवारों ने अपने घरों में अकेले या सामूहिक हवन किया. अग्निहोत्र वेदों में बताई हुई एक हवन पद्धति है, जो सूर्योदय और सूर्यास्त पर होती है.
अग्निहोत्र यज्ञ पर हो चुकी हैं कई रिसर्च
इसकी शुरुआत सबसे पहले भोपाल स्थित माधव आश्रम में माधव पोतदार 'साहब' के द्वारा की गई. अग्निहोत्र हवन करने के लिए तांबे या मिट्टी के पात्र की आवश्यकता होती है. यह पात्र पिरामिड के आकार का होता है. जिसमें गाय के गोबर से बने हुए कंडे को रखे जाते हैं और उसमें साबुत चावल के साथ गाय का शुद्ध घी मिलाकर आहुति डाली जाती है.
कैसे होती है अग्निहोत्र कृषि?
अग्निहोत्र हवन करने के बाद जो राख (भस्म) बचती है, उसका इस्तेमाल खेती करने के लिए किया जाता है. खेत में अग्निहोत्र हवन करने से शुद्ध वातावरण का घनत्व बढ़ता है. जिससे फसल में अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं. इस पद्धति में बोनी से कटनी तक खेत में अग्निहोत्र करना होता है.