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क्यों इस बार मायावती की उपचुनाव में एंट्री यूपी की 10 सीटों पर डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकती है? 5 Points में समझिए

यूपी की 10 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. उपचुनाव के लिए चुनाव कार्यक्रम का ऐलान भी नहीं हुआ है और सियासी तापमान बढ़ गया है. उपचुनावों से अक्सर दूरी बनाने वाली मायावती की अगुवाई वाली बसपा की एंट्री क्या इस बार यूपी की 10 सीटों पर डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकती है?

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बसपा प्रमुख मायावती (फाइल फोटो)
बसपा प्रमुख मायावती (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश की 10 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं. उपचुनाव के लिए चुनाव कार्यक्रम का ऐलान अभी हुआ नहीं है और सूबे का सियासी पारा चढ़ने लगा है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने कमान संभाल रखी है. उपचुनाव वाली कई सीटों पर सीएम योगी की जनसभाएं भी हो चुकी हैं. वहीं, समाजवादी पार्टी भी चुनावी तैयारियों में जुटी है.

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बीजेपी और सपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके इन उपचुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. मायावती की अगुवाई वाली बसपा कानपुर की सीसामऊ, अयोध्या की मिल्कीपुर समेत कई सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम का ऐलान भी कर चुकी है. बसपा हालिया लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमट गई थी. ऐसे में सवाल है कि उपचुनावों से अक्सर दूरी बनाने वाली मायावती के हाथी की चाल उपचुनाव के नतीजे कितना प्रभावित कर पाएगी और पार्टी कैसे 10 सीटों पर डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकती है? इसे चार पॉइंट्स में समझा जा सकता है.

1- जीतने से ज्यादा वजूद के लिए

बसपा इस बार के उपचुनाव में खाली हाथ मैदान में उतर रही है. जिन 10 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से कोई भी सीट पार्टी के पास नहीं थी. बसपा 'खोने के लिए कुछ नहीं, जीतने के लिए 10 सीटें' के फॉर्मूले के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है. ये उपचुनाव जिस तरह से सपा-बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं, वैसी स्थिति बसपा के साथ नहीं है . बसपा के लिए ये उपचुनाव जीत से ज्यादा वजूद की लड़ाई माने जा रहे हैं. 

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2- जीत से ज्यादा टैग हटाना लक्ष्य

बसपा हालिया लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमटी और वोट शेयर गिरकर सिंगल डिजिट में आ गया तो उसके पीछे प्रमुख वजह बीजेपी की बी टीम वाले टैग को बताया गया. उपचुनाव से दूरी बनाने वाली पार्टी चुनाव कार्यक्रम के ऐलान से पहले ही मैदान में उतरने का ऐलान कर चुकी है तो उसके पीछे ये टैग हटाने की कोशिश भी प्रमुख वजह बताई जा रही है.

3- NDA और I.N.D.I.A दोनों के लिए खतरा

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि हालिया लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद बसपा सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी इंडिया ब्लॉक, दोनों ही के लिए खतरा साबित हो सकती हैं. बसपा उपचुनाव जरूर लड़ रही है लेकिन मुकाबला बीजेपी-सपा का ही. मायावती की पार्टी की भूमिका ठोको पॉलिटिक्स वाली हो सकती है. बसपा उपचुनाव में कुछ सीटों पर बीजेपी को नुकसान पहुंचाएगी तो कुछ सीटों पर सपा को भी. उसके लिए जाटव तक सीमित हो गए अपने वोट बेस को दलित-मुस्लिम के पुराने शेप में लाने के लिए यही जरूरी है और यही वजह है कि मायावती लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद कभी बीजेपी तो कभी सपा पर हमलावर नजर आ रही हैं.

4- बीजेपी-सपा का जातीय गणित

बसपा के उपचुनाव में मैदान में आ जाने से अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले का डी यानि दलित वोट का नुकसान सपा को उठाना पड़ सकता है. बसपा की सोशल इंजीनियरिंग बीजेपी और सपा, दोनों ही दलों का जातीय समीकरण डिस्टर्ब कर सकती है. हालिया लोकसभा चुनाव में भी ऐसा देखने को मिला जहां बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की वजह से दोनों ही गठबंधनों को दर्जनभर से अधिक सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था.

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5- त्रिकोणीय लड़ाई में खतरे के साथ संभावनाएं भी

बसपा की एंट्री से उपचुनाव की सीधी लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है. ऐसे में सपा और बीजेपी, दोनों ही दलों के लिए खतरे के साथ संभावनाएं भी बन सकती हैं. जो भी पार्टी अपना वोटबैंक एकजुट रखने में सफल रही, उसके जीतने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी. यानि उपचुनाव में कहां किसको जीत मिलती है, ये एक हद तक बसपा के प्रदर्शन पर भी निर्भर करेगा. बसपा किस सीट पर बीजेपी और सपा में से किसे डेंट करती है, उस सीट का नतीजा तय करने में ये भी एक डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकता है.

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किन सीटों पर होने हैं उपचुनाव

उत्तर प्रदेश की जिन 10 सीटों पर उपचुनाव होना है, उनमें से पांच सीटों पर एनडीए और पांच सीटों पर सपा के विधायक थे. सूबे की फूलपुर, खैर, गाजियाबाद, मझवां, मीरापुर, मिल्कीपुर, करहल, कटेहरी और कुंदरकी के विधायक इस बार लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन गए हैं. लोकसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद विधायकों के इस्तीफे से रिक्त हुई इन सीटों के साथ ही कानपुर की सीसामऊ सीट दसवीं सीट है. सीसामऊ से 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के इरफान सोलंकी जीते थे. आपराधिक मामले की वजह से सोलंकी की सदस्यता रद्द हो गई थी.

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