Prayagraj Kumbh Mela 2025: प्रयागराज में आस्था के महाकुंभ की शुरुआत होने में अब कुछ ही घंटे बचे हैं. एक तरफ जहां महाकुंभ में स्नान के लिए श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया है, तो वहीं दूसरी तरफ नागा साधुओं ने भी अपनी-अपनी धूनी रमा ली है. लेकिन नागा साधुओं को लेकर लोगों के मन मस्तिष्क में हमेशा कौतूहल बना रहता है. आखिर नागा साधु बनते कैसे हैं और उनकी दिनचर्या क्या होती है? महाकुंभ में हमारी मुलाकात एक ऐसे ही नागा साधु से हुई. जिन्होंने अब तक हजारों की संख्या में नागा साधु बनाए हैं.
हरिद्वार से महाकुंभ प्रयागराज पहुंचे नागा साधु दर्शन गिरी ने बताया कि नागा साधु शिव के गण होते हैं और आदि जगतगुरु शंकराचार्य की सेना होते हैं. यह धर्म की सेवा है और धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं का गठन हुआ है.
उन्होंने बताया कि जिस तरह देश की रक्षा के लिए सेवा का गठन होता है, उसी तरह से धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं का गठन हुआ. तलवार भाला और शस्त्र लेकर लड़ने की क्षमता भी नागा साधुओं के अंदर होती है. अगर धर्म पर खतरा होता है तो नागा साधु लड़ने मरने के लिए हमेशा तैयार रहता है.
जीवित होते हुए भी 'मरा हुआ' होता है नागा
दर्शन गिरी ने बताया कि नागा साधु जीवित होते हुए भी मरा हुआ होता है. क्योंकि वह अपने साथ अपने साथ पीढ़ियों का पिंडदान और तर्पण खुद ही कर चुका होता है.
17 साल से धारण किए हुए हैं भारी मात्रा में रुद्राक्ष
बीस साल पहले नागा साधु बने दर्शन गिरी ने खुद के नागा साधु बनने के रहस्य को साझा करते हुए बताया कि धर्म की रक्षा के लिए इंद्रियों को तोड़ा जाता है. धर्म की रक्षा के लिए संकल्प लिया जाता है और स्वयं को कठोर बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि वह 17 सालों से भारी मात्रा में रुद्राक्ष धारण किए हुए हैं और हर वक्त वह बिना कपड़े के ही रहते हैं.
धूनी क्यों रमाते हैं नागा साधु?
कुंभ में एकत्रित होने के सवाल पर नागा साधु दर्शन गिरी ने कहा, हर 3 साल बाद एक महाकुंभ पड़ता है जो देश के चार शहरों में लगता है और महाकुंभ में धर्म का मिलन होता है, इसीलिए धर्म के मिलन के लिए लोग अलग-अलग हिस्सों से एकत्रित होते हैं. नागा साधुओं के सामने जलने वाली धूनी के संदर्भ में बात करते हुए दर्शन गिरी ने बताया कि यह हमारे अग्नि देवता हैं और हम उनकी हमेशा पूजा करते हैं.
क्या नागा को अपने परिवार की याद आती है?
जब हमने उनसे पूछा कि क्या आपको अपने परिवार की याद आती है? तो जवाब मिला कि जो परिवार को याद करेगा वह साधु नहीं है. जो परिवार का त्याग करके साधु बना, वही नागा साधु होता है. नागा साधुओं का अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं होता है और न ही कोई संबंध होता है.
'घरवालों ने भी हमको ढूंढा होगा'
स्वयं के बारे में दर्शन गिरी ने बताया कि उन्होंने तो बचपन में ही घर छोड़ दिया था और यह स्वाभाविक है कि घर का कोई बच्चा अगर कहीं चला जाए तो माता-पिता ढूंढते ही हैं. हमारे घरवालों ने भी हमको ढूंढा होगा, लेकिन हम नहीं मिले. अब तो बहुत दिन हो गए. लेकिन हमने कोई संपर्क नहीं किया. अब तो हमारे गुरु महाराज ही हमारे माता-पिता हैं. अब तो धर्म के लिए ही जीना है और धर्म के लिए ही मरना है.
12 साल तक ब्रह्मचारी... तब बनते हैं नागा
नागा बनने के रहस्य को साझा करते हुए दर्शन गिरी ने बताया कि नागा बनने से पहले 12 साल तक ब्रह्मचारी की अवस्था में रखा जाता है. क्योंकि अगर उसका मन बदल गया और घर जाने की इच्छा कर ले तो वह वापस जा सकता है. उसे ब्रह्मचारी की दीक्षा दी जाती है ताकि 12 साल में वह नागा साधुओं के रीति-रिवाज और रहन-सहन को सीख ले.
उसके बाद उसे महाकुंभ में धर्म ध्वज के सामने नागा साधु की दीक्षा दी जाती है. ठंडे गंगा जल से स्नान कराया जाता है और उसके बाद इंद्री को झटका देकर तोड़ दिया जाता है. इसके बाद वह व्यक्ति भस्म लगाकर नागा साधुओं में शामिल हो जाता है. यह प्रथा अभी भी चली आ रही है.