उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया है इसके बाद राजनीति गर्मा गई है. बीजेपी जहां डैमेज कंट्रोल में जुटी है तो योगी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों को बैठे-बैठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है. नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के मुद्दे को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव से लेकर पल्लवी पटेल, भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. सपा गांव-गांव, घर-घर जाकर इस मुद्दे को धार देगी और ओबीसी के साथ-साथ दलित समुदाय को साधने की कवायद में जुट गई है.
बता दें कि यूपी की 760 नगर निकाय में चुनाव होने हैं, जिसके लिए राज्य सरकार ने आरक्षण जारी किया था. प्रदेश की नगर निगमों के मेयर, नगर पालिका परिषद एवं नगर पंचायतों के अध्यक्ष और पार्षदों के आरक्षण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि सरकार ने आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट का फार्मूला लागू नहीं किया है. कोर्ट में सरकार ने कहा था कि निकाय चुनाव मामले में 2017 में हुए ओबीसी के सर्वे को आरक्षण का आधार माना जाए. योगी सरकार के तर्कों को हाईकोर्ट ने नहीं माना और बिना ओबीसी आरक्षण के तत्काल चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं.
हालांकि, कोर्ट से फैसला आते ही योगी सरकार में पिछड़े वर्ग का नेतृत्व कर रहे उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी तुरंत सरकार व संगठन की ओर से ओबीसी की आवाज बनकर खड़े हो गए है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कर दिया है कि बिना ओबीसी आरक्षण के निकाय चुनाव नहीं होंगे. इसके बावजूद विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है.
मायावती ने बीजेपी को घेरा, ओबीसी को साधा
अखिलेश यादव से लेकर मायावती तक ने एक सुर में योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और बीजेपी को आरक्षण विरोधी बताने में जुटी है. मायावती ने कहा कि हाईकोर्ट का ये फैसला बीजेपी और उनकी सरकार की ओबीसी और आरक्षण विरोधी सोच को प्रकट करता है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस गलती की सजा ओबीसी समाज बीजेपी को जरूर देगा.
निकाय चुनाव के आरक्षण के बहाने मायावती ओबीसी वोटों को साधती हुई नजर आई हैं. हाल ही में उन्होंने ओबीसी समुदाय से आने वाले विश्वनाथ पाल को बसपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर पिछड़ा वर्ग को बड़ा संदेश देते नजर आईं. मायावती की मंशा को साफ तौर पर समझा जा सकता है कि वो किस तरह से अपने दलित वोटबैंक को सहेजकर रखते हुए ओबीसी को भी जोड़ने की कवायद कर रही हैं. इसीलिए निकाय चुनाव पर हाईकोर्ट से फैसला आते ही मायावती ने बीजेपी को ओबीसी विरोधी बताने में देर नहीं लगाई.
अखिलेश ने ओबीसी-दलित को साधा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने निकाय चुनाव में पिछड़े वर्ग के आरक्षण के मुद्दे पर ओबीसी और दलित दोनों को साधने की कवायद कर रहे हैं. अखिलेश ने कहा कि आरक्षण विरोधी बीजेपी निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के मामले पर घड़ियाली सहानभूति दिखा रही है. आज बीजेपी ने पिछड़े वर्ग के आरक्षण का हक छीना है और कल बाबा साहब द्वारा दिए गए दलितों के आरक्षण को भी छीन लेगी. बीजेपी सरकार ने न सिर्फ पिछड़े वर्ग को धोखा दिया है बल्कि बाबा साहब अंबेडकर के दिए संविधान को भी खत्म करने की साजिश की है.
अखिलेश ने कहा कि बीजेपी जो खुद नहीं कर पाती वह जनहित याचिका के माध्यम से करवाती है. भाजपा का चाल, चरित्र, चेहरा सारी दुनिया के सामने उजागर हो गया है. जो खुद को पिछड़ा वर्ग हितैषी बताते थे वे भाजपा में आज बंधुआ मजदूर की तरह दिख रहे हैं. अखिलेश ने आरक्षण बचाने की लड़ाई में पिछड़ों और दलितों को सपा के साथ आने की अपील तक कर डाली. सपा प्रमुख लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि बीजेपी संविधान को खत्म करने की कोशिश कर रही है. पार्टी उनके इस आरोप को हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देकर जनता के बीच सुबूत के रूप में प्रस्तुत करेगी.
शिवपाल यादव ने भरी हुंकार
वहीं, सपा विधायक शिवपाल सिंह यादव ने भी ओबीसी आरक्षण खत्म करने के निर्णय को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. सामाजिक न्याय की लड़ाई को इतनी आसानी से कमजोर होने नहीं दिया जा सकता है. उन्होंने कहा कि आरक्षण पाने के लिए जितना बड़ा आंदोलन करना पड़ा था, उससे बड़ा आंदोलन इसे बचाने के लिए करना पड़ेगा. कार्यकर्ता तैयार रहें और इस मुद्दे को लेकर हर स्तर पर संघर्ष करेंगे. जल्द ही गांव-गांव यात्रा निकाली जाएगी.
अपना दल की नेता सपा के टिकट पर विधायक बनी पल्लवी पटेल ने भी ट्वीट कर कहा कि फैसले ने ओबीसी हकमारी में एक और अध्याय जोड़ दिया है. मैं पहले भी कहती आई हूं कि ये संविधान विरोधी सरकार है. कोर्ट का फैसला मेरी इस बात पर मुहर लगा देता है. वरना 18-18 घंटे काम करने का वायदा करने वाली बीजेपी सरकार 6 महीने पहले आयोग बनाकर क्या ओबीसी आरक्षण को सुनिश्चित नहीं कर सकती थी? सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ने कहा कि बीजेपी के संविधान विरोधी होने के लिए अन्य सुबूत की जरूरत नहीं है.
सपा की क्या है रणनीति?
समाजवादी पार्टी दलितों और अति पिछड़ों पर फोकस बढ़ा रही है. सपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान लोहियावादी और आंबेडकरवादी को एक मंच पर आने का आह्वान किया था. नतीजा रहा कि सपा का वोट बैंक करीब 36 फीसदी तक पहुंच गया. सत्ता से भले ही सपा दूर रही, लेकिन वोट बैंक बढ़ने से शीर्ष नेतृत्व गदगद दिखा. उपचुनाव में भी यह रणनीति अपनाई गई और सफल रही.
निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण खत्म करने के आदेश को लेकर सपा की रणनीति है कि आंदोलन के बहाने पिछड़े वर्ग के नेताओं को लामबंद किया जाए और बीजेपी को दलित-ओबीसी विरोधी कठघरे में खड़ा किया जाए. पार्टी के नेता एकजुट होकर अपने इलाके में मतदाताओं के बीच पैठ बनाएंगे. अभी बीजेपी का साथ देने वाली पिछड़े वर्ग की जातियों को भी लक्ष्य बनाया जाएगा. उन्हें समझाया जाएगा कि भाजपा के इशारे पर आरक्षण को समाप्त करने की साजिश रच रही है.
आरक्षण के मुद्दे को लेकर विधानसभा क्षेत्रवार 'संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ' यात्रा निकालने की तैयारी कर रही है. सपा इसके जरिए नगर निकाय और लोकसभा चुनाव में वोट बैंक बढ़ाने की रणनीति है. एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को लामबंद रखते हुए इन जातियों को गोलबंद कर वोटबैंक की गठरी भारी करने की कोशिश है. इसीलिए यह संदेश दे दिया जा रहा कि अब सपा ही डॉ. आंबेडकर के सपनों को पूरा कर सकती है और ओबीसी के साथ-साथ दलितों को भी एकजुट होने की अपील की जा रही है