उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव में रामपुर की स्वार टांडा सीट से अपना दल के शफीक अंसारी की जीत हो गई है. बीजेपी गठबंधन से अपना दल के शफीक अंसारी ने समाजवादी पार्टी की अनुराधा चौहान को 9734 वोट के अंतर से हरा दिया है. इस चुनाव में अपना दल के शफीक को 67434 वोट मिले और अनुराधा को 57710 वोट हासिल हुए. इसी जीत के साथ भाजपा गठबंधन ने आजम खान का मजबूत किला ध्वस्त कर दिया है.
अपने बेटे की सीट को बचाने के लिए आजम खान की ओर से खेला गया हिंदू कार्ड भी उपचुनाव में विफल साबित हुआ. स्वार की जनता ने आजम परिवार को छोड़ इस बार अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) पार्टी को जिताया. बता दें कि अनुप्रिया केंद्र की मोदी सरकार में वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री हैं. बीजेपी से गठबंधन के बाद स्वार सीट अपना दल (S) के हिस्से में आई थी. इस सीट पर फतह हासिल करके आजम के आखिरी किले को भी ढहा दिया गया है.
क्यों हुआ था उपचुनाव?
दरअसल,15 साल पहले 29 जनवरी 2008 को छजलैट पुलिस ने पूर्व मंत्री आजम खान की कार को चेकिंग के लिए रोका था. तब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा किया था. इस हंगामे में आजम के बेटे अब्दुल्ला समेत 9 लोगों को आरोपी बनाया गया था. पुलिस ने इस मामले में हंगामा करने वाले सभी लोगों पर सरकारी काम में बाधा डालने और भीड़ को उकसाने के आरोप में केस दर्ज किया था. मामले में अब्दुल्ला को दो साल की सजा हुई, ऐसे में उनकी विधायकी भी हाथ से फिसल गई. जिसके बाद उन्हें यूपी विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया था और चुनाव आयोग ने उनकी सीट को रिक्त घोषित कर उपचुनाव करवाए थे. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार, अब्दुल्ला अपनी सजा के बाद अगले छह साल तक चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे.
आजम खान का सियासी खेल खत्म
अब कह सकते हैं कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने आजम खां का सियासी खेल पूरी तरह से खत्म कर दिया है. क्योंकि इससे पहले रामपुर लोकसभा सीट के बाद विधानसभा क्षेत्र में भी बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रही थी. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सूबे में यह आजम के सियासी युग का अंत है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही आजम खान की मुश्किलें ऐसी बढ़ीं कि उन्हें जेल और अदालतों के चक्कर ही नहीं लगाने पड़े, बल्कि अपनी विधानसभा सदस्यता भी गंवानी पड़ गई. हेट स्पीच मामले में आजम को कोर्ट ने 3 साल की सजा सुनाई, इसके बाद उनकी विधायकी रद्द कर दी गई. इसके बाद रामपुर विधानसभा सीट पर चुनाव कराया गया जिसमें वह अपने उम्मीदवार को जीत नहीं दिला सके. रामपुर में बीजेपी के आकाश सक्सेना ने 34 हजार मतों से जीत दर्ज की थी.
रामपुर में मिला पहला झटका
बता दें कि रामपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव में 131116 वोट पड़े थे. इसमें बीजेपी प्रत्याशी आकाश सक्सेना को 81371 वोट मिले, जबकि सपा उम्मीदवार आसिम रजा को 47271 वोट मिले हैं. इस तरह से आकाश सक्सेना 34136 वोटों ने जीत हासिल करने में कामयाब रहे. इसी के साथ मुस्लिम बहुल रामपुर विधानसभा सीट पर पहली बार BJP ने कमल खिलाया और पहली बार हिंदू समुदाय की विधायक भी बना दिया. आजम खान और सपा की मुस्लिम सियासत के लिए रामपुर की हार किसी बड़े झटके से कम नहीं थी.
10 बार विधायक रहे आजम
आजम खान पिछले 45 साल से रामपुर विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ते आ रहे थे. 10 बार आजम खुद विधायक रहे और एक बार उनकी पत्नी तंजीन फातिमा उपचुनाव में जीती थीं. रामपुर उपचुनाव में इस बार भले आजम खां खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे, लेकिन अपने सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर आसिम रजा को पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा रहे थे. आसिम रजा को जून में हुए रामपुर लोकसभा चुनाव में भी आजम खां ने लड़ाया था, लेकिन जीत नहीं सके थे. इसके बाद विधानसभा सीट पर भी प्रत्याशी बना दिया था. लेकिन हार से तगड़ा झटका मिला.
आजम खान का सियासी सफर
आजादी के तीन चुनाव बीत जाने के बाद रामपुर की सियासत में नवाब परिवार ने कदम रखा. रामपुर के नवाबों ने कांग्रेस को अपने लिए मुफीद समझा. रामपुर के नवाब रहे जुल्फिकार अली खान उर्फ मिकी मियां साल 1967 में रामपुर से संसद में पहुंचे. मिकी मियां का रामपुर में उस समय जलवा ऐसा था कि कोई भी शख्स उनके खिलाफ एक शब्द भी बोलकर नहीं निकल सकता था. लेकिन आपातकाल के बाद हालात बदल गए. मामूली हैसियत वाले टाइपराइटर मुमताज का बेटा आजम खां जेल से जेल से छूटकर अपने शहर रामपुर लौटा और नवाब परिवार के लिए चुनौती बन गया.
1977 में लड़ा पहला चुनाव
आजम खां रामपुर से निकलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में वकालत पढ़ने गए जहां उन्हें सियासत रास आने लगी. वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ सेक्रेटरी बन गए. इसी दौरान आपातकाल के खिलाफ आजम खान सड़क पर उतर गए, जिसके बाद उन्हें जेल में 19 महीने बिताने पड़े. आजम जेल से आते ही 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ गए, लेकिन सामने थे कांग्रेस के मंजूर अली खान उर्फ शन्नू मियां. सियासत में आजम कच्चे थे और पैसा भी नहीं था. ऐसे में वो चुनाव हार गए, लेकिन हौसला नहीं छोड़ा.
जब आजम पहली बार विधायक बने
साल 1980 में रामपुर विधानसभा सीट से फिर आजम खान ने किस्मत आजमाई और जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद फिर आजम ने पलटकर नहीं देखा और लगातार जीतते रहे. धीरे-धीरे वह सूबे में मुस्लिम सियासत का चेहरा बन गए. वो अपने परिवार को भी राजनीति में ले आए. आजम खान की पत्नी सांसद-विधायक बनीं और बेटा विधानसभा पहुंचा. सत्ता में रहते हुए आजम ने अपने कई विरोधी पैदा कर लिए, जो उनके लिए मुसीबत का सबब बने.
2017 के बाद आजम के शुरू हुए बुरे दिन
यूपी में सियासत ने 2017 के चुनाव में करवट ली. बीजेपी सत्ता में आई और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही आजम खां पर संकट के बदल मंडराने लगे. एक के बाद एक मुकदमे उनके खिलाफ कायम होते गए, जिसमें कुछ मामले में वो बरी हो गए हैं, लेकिन 2019 के हेट स्पीच मामले में तीन साल की सजा हो गई. अदालत से सजायाफ्ता होने के चलते आजम खान खुद तो चुनाव नहीं ही लड़ सकते थे, उनसे वोट डालने का आधिकार भी छिन गया.इस तरह से विपरीत परिस्थितियों में आजम खां खुद की न तो सियासत बचा पाए और न ही रामपुर के दुर्ग को सुरक्षित रख पाए.
बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी
रामपुर उपचुनाव में आसिम रजा को सपा प्रत्याशी बनाया तो आजम खां के तमाम मजबूत सिपहसालार साथ छोड़कर बीजेपी के खेमे में चले गए. आजम के विरोधी पहले से ही बीजेपी खेमे में मजबूती से खड़े थे. लोकसभा के बाद विधानसभा क्षेत्र में भी कमल खिलाने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक रखी थी. सीएम योगी से लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक सहित बीजेपी के तमाम दिग्गज नेता डेरा जमाए हुए थे. सुरेश खन्ना, जितिन प्रसाद और दानिश रजा अंसारी रामपुर में कैंप कर रहे थे.
10 बार की जीती हुई सीट गंवा दी थी
वहीं, रामपुर में आजम खान अकेले आसिम रजा को जिताने के लिए मशक्कत कर रहे थे. चुनाव के आखिरी वक्त में सपा प्रमुख अखिलेश यादव और दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने रामपुर में पहुंचकर आजम खान का हौसला बढ़ाया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. सपा ने मुस्लिम वोटों के साथ-साथ दलित समुदाय को भी साधने की कवायद की, लेकिन बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह को आजम खान तोड़ नहीं सके और अपनी परंपरागत व 10 बार की जीती हुई सीट गंवा दी. बीजेपी से आकाश सक्सेना ने विधायक बनकर इतिहास रच दिया था.
9 साल चुनाव नहीं लड़ पाएंगे आजम खान
आजम खां को हेट स्पीच मामले में तीन साल की अदालत से सजा मिल चुकी है, जिसके चलते वो अब 9 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. आजम खान न तो 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ पाएंगे और न ही 2027 का विधानसभा चुनाव. सब ठीक रहा तो वह 2031 में चुनाव लड़ पाएंगे. आजम खान 74 साल के हो चुके हैं और 2031 में 83 साल के हो जाएंगे. इस तरह अगले 9 सालों में सियासत भी काफी बदल जाएगी. आजम उम्र के साथ-साथ तमाम बीमारियों से जूझ रहे हैं. इस तरह से आजम की सियासी सफर का यह अंत ही माना जा रहा है.