यूपी में लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. बीजेपी अपने सबसे मजबूत दुर्ग यूपी को बचाए रखने की ही नहीं बल्कि क्लीन स्वीप करने की कवायद में जुट गई है. तो वहीं, सपा मुस्लिम परस्ती के तमगे से बाहर निकलने और बीजेपी के हार्ड हिंदुत्व से मुकाबला करने के लिए नैमिषारण्य से मिशन-2024 के चुनाव अभियान का आगाज करने जा रही है.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने लोहियावादियों और अंबेडकरवादियों को एक साथ एक मंच पर लाने के साथ-साथ सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर कदम बढ़ाने का फैसला किया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सपा के इस राजनीतिक प्रयोग से मुस्लिम मतदाता कहीं खिसक तो नहीं जाएंगे? अखिलेश को मंदिरों में जाने से क्या मिलेगा? क्या अखिलेश सॉफ्ट हिंदुत्व के लिए अपनी पार्टी को सियासी मजबूती दे सकेंगे?
सपा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन-पूजन के साथ अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव अभियान का आगाज करेगी. सपा ने इसके लिए नैमिषारण्य को चुना है, जहां 9 और 10 जून को दो दिवसीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर कर रही है. प्रशिक्षण शिविर में पार्टी की रणनीति से लेकर चुनाव जीतने का तरीका तक सिखाया जाएगा. मतदाता सूची सत्यापन, मतदाताओं को बूथ तक ले जाने सहित प्रबंधन का मंत्र दिया जाएगा. पार्टी ने कार्यक्रम के लिए पूर्व विधायक रामपाल यादव को संयोजक बनाया गया है.
नैमिष धाम की पावन भूमि को 33 करोड़ देवी देवताओं का वास माना जाता है और 88 हजार ऋषियों की तपोस्थली कहा जाता है. इस तरह समाजवादी पार्टी नैमिष की तपोभूमि से मिशन 2024 का आगाज करेगी. प्रशिक्षण शिविर से पहले 151 बेदी पर बैठकर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित अन्य नेता वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन पूजन करेंगे, ललिता देवी मंदिर जाकर देवी-देवताओं से जीत का आशीर्वाद भी लेंगे. सियासी गलियारे में चर्चा है कि बीजेपी के अयोध्या पॉलिटिक्स को काउंटर करने के लिए नैमिषारण्य को चुना है.
नैमिषारण्य की तर्ज पर प्रदेशभर में सभी 80 लोकसभा सीटों पर सपा शिविर लगाएगी. सीतापुर की चौहद्दी में 4 लोकसभा और नौ विधानसभा सीट है. सपा के पास इसमें सिर्फ एक विधायक है जबिक बीजेपी चारों लोकसभा सीट और 8 विधानसभा सीट पर काबिज है. धौरहरा, मिश्रिख, सीतापुर और मोहनलालगंज लोकसभा सीट आती हैं. बीजेपी ने 2014 से पूरे इलाके में अपना कब्जा जमा रखा है, जिसमें सेंधमारी के लिए सपा ने बीजेपी के दुर्ग से ही अपने प्रशिक्षण शिविर कार्यक्रम शुरू कर रही है.
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा करीब 36 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही. सूबे के मुस्लिम वोटर्स ने 80 फीसदी से ज्यादा वोट सपा को दिया है, लेकिन बीजेपी को सत्ता में आने से नहीं रोक सकी. ऐसे में सपा की लोहियावादियों और अंबेडकरवादियों को एक मंच पर लाकर 40 से 45 फीसदी वोट हासिल करने की रणनीति है. इसके अलावा अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए सपा को मुस्लिम परस्त वाली छवि से बाहर निकालने की है, जिसके लिए 2017 के चुनाव के बाद से कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी है.
अखिलेश यादव पर हमेशा ही मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है, लेकिन बदले राजनीतिक हालात में वे यह जान चुके हैं कि सपा के परंपरागत M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे बीजेपी को नहीं हरा सकते. यही नहीं वे पहले कांग्रेस और फिर बसपा से गठबंधन करके भी देख चुके हैं. इसके अलावा अखिलेश जातीय आधार वाले छोटे दलों के साथ भी मिलकर बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सके हैं. ऐसे में अब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए नई रणनीति के साथ उतरने की तैयारी में है.
राजनीतिक विश्वलेषकों की मानें तो देश की सियासत अब बदल चुकी है. 2014 के बाद से जिस तरह हिंदू मतदाताओं पर बीजेपी की पकड़ मजबूत होती जा रही है, उससे अखिलेश को मंदिर और प्रतीकों की राजनीति करने के लिए मजबूर कर दिया है. इस तरह सपा अपने सियासी एजेंडे पर बीजेपी को लाने के बजाय खुद बीजेपी की बिछाई सियासी बिसात पर उतर रही है. बीजेपी हिंदू समुदाय को अपना वोट बैंक मानती है, इसलिए उसकी पिच पर उतरकर मुकाबला करना सपा के लिए आसान नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि अखिलेश यादव कई तरह का सियासी प्रयोग करके देख चुके हैं, लेकिन बीजेपी से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में अखिलेश अब बीजेपी की हिंदुत्व पिच पर उतर रहे हैं, लेकिन इस रास्ते पर चलना उनके लिए दो धारी तलवार की तरह है. एक तो बीजेपी के सवालों का सामना करना पड़ेगा तो दूसरा मुस्लिम मतों के भरोसे को भी बनाए रखने की चुनौती होगी.
वह कहते हैं कि बीजेपी शुरू से ही उन नेताओं पर सवाल खड़े करती है, जिन लोगों से उसे परेशानी होती है. बीजेपी सिर्फ यह स्थापित करना चाहती है कि धर्म की इज्जत वही करती है, बाकी सभी राजनेता पाखंड करते हैं. बीजेपी इसलिए भी नहीं डर रही है, क्योंकि जब-जब मंदिर और प्रतीकों की राजनीति विपक्ष की तरफ से की गई तब-तब उसे कोई नुकसान नहीं हुआ है. उल्टा विपक्षी दलों को ही नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि उनकी इस तरह की सियासत से उनका कोर वोटबैंक छिटका है.
यूपी में नब्बे के दशक से ही मुस्लिम मतदाता सपा को कोर वोटबैंक बना हुआ है, लेकिन 2022 के चुनाव में मुस्लमानों ने कांग्रेस और बसपा के मुस्लिम कैंडिडेटों को भी दरकिनार कर सपा को वोट दिया था. 2024 के चुनाव में विपक्षी दलों के बीच असल लड़ाई मुस्लिम मतदाता की है.
वरिष्ठ पत्रकार समीरात्मज मिश्र कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी भी सक्रिय हैं, जो सपा के सॉफ्ट हिंदुत्व पॉलिटिक्स पर सवाल खड़े कर मुस्लिमों का भरोसा जीतना की कवायद कर सकते हैं. मेरठ सीट पर सपा को मुस्लिमों को नजर अंदाज करना महंगा पड़ा, जिसका सियासी फायदा ओवैसी की पार्टी उठाने में सफल रही थी.