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यूपी में बसपा ने कैसे किया बेड़ा गर्क? BJP और INDIA ब्लॉक दोनों के वोट काटे और खुद 'जीरो' सीट पर पहुंच गई

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली हार के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या मायावती के वोटों में बिखराव होना और उनका 'इंडिया' गठबंधन की तरफ शिफ्ट होना इसकी वजह है? या फिर बसपा ने दोनों को नुकसान पहुंचाया और खुद सबसे ज्यादा नुकसान में चली गई? आइए समझते हैं... 

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बसपा चीफ मायावती
बसपा चीफ मायावती

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका दिया है, जहां सबसे ज्यादा जीतने की उम्मीदें थी पार्टी वहीं सबसे ज्यादा नुकसान में चली गई. नतीजा ये हुआ कि बीजेपी को अपने बलबूते पूर्ण बहुमत नहीं मिला. लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या बहन जी यानी मायावती के वोटों में बिखराव होना और उनका 'इंडिया' गठबंधन की तरफ शिफ्ट होना इसकी वजह है? या फिर बसपा ने दोनों को नुकसान पहुंचाया और खुद सबसे ज्यादा नुकसान में चली गई? आइए समझते हैं... 

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दरअसल, बसपा के वोटों के बिखराव ने 'इंडिया' गठबंधन को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया. जबकि, दर्जनभर से ज्यादा सीटों पर बीजेपी को भी इसका फायदा मिला. बीजेपी+ की जीती हुई 33 सीटों में 16 सीटें ऐसी हैं, जहां बसपा को मिले वोट बीजेपी के 'इंडिया' गठबंधन पर जीत के मार्जिन से ज्यादा है. ऐसे में कई सियासी जानकार कह रहे हैं कि इन सीटों पर बसपा के वोटों की वजह से ही बीजेपी की जीत हुई है. अगर यहां बसपा के वोट कम हो जाते तो यूपी में बीजेपी 20 सीट के नीचे चली आती. 

हालांकि, 23 सीटें ऐसी भी मानी जा रही हैं जहां बसपा ने अच्छे वोट हासिल किए जिससे 'इंडिया' गठबंधन को नुकसान हुआ. लेकिन यह वो सीटें हैं जहां पर बसपा हमेशा से मजबूत रही है. बसपा जहां अपने वोटों के बिखराव को रोकने में थोड़ा भी सफल रही वहां बीजेपी जीती है. ऐसी 23 सीटें है, जैसे- बुलंदशहर, मथुरा, हाथरस, शाहजहांपुर, मिश्रिख, हरदोई, उन्नाव, फर्रुखाबाद, अकबरपुर, कैसरगंज, भदोही, बहराइच, डुमरियागंज, महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया और बांसगांव जहां बसपा अपना अच्छा खासा वोट बैंक बचाने में सफल रही. जिसकी वजह से बीजेपी मामूली वोटों से ही सही लेकिन वह 'इंडिया' गठबंधन पर भारी पड़ी. जबकि, दूसरी तरफ बसपा प्रत्याशी जहां कम वोट पाए या फिर उनका बिखराव ज्यादा हुआ वह सीटें 'इंडिया' गठबंधन को चली गई. 

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माना जा रहा है कि इटावा, धौरहरा, खीरी, एटा, संभल, मोहनलालगंज, हमीरपुर, जालौन, सुल्तानपुर, बांदा, फतेहपुर, लालगंज, अंबेडकर नगर, जौनपुर, मछली शहर, सलेमपुर, गाजीपुर, चंदौली और घोसी जैसी सीटों पर बसपा अपना परंपरागत वोट नहीं बचा पाई और इनका एक बड़ा हिस्सा 'इंडिया' गठबंधन की तरफ शिफ्ट कर गया. कहीं कांग्रेस को तो कहीं समाजवादी पार्टी को, जिसकी वजह से बीजेपी इन सीटों को हार गई. 

दरअसल, 2019 में जिन 42 सीटों पर बसपा नहीं लड़ी थी वहां दलितों ने ज्यादातर बीजेपी को वोट किया था. लेकिन इस बार मायावती की पार्टी  के लड़ने से बसपा को मिले वोटों ने बीजेपी का नुकसान कर दिया. 2019 में मुजफ्फरनगर में बसपा ने अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था लेकिन इस बार संजीव बालियान के खिलाफ लड़ रहे हरेंद्र मलिक को बसपा के दारा सिंह प्रजापति के लड़ने का फायदा मिला. बसपा उम्मीदवार 1 लाख 43 हजार वोट पाए और संजीव बालियान 24 हजार वोटों से हार गए.  

वहीं, बदायूं में पिछली बार ज्यादातर दलित वोट बीजेपी के साथ गया था क्योंकि बसपा का यहां उम्मीदवार नहीं था लेकिन बसपा ने इस बार मुस्लिम खान को टिकट दिया. 97000 से ज्यादा वोट बसपा को मिला और बीजेपी के दुर्विजय सिंह शाक्य लगभग 35 हज़ार वोट से चुनाव हार गए. यह दो सीटें तो बानगी हैं, ऐसी 22 सीटों पर बीजेपी को हार मिली है जहां पिछली बार बसपा के नहीं होने का फायदा बीजेपी को मिला था. 

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2022 के चुनाव के मुकाबले लगभग तीन फीसदी बसपा को कम वोट मिले और इस तीन फीसदी में सबसे ज्यादा वोट 'इंडिया' गठबंधन को शिफ्ट हुए हैं. बसपा के लिए अपने वोटों को रोकना आज सबसे बड़ी चुनौती है. नगीना जैसी सीट पर बसपा को महज साढे 13 हज़ार वोट मिले, जहां से मायावती ने अपनी सियासत की शुरुआत की थी. जबकि, वहीं से चंद्रशेखर आजाद इस बार चमके हैं और और बसपा से 5 लाख ज्यादा वोट लेकर जीते हैं. 

हालांकि, मायावती को लगता है कि उनका अपना कोर वोटर आज भी उनके साथ है लेकिन मुसलमान को टिकट देने का उन्हें कोई फायदा नहीं मिला, उल्टे नुकसान हो गया. क्योंकि, मुसलमान ने टिकट मिलने के बावजूद बसपा को वोट नहीं किया. मायावती ने नतीजे के बाद जारी किए अपने प्रेस रिलीज इस बात को लिखा है और भविष्य की ओर इशारा करते हुए कहा है कि आगे से मुसलमान को राजनीतिक भागीदारी देने में वह ज्यादा सतर्क रहेंगी. 

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