उत्तर प्रदेश में विधानसभा से पास हुआ नजूल लैंड बिल विधान पऱिषद से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. अब सरकार दावा कर रही है कि ये सब इसलिए हुआ, क्योंकि कई विधायकों ने नजूल बिल पर सवाल उठाया, लिहाजा सबकी सहमति से ही बिल को विधान परिषद में पेश करने के बाद सेलेक्ट कमेटी को भेज दिया गया. दरअसल, यूपी बीजेपी अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी विधान परिषद सदस्य हैं, इन्होंने ही विधान परिषद में अपनी ही सरकार के विधानसभा से पास नजूल जमीन बिल को सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की थी. उन्होंने कहा था कि सरकार के नजूल बिल को लेकर कई लोगों ने आशंकाएं जातई थीं, भूपेंद्र चौधरी का कहना है कि शंका दूर करने के लिए ही बिल को अभी रोका गया है. इस बिल को लेकर काफी खींचतान मची हुई है. ऐसे में नजूल की जमीन के पीछे के आर्थिक पहलू को समझना भी जरूरी है.
क्या होती है नजूल की जमीन?
आजादी से पहले नजूल भूमि, जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले राजा और रियासतें युद्ध में हार जाती थीं, तो ब्रिटिश सेना उनसे उनकी जमीनें छीन लेती थी, लेकिन जब भारत को आजादी मिली, तो अंग्रेजों ने इन जमीनों पर भी नियंत्रण खो दिया. अब ये जमीनें राजघरानों को वापस नहीं की जा सकती थीं, क्योंकि राजघरानों के पास इन पर अपना स्वामित्व साबित करने के लिए उचित दस्तावेज नहीं थे. लिहाजा इन जमीनों को नजूल भूमि के रूप में चिह्नित किया गया और उनका स्वामित्व संबंधित राज्य सरकारों को सौंप दिया गया.
इन कामों के लिए होता है नजूल भूमि का उपयोग
विभिन्न राज्यों की सरकारें आम तौर पर इन नजूल भूमि का उपयोग सार्वजनिक उद्देश्यों जैसे स्कूल, अस्पताल, ग्राम पंचायत भवन आदि के निर्माण के लिए करती हैं, कई शहरों में, नजूल भूमि के रूप में चिह्नित भूमि के बड़े हिस्से का उपयोग आम तौर पर पट्टे पर हाउसिंग सोसाइटियों के लिए किया जाता है.
क्या है नजूल शब्द का मतलब और ये कहां से आया?
उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि एक प्रकार से भूमि स्वामित्व या काश्तकारी सिस्टम है, जो भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान शुरू हुआ था. बता दें कि "नजूल" शब्द एक अरबी शब्द "नज़ल" से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है "असाइनमेंट" या "आबंटन".
यूपी में कितनी है नजूल भूमि?
उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि आम तौर पर उस भूमि को संदर्भित करती है जो मूल रूप से सरकार या प्रांत के शासक (नवाब) के स्वामित्व में थी या राजस्व संग्रह, प्रशासनिक कर्तव्यों या धार्मिक गतिविधियों जैसे विशिष्ट उद्देश्यों के लिए व्यक्तियों या संस्थाओं को सौंपी या दी गई थी. आज भी उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार या निजी व्यक्तियों/संस्थाओं के पास हो सकता है और इसका प्रबंधन और उपयोग विशिष्ट कानूनों और विनियमों द्वारा किया जाता है. वर्तमान में एक अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश में 25 हज़ार हेक्टेयर से अधिक नजूल भूमि है, जिसे सरकारी अनुदान अधिनियम-1895 और उसके बाद के सरकारी अनुदान अधिनियम-1960 के तहत जारी अनुदान के रूप में विभिन्न निजी व्यक्तियों और निजी संस्थाओं को पट्टे पर दिया गया है.
शहरी क्षेत्रों में इतनी हो सकती है जमीन की कीमत
उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि की कुल कीमत इसके स्थान के आधार पर अलग-अलग हो सकती है. जिलों, शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि की कीमतें काफी अलग होती हैं. दूसरे नंबर पर कृषि, आवासीय, वाणिज्यिक या औद्योगिक उपयोग के रूप में भूमि का उपयोग मूल्य को प्रभावित करता है. साथ ही जमीन के टुकड़े का आकार समग्र लागत को प्रभावित करता है, इसी तरह स्वामित्व, सरकारी या निजी स्वामित्व मूल्य निर्धारण को प्रभावित करता है. बाजार की मांग, आपूर्ति और बाजार की स्थितियों के अनुसार जमीन की कीमतों को प्रभावित करती है. उत्तर प्रदेश में नजूल भूमि की अनुमानित लागत लखनऊ, कानपुर या आगरा जैसे शहरी क्षेत्रों में 5 हजार से 50 हजार प्रति वर्ग मीटर तक हो सकती है. इसके अलावा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 1 हजार से 10,000 प्रति वर्ग मीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 500 से 5000 प्रति वर्ग मीटर तक कीमत हो सकती है.
नजूल भूमि प्रबंधन समिति की रिपोर्ट में ये दावा
उत्तर प्रदेश राजस्व विभाग की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार यूपी में लगभग 12000 नजूल भूमि जोत हैं. यूपी नजूल भूमि प्रबंधन समिति की 2020 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पूरे राज्य में करीब 15000 नजूल भूमि है, क्षेत्रफल के हिसाब से यूपी में नजूल भूमि करीब 10000 से 15000 हेक्टेयर (24,700 से 37,000 एकड़) है.
संसदीय कार्य मंत्री ने कही ये बात
विधेयक पेश करते हुए संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने सदन को बताया कि सार्वजनिक महत्व की विभिन्न प्रकार की विकास गतिविधियों के कारण भूमि की निरंतर और तत्काल आवश्यकता होती है, जिसे विकास गतिविधियों में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके. उन्होंने कहा कि विकास गतिविधियों में उपयोग के लिए भूमि उपलब्ध कराने के लिए भूमि का अधिग्रहण करना होगा, जिसमें भारी खर्च आएगा और प्रक्रिया में काफी देरी होगी.
बिल के प्रावधान का होल्डिंग पर होगा असर
आजतक से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसी भूमि की कीमत का ऐसा कोई अनुमान नहीं है और इसका मूल्यांकन करने में समय लगेगा. सरकार की मंशा इन्हें तथ्यात्मक से ज्यादा राजनीतिक नजरिए से देखने की है, बिल में जो प्रावधान हैं, उनका निश्चित रूप से होल्डिंग पर असर पड़ेगा और इसका अनुमान एक लाख करोड़ से ज्यादा है.
सहयोगी दलों ने किया बिल का विरोध
इस बिल को लेकर मची खींचतान में सहयोगी भी शामिल हो चुके है. जहां, केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने X पर पोस्ट में नजूल संपत्ति बिल की तत्काल वापसी की मांग की है. उनका कहना है कि यह विधेयक बिना सोच-विचार के जल्दबाजी में लाया गया है. उन्होंने उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है, जिन्होंने इस विधेयक को लेकर सरकार को गुमराह किया है. वहीं, संजय निषाद भी कह रहे हैं कि सरकार को कुछ अधिकारी गलत जानकारी देकर बिल लाए थे.