
देश में अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं और उससे पहले मुस्लिम वोट को लेकर सियासत तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ रिश्तों में तल्खी के बीच यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने बड़ा बयान दिया है. अजय राय ने कांग्रेस को मुसलमानों का हितैषी बताते हुए कहा है कि हमें पूरा विश्वास है कि मुसलमान लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करेंगे.
अजय राय ने ये बयान बाराबंकी जिले के देवा में हाजी वारिस अली शाह की दरगाह का दौरा करने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए दिया. अजय राय इससे पहले जेल में बंद सपा नेता आजम खान से मिलने सीतापुर भी पहुंच गए थे. वह अलग बात है कि अजय राय की आजम से मुलाकात नहीं हो पाई. इससे पहले यूपी के ही अमरोहा से बसपा के सांसद कुंवर दानिश अली को लेकर संसद में जब बीजेपी के रमेश विधुड़ी ने अपशब्दों का इस्तेमाल किया था, तब अगले ही दिन पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी उनसे मिलने पहुंच गए थे.
राहुल गांधी के बाद अजय राय ने भी दानिश से मुलाकात की थी. दानिश से मुलाकात के बाद अजय राय का जेल में बंद आजम से मिलने जाना और अब मुस्लिम मतदाताओं के साथ का विश्वास, क्या ये महज संयोग है या यूपी कांग्रेस अध्यक्ष का जड़ों की ओर लौटने का इशारा?
दरअसल, मुस्लिम कभी कांग्रेस का मजबूत वोट बेस हुआ करता था. कांग्रेस कमजोर होती चली गई और मुस्लिम मतदाता भी धीरे-धीरे दूसरी पार्टियों की ओर शिफ्ट होते चले गए. यूपी में सपा मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत पैठ बनाने में सफल रही. बसपा और आरएलडी जैसी पार्टियां भी मुस्लिम वोट में थोड़ी बहुत भागीदारी रखती रही है.
मुस्लिमों का वोटिंग पैटर्न क्या रहा है?
मुस्लिम मतदाताओं के वोटिंग का मिजाज समझने के लिए पिछले कुछ चुनावों का वोटिंग पैटर्न समझना जरूरी है. लोकसभा चुनाव की बात करें तो इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया के ओपिनियन पोल के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी के 73 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने सपा और बसपा के महागठबंधन को वोट किया था. कांग्रेस को 14 और बीजेपी को 11 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे.नतीजों में कांग्रेस महज एक सीट पर सिमट गई और सपा-बसपा गठबंधन 15 सीटें जीतने में सफल रहा.
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साल 2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो 58 फीसदी मुसलमानों ने सपा को वोट दिया था. कांग्रेस को 11, बसपा को 18 और बीजेपी को 10 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे. लेकिन इसके उलट 2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस यूपी की 80 में से 21 सीटें जीतकर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी, तब उसे 25 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे. 30 फीसदी मुसलमानों ने सपा और 18 फीसदी ने बसपा के पक्ष में मतदान किया था.
विधानसभा चुनाव की बात करें तो 2022 के यूपी चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर सपा का समर्थन किया. इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सूबे के 83 फीसदी मुस्लिमों ने सपा, 8 फीसदी ने बीजेपी और तीन-तीन फीसदी ने कांग्रेस और बसपा के पक्ष में मतदान किया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में भी सपा को 55 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे.33 फीसदी मुस्लिम वोट के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी जबकि बसपा को 14 और बीजेपी को दो फीसदी वोट मिले थे.
यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में भी मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा सपा और कांग्रेस के बीच बंट गया था. तब 56 फीसदी मुस्लिम वोट सपा-कांग्रेस के साथ गया था.तब पूर्ण बहुमत के साथ सपा सरकार बनाने में सफल रही थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी मुस्लिम मतदाताओं का यही पैटर्न देखने को मिला. 69 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने सपा और कांग्रेस को वोट दिया था.
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कहा तो ये भी जाता है कि मुस्लिम उस दल, उस उम्मीदवार का समर्थन करते हैं जो उन्हें लगता है कि बीजेपी को हरा सकता है. शायद यही वजह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को 51 फीसदी मुस्लिम वोट मिले लेकिन यूपी में तस्वीर पूरी तरह उलट नजर आई.यूपी में कांग्रेस 14 फीसदी मुस्लिम वोट ही पा सकी जबकि सपा-बसपा के महागठबंधन के पक्ष में 73 फीसदी मुस्लिमों ने वोट किया.
यूपी में मुस्लिम वोट की ताकत
आबादी के लिहाज से देखें तो अनुमानों के मुताबिक यूपी में करीब चार करोड़ मुस्लिम हैं. ये आंकड़ा सूबे की कुल आबादी का करीब 20 फीसदी पहुंचता है. रामपुर, अमरोहा, बिजनौर समेत सूबे की 80 में से करीब 65 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 30 फीसदी के आसपास या इससे अधिक है. रामपुर में तो मुस्लिम आबादी 49 फीसदी के करीब है. उपचुनावों में रामपुर लोकसभा और विधानसभा सीट, स्वार विधानसभा सीट, आजमगढ़ लोकसभा सीट से बीजेपी की जीत के बाद सपा की चिंता पहले से ही बढ़ी हुई है. अब अगर कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में सफल रहती है तो पीडीए फॉर्मूले से एनडीए को हराने का दावा कर रही सपा की राह मुश्किल हो सकती है.