पूर्व विधायक और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी (Mukhtar Ansari) अब इस दुनिया में नहीं रहा. गुरुवार को यूपी की बांदा जेल में बंद मुख्तार की तबीयत बिगड़ जाने के बाद उसे बांदा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गई. मुख्तार साल 2005 से यानी पिछले 19 साल से जेल में बंद था. मगर, क्या आपको पता है कि इस बाहुबली की हत्या की प्लानिंग भी हुई थी.
जी हां, बाहुबली मुख्तार अंसारी को साल 2015 में जेल से पेशी पर ले जाने के दौरान जान से मारने की साजिश रची गई थी. वो भी ऐसे-वैसे नहीं बल्कि बम से उड़ाकर और इस काम के लिए बिहार के एक गुंडे से संपर्क किया गया. इसका नाम था लंबू शर्मा, जिसको 6 करोड़ रुपये की सुपारी दी गई. बम बनाने में माहिर लंबू को 50 लाख रुपये एडवांस मिलने थे और वह इसी काम को अंजाम देने के लिए बिहार की जेल से भाग निकला था. इसके बाद पेशी के दौरान मुख्तार अंसारी को बम से उड़ाने का प्लान था.
फरारी के लिए किया था मानव बम का इस्तेमाल
मुख्तार की हत्या के लिए लंबू शर्मा का जेल से बाहर निकलना जरूरी था. इसके लिए उसने खतरनाक प्लान बनाया. आरा जेल से पेशी के लिए जब लंबू को कोर्ट में लाया गया, तो उसे फरार कराने के लिए मानव बम का इस्तेमाल किया था. बम लेकर आई महिला नगीना देवी ने विस्फोट कर दिया.
इसमें सिपाही अमित कुमार शहीद हो गए और नगीना की भी मौत हो गई. बम के धमाके की वजह से 15 लोग जख्मी हो गए थे. इस बीच मची अफरा-तफरी का फायदा उठाकर लंबू शर्मा फरार हो गया था. यह संभवतः पहला मामला था, जब किसी अपराधी ने पेशी के दौरान फरार होने के लिए मानव बम का देश में इस्तेमाल किया हो.
हालांकि, कुछ महीने बाद लंबू शर्मा को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में उसने पुलिस को बताया कि वो यूपी के माफिया मुख्तार अंसारी को मारने के लिए जेल से फरार हुआ था. इस तरह से मुख्तार की हत्या का प्लान कभी अंजाम तक नहीं पहुंच सका. तत्कालीन अपर जिला और सत्र न्यायाधीश (तृतीय) त्रिभुवन यादव ने बम विस्फोट कांड की सुनवाई के दौरान 20 अगस्त 2019 को लंबू शर्मा को फांसी की सजा सुनाई थी.
लंबू ने 12 साल की उम्र में की थी पहली हत्या
बताया जाता है कि भोजपुर जिले के पीरो के रहने वाले लंबू शर्मा ने 12 साल की उम्र में पहला मर्डर किया था. वजह, लंबू जिस लड़की से प्यार करता था, उसे एक और शख्स भी चाहता था. इसका पता चलने पर लंबू ने उसकी हत्या कर दी. वारदात के वक्त नाबालिग होने की वजह से उसे कम सजा हुई. बाल सुधार गृह में कुछ दिन रहने के बाद वह फरार हो गया. दोबारा पकड़े जाने पर न्यायिक हिरासत से भाग निकला. जानकार बताते हैं कि उसने जेल में ही बम बनाना सीखा था.
मुख्तार को तिहाड़ में मिला जुर्म की दुनिया का ‘ज्ञान’
अब बात करते हैं यूपी के बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी की. उसे भी अपनी जरायम की दुनिया का ज्ञान जेल में ही मिला था. कहा जाता है कि मुख्तार को जेल से कभी गुरेज नहीं रहा. एक व्यापारी से रंगदारी मांगने के आरोप में उनकी गिरफ्तारी दिल्ली में हुई थी. इसके बाद उसे तिहाड़ जेल में रखा गया. वहां मुख्तार की मुलाकात सुभाष ठाकुर से हुई, जिन्हें बाबा कहा जाता है. जानकारों का कहना है कि वहां से उन्हें नया दर्शन मिला कि केवल बाहुबल से कुछ नहीं होगा. सत्ता की हनक साथ होनी चाहिए, वर्ना एक हवलदार भी जिस दिन अपनी पर आ जाएगा, तो फाटक के दरवाजे पर नोटिस चस्पा कर देगा.
जेल सबसे मुफीद जगह, बशर्ते…
तिहाड़ में ही मुख्तार को यह ज्ञान भी मिला कि जरायम से जुड़े लोगों की जिंदगी जुदा होती है. जेल में नए साथी मिलते हैं, जो जरूरत पड़ने पर काम आते हैं. जो जबान के लिए जान दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं. मुख्तार को तिहाड़ से ही यह ज्ञान भी मिला कि जब दबाव ज्यादा हो, तो जेल सबसे मुफीद जगह है. बशर्ते अपनी शर्तों पर रहने की आजादी मिले. इसलिए मुख्तार ने कभी जेल से परहेज नहीं किया. अपनी जिंदगी का लंबा अरसा मुख्तार ने जेल में ही बिताया. वह साल 2005 से जेल में बंद था.
घर जैसी थी गाजीपुर जेल
गाजीपुर जेल तो मुख्तार के लिए घर जैसी थी. बाकी जिन जेलों में मुख्तार रहे, वहां उनके पहुंचने के पहले कारिंदे पहुंच गए. जेल के आस-पास के इलाके में ये लोग ठिकाना बना लेते थे. किराए पर घर ले लेते थे. जेल में उनका आना-जाना और मिलना-जुलना जारी रहता था. धंधे की सारी खबरें समय पर मुख्तार को मिलती रहती हैं. ताजी मछलियां खाने के लिए मुख्तार ने बांदा की जेल में तालाब भी खुदवा लिया था. शाम को जेल के अंदर बाकायदा दरबार लगता था. जिले के बड़े-बड़े अधिकारी मुख्तार अंसारी के साथ बैडमिंटन खेलने आते थे.