
लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी में भी हर दल अपने समीकरण सेट करने में जुटा है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को जीत की हैट्रिक लगाने से कैसे रोका जाए? इसे लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियां नए-नए सियासी कॉम्बिनेशन की तलाश में हैं तो बीजेपी भी अपनी रणनीति बदलकर पिछले चुनाव नतीजे दोहराने की कोशिश में जुटी है.
लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सीटों वाले यूपी में बीजेपी ने मोदी मित्र नाम से अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत बीजेपी ने सूबे के 65 लोकसभा क्षेत्रों में मोदी मित्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस अभियान की शुरुआत देवबंद में 150 मुस्लिम बुद्धिजीवियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित करीब 150 लोगों को मोदी मित्र का सर्टिफिकेट देकर हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद से ही हाशिए पर चल रहा मुस्लिम वर्ग बीजेपी के इस कदम के बाद अब यूपी की सियासत के केंद्र में आ गया है.
सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र के देवबंद से बीजेपी का अभियान शुरू करना, हार्डकोर हिंदुत्व की राजनीति से मुस्लिमों पर भी फोकस शिफ्ट करना किस ओर इशारा करता है? इसे लेकर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद गोस्वामी कहते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सभी विपक्षी दलों को मुस्लिम तुष्टिकरण की काट के दांव से चित्त कर दिया था. 2017 के चुनाव में भी बीजेपी का ये दांव सफल रहा. बीजेपी ने यूपी में प्रचंड जीत के साथ सरकार बना ली. नतीजा ये हुआ कि तुष्टिकरण का आरोप न लग जाए, इस डर से विपक्षी दलों ने मुसलमानों से दूरी बना ली.
2019 के चुनाव में सपा के टिकट पर तीन और बसपा के टिकट पर तीन मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. अब, जब सपा ने एनडीए को हराने के लिए पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का फॉर्मूला दे दिया है. 2019 के नतीजों से उत्साहित मायावती दलित-मुस्लिम समीकरण में बसपा का भविष्य तलाश रही हैं. कांग्रेस भी पुराने बेस वोटर दलित और अल्पसंख्यक के साथ ही पिछड़ों को जोड़ने के लिए मंडल स्तर पर अभियान चला रही है. तब बीजेपी का खुद उसी ग्राउंड में उतर जाना वक्त की जरूरत भी थी.
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कहते हैं कि हर चीज का चरम स्तर होता है. सियासत में इस चरम को दो तरीके से देख सकते हैं. एक राजनीतिक पार्टी के प्रदर्शन और दूसरा किसी एक तरह की राजनीति का. बीजेपी की हार्डकोर हिंदुत्व की राजनीति का ये एक तरह से चरम है. पार्टी के थिंक टैंक को शायद ये लग गया है कि हार्डकोर हिंदुत्व की पॉलिटिक्स से जितना लिया जा सकता था, उतना ले लिया. अब अधिक लेना संभव नहीं और इसीलिए पार्टी ने अपनी रणनीति बदल ली है.
एंटी मुस्लिम इमेज से बाहर निकलने की कोशिश
अशोक इसे बीजेपी की एंटी मुस्लिम इमेज से भी जोड़ते हैं. वे कहते हैं कि साल 2014 के चुनाव से पहले और बाद की बीजेपी को देखें, 2019 के चुनाव के बाद की बीजेपी को देखें तो बहुत फर्क नजर आता है. वे कहते हैं कि 2014 के चुनाव से पहले मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर मुस्लिम तुष्टिकरण की पॉलिटिक्स के खिलाफ मजबूत विकल्प के रूप में सामने आए नरेंद्र मोदी बाद में सबका साथ, सबका विकास के साथ सबका विश्वास की बात करने लगे. तभी ये साफ हो गया था कि बीजेपी की कोशिश अब एंटी मुस्लिम इमेज से बाहर आने की होगी. मोदी मित्र बनाने की कवायद बीजेपी की ओर से उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है.
नया वोटर वर्ग तैयार करने की कवायद
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं कि बीजेपी किसी भी वजह से वोट का नुकसान होने की स्थिति में उसकी भरपाई के लिए नया बेस तैयार रखना चाहती है. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 42 फीसदी वोट मिले थे और पार्टी ने 80 में से 71 सीटें जीती थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर बढ़कर 49 फीसदी के पार पहुंच गया लेकिन सीटें 9 घट गईं. अमिताभ तिवारी कहते हैं कि बीजेपी की बदली रणनीति के पीछे ये आंकड़े भी एक वजह हो सकते हैं.
अमिताभ तिवारी समझाते हैं कि वोट शेयर बढ़ने के बावजूद सीटें घटना लोकसभा सीट के स्तर पर वोटों का बड़ा गैप दिखाता है. बीजेपी कहीं बहुत बड़े अंतर से जीत गई तो कहीं कम अंतर से हार गई. बीजेपी का फोकस इसी वजह से मुस्लिम वोट पर शिफ्ट हो रहा है. बीजेपी के मोदी मित्र अभियान का फोकस जिन 65 सीटों पर है, वहां करीब 30 फीसदी के आसपास मुस्लिम वोटर्स हैं.
यूपी में नए समीकरण गढ़ने की कोशिश
बीजेपी नेतृत्व का फोकस मुसलमानों में पसमांदा पर है. अमिताभ तिवारी कहते हैं कि पसमांदा को टारगेट करने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं. पहला ये कि पसमांदा पिछड़ा वर्ग में आते हैं और दूसरा सरकार की योजनाओं का लाभ मुसलमानों में सबसे अधिक इन्हें ही मिला है. वे कहते हैं कि 2022 के यूपी चुनाव के बाद योगी मंत्रिमंडल में एकमात्र मुस्लिम चेहरे के रूप में दानिश अंसारी को जगह दी गई थी. दानिश पसमांदा समाज से ही आते हैं. 2022 में दानिश को मंत्री बनाए जाने के साथ ही ये साफ हो गया था कि बीजेपी में पसमांदा को लेकर कुछ तो चल रहा है जो अब सामने आ गया है.
अमिताभ तिवारी कहते हैं कि कर्नाटक के चुनाव में दलित-मुस्लिम समीकरण के सफल प्रयोग के बाद कांग्रेस जमीन पर उतरकर यूपी में भी एक नया समीकरण गढ़ने की कोशिश में है. सपा और बसपा के बाद बीजेपी भी समीकरणों की इस लड़ाई में कूद गई है. हालांकि, मुस्लिम वोट की राजनीति में बीजेपी किस तरह और कितनी जगह बना पाती है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.