
यूपी में लोकसभा चुनाव के बीच सुल्तानपुर के बाहुबली नेता और पूर्व विधायक चंद्रभद्र सिंह उर्फ 'सोनू सिंह' ने समाजवादी पार्टी जॉइन कर ली है. अखिलेश यादव संग उनकी तस्वीर सामने आने के बाद सुल्तानपुर का सियासी पारा हाई हो गया है. सोनू सिंह ने वर्ष 2019 में सुल्तानपुर से बसपा के टिकट पर बीजेपी प्रत्याशी मेनका गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था. उन्हें महज 14 हजार वोटों से हार मिली थी.
दरअसल, 25 मई को सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर मतदान होना है. इससे पहले सोनू सिंह के अखिलेश खेमे में जाने के बाद माना जा रहा है कि इससे सपा प्रत्याशी को मदद मिलेगी. बाहुबली सोनू सिंह का अपने इलाके में दबदबा है. उनके खिलाफ दर्जन भर से ज्यादा मुकदमे दर्ज रहे हैं. भाई यशभद्र सिंह उर्फ मोनू सिंह भी क्षेत्र में काफी सक्रिय रहते हैं. मोनू ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं.
कहा जाता है कि यूपी के सुल्तानपुर में विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का, इस ताकतवर परिवार का फैक्टर हरदम काम करता है. इस परिवार का राजनीति में अच्छा-खासा दखल है. सोनू सिंह और मोनू सिंह का इलाके में अपना दबदबा है. क्षत्रिय वोटर्स में भी उनकी खास पकड़ मानी जाती है.
आइए जानते हैं सोनू सिंह के बारे में
सोनू सिंह ने समाजवादी पार्टी से साल 2002 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी. हालांकि, 2009 में सोनू ने सपा से इस्तीफा देकर बसपा जॉइन कर ली थी. साल 2012 में जब बसपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वह पीस पार्टी में शामिल हो गए और उसी के सिंबल पर चुनाव लड़े थे.
2014 के लोकसभा चुनाव के पहले जब वरुण गांधी सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने आए तो सोनू और मोनू वरुण के खेवनहार बनकर बीजेपी में शामिल हो गए थे और 2019 तक बीजेपी में रहे. लेकिन इसी दौरान सोनू सिंह बसपा में शामिल हो गए और मायावती ने उन्हें लोकसभा का उम्मीदवार बना दिया. सोनू लोकसभा का चुनाव मेनका गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े और लगभग साढ़े 4 लाख वोट हासिल किए. मेनका से वो महज 14 हजार वोटों से हारे थे.
दिलचस्प हुआ सुल्तानपुर का चुनाव
फिलहाल, सोनू सिंह के सपा में आ जाने से सुल्तानपुर का चुनाव अब और भी दिलचस्प हो गया है. इस लोकसभा सीट में साढ़े तीन लाख के करीब ठाकुर वोटर हैं, जिन्हें सोनू सिंह अपने साथ लाने की कोशिश करेंगे. ऐसे में बीजेपी प्रत्याशी के लिए दिक्कत हो सकती है. सुल्तानपुर के सोनू सिंह की कुंडा के राजा भैया, जौनपुर के धनंजय सिंह से भी अच्छी दोस्ती है. तीनों की क्षत्रिय मतदाताओं में अच्छी-खासी पकड़ है. सोनू और मोनू को बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के साथ भी देखा गया.
कहते हैं आजादी के बाद से आज तक सुल्तानपुर जिले के धनपतगंज ब्लॉक पर इस 'सिंह परिवार' का ही कब्जा रहा है. यहां से सोनू सिंह के बाबा स्वर्गीय शारदा सिंह ब्लॉक प्रमुख रहे, उनकी ना मौजूदगी में उनके बेटे और सोनू सिंह के पिता इंद्र भद्र सिंह धनपतगंज के ब्लॉक प्रमुख बने. ब्लॉक प्रमुख बनने के बाद सोनू सिंह के पिता इंद्र भद्र इसौली विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े और विधायक बने। बाद में फिर जनता दल के टिकट पर भी विधानसभा पहुंचे.
विधायक और ब्लॉक प्रमुख सीट पर रहा कब्जा
सोनू सिंह के पिता के विधायक बनने के बाद उनकी मां धनपतगंज ब्लॉक की ब्लॉक प्रमुख बनी थीं. इसी दौरान साल 1999 में जिला मुख्यालय पर न्यायालय के सामने सोनू सिंह के पिता इंद्र भद्र सिंह की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड में संत ज्ञानेश्वर का नाम सामने आया था.
सोनू के पिता की हत्या के बाद परिवार की राजनीतिक विरासत को चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' और उनके छोटे भाई यशभद्र सिंह 'मोनू' ने संभाला. सोनू सिंह पहली बार 2002 के आम विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़े और विधायक बने थे. सोनू उसी सीट से पहली बार चुनाव लड़कर विधायक बने जहां से उनके पिता दो बार विधायक रह चुके थे.
साल 2006 में जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे तो इलाहाबाद के हंडिया इलाके में संत ज्ञानेश्वर की और उनके समर्थकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्या में विधायक सोनू सिंह और उनके ब्लॉक प्रमुख भाई मोनू सिंह का नाम आया था. दोनों आरोपी बनाए गए थे.
इसके बाद 2007 में फिर जब विधानसभा चुनाव हुआ तो मुलायम सिंह ने उन्हें दोबारा टिकट देकर इसौली विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बना दिया और सोनू ने फिर से इस सीट पर जीत हासिल की और दूसरी बार विधायक बने.
मायावती ने भेजा था जेल
साल 2007 में जब यूपी में सपा की मुलायम सरकार बदली और बसपा की सरकार आई और मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो सबसे पहले राजधानी लखनऊ के बहुखंडी स्थित विधायक आवास से उस समय के सपा विधायक सोनू सिंह की संत ज्ञानेश्वर हत्याकांड मामले में गिरफ्तारी की गई और उन्हें जेल भेज दिया गया.
साल 2009 में सोनू सिंह ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा देकर बसपा में शामिल हो गए. इसौली विधानसभा सीट से ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोनू सिंह को टिकट देकर चुनाव लड़ाया. सोनू सिंह तब जेल में बंद थे और जेल में बंद रहते हुए वे तीसरी बार चुनाव जीत कर विधायक बने.
साल 2012 में जब परिसीमन बदला तो इसौली विधानसभा सीट पर अपना दबाव और अच्छा दखल रखने वाले सोनू सिंह सुल्तानपुर(शहर) सीट पर आ गए और बसपा से टिकट मांगा. लेकिन इसबार बसपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वह डॉक्टर अयूब खान वाली पीस पार्टी में शामिल हो गए और चुनाव लड़े. इस चुनाव में सोनू सिंह को लगभग 36000 वोट हासिल हुए थे. सोनू इस चुनाव में तीसरे नंबर पर थे. जबकि, सोनू सिंह के चुनाव लड़ने के कारण इस चुनाव में बसपा जीता हुआ चुनाव हार गई तो बीजेपी चौथे नंबर पर आ गई थी.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में वरुण गांधी के चुनाव लड़ने की बात शुरू हुई और जब पहली बार वरुण गांधी सुल्तानपुर आए तो उनके मंच पर सोनू-मोनू नजर आए. जिसके बाद दोनों भाई बीजेपी में शामिल हो गए और वरुण गांधी के लिए प्रचार में जुट गए.
इस चुनाव में वरुण गांधी 116000 वोटो के अंतर से चुनाव जीते थे, जिससे खुश होकर वरुण गांधी ने सोनू सिंह को अपना प्रतिनिधि भी बना लिया था. सोनू सिंह साल 2013 से 2019 तक भारतीय जनता पार्टी में रहे.
लेकिन जब उन्हें लगा कि बीजेपी 2019 में सुल्तानपुर लोकसभा सीट से मेनका गांधी को चुनाव लड़ना चाहती है तो वह पार्टी छोड़कर बसपा में शामिल हो गए और बसपा ने उन्हें गठबंधन में अपना लोकसभा प्रत्याशी बनाया.
मेनका गांधी को दी थी कड़ी टक्कर
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की मेनका गांधी को गठबंधन के प्रत्याशी सोनू सिंह ने सीधी और कड़ी टक्कर दी. सोनू की लड़ाई इस कदर रही की मेनका गांधी महज 14000 वोटो के अंतर से जीत कर सुल्तानपुर की सांसद बनीं.
सोनू सिंह साल 2021 में पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण बसपा से निकाल दिए गए. जिसके बाद सोनू कभी किसी दल में नहीं गए. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सोनू सिंह खुद चुनाव नहीं लड़े, लेकिन सुल्तानपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को अपना समर्थन देकर सपा की मदद की. जिसके कारण बीजेपी यह सीट सपा से हारते-हारते बची. महज 1000 वोटो के अंतर से ही इस सीट पर बीजेपी चुनाव जीत पाई थी.
सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर मतदाताओं की संख्या और जातीय आंकड़े
कुल मतदाता है- 18,34,355
महिला मतदाता- 8,79,932
पुरुष मतदाता- 9,54,358
जातीय समीकरण की बात करें तो यहां करीब 3,31,841 ब्राह्मण वोटर हैं तो 3,51,527 ठाकुर (क्षत्रिय) मतदाता हैं. 4,60,246 दलित के साथ 3,42,183 मुस्लिम और 3,48,527 ओबीसी और अन्य मतदाता हैं.