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बनारस में 57वां महामूर्ख सम्मेलन... देशभर के कवि होते हैं शामिल, जानें इस अनोखे आयोजन की खासियत

बनारस का रंग निराला है, यहां हर त्योहार और परंपरा में एक अनोखा अंदाज देखने को मिलता है. ऐसा ही एक अलग अंदाज हर साल 1 अप्रैल को देखने को मिलता है, जब वाराणसी के राजेंद्र प्रसाद घाट पर 'महामूर्ख सम्मेलन' का आयोजन किया जाता है. इस साल 57वें महामूर्ख सम्मेलन में देशभर से आए हास्य कवियों ने अपनी चुटीली कविताओं से ऐसा समां बांधा कि हंसी और ठहाकों की गूंज देर रात तक घाट पर गूंजती रही. हजारों दर्शक इस अनोखे मेले के गवाह बने और मूर्खता को खुले दिल से अपनाते हुए सालभर की सारी गंभीरता को एक रात के लिए ताक पर रख दिया.

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महामूर्ख सम्मेलन में कविताएं प्रस्तुत करते कवि. (Photo: Aajtak)
महामूर्ख सम्मेलन में कविताएं प्रस्तुत करते कवि. (Photo: Aajtak)

जब दुनिया खुद को सबसे बुद्धिमान साबित करने की होड़ में लगी होती है, तब काशी में हर साल 1 अप्रैल को लोग खुद को 'मूर्ख' घोषित करने में गर्व महसूस करते हैं. बीते दिन वाराणसी के डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट पर 57वें महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें हास्य और व्यंग्य की महफिल देर रात तक सजी रही. देशभर से आए कवियों ने अपनी हास्य-व्यंग्य रचनाओं से श्रोताओं को खूब हंसाया और ठहाकों का दौर जारी रहा.

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वाराणसी के ऐतिहासिक राजेंद्र प्रसाद घाट पर हजारों की संख्या में दर्शक शामिल हुए. कार्यक्रम में बनारस सहित देश के अन्य राज्यों से भी हास्य कवि पहुंचे, जिन्होंने अपने रचनाओं से उपस्थित लोगों को लोटपोट कर दिया.

बनारस का महामूर्ख सम्मेलन... जब कवियों की महफिल में गूंजे ठहाके और बहा हास्य का सैलाब!

कवि सम्मेलन का संचालन दमदार बनारसी ने किया और उन्होंने पूरे माहौल को हंसी-मजाक से भर दिया. इस कार्यक्रम में कवि अखिलेश द्विवेदी, सौरभ जैन सुमन, बिहारी लाल अंबर, सुदीप भोला, बादशाह प्रेमी संजय सिंह, श्याम लाल यादव, महेश चंद्र जायसवाल और डॉ. प्रशांत सिंह ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं.

कवियों ने इस अंदाज में पेश कीं हास्य रचनाएं

दिल्ली से आए कवि विनोद पाल ने अपने चुटीले अंदाज में कहा-

खुद अपने चरित्र पर ही मूंग दल रहे हो तुम
अच्छे हो तो क्यों फितरत बदल रहे हो तुम
अगर लड़की तुम्हें देख के रस्ता बदल रही है तो
ये जान लो गलत रस्ते पे चल रहे हो तुम.

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वहीं महेश चंद्र जायसवाल ने अपनी रचना कुछ इस अंदाज में पेश की-

गयल जमाना अंबेसडर क
अंपाला भी रोअत हव
आज क राजा बेंज सफारी
ज क राजा रोबर हव
चाहे रक्खा बीएमडब्ल्यू
चाहे कुछ भोकाल गढ़ा
सब गाड़ियन की ऐसी तैसी
सबसे हिट बुलडोजर हव.

डॉ. प्रशांत सिंह ने मोबाइल के जमाने पर तंज कसते हुए कहा-

मोबाइल के दौर में चला रील का ट्रेंड
फॉलोवर तो बढ़ गए दोस्त हुए अनफ्रेंड
सीमित गर ना हुआ तकनीकी उपयोग
रिश्तों को खा जाएगा मोबाइल का रोग.

वहीं अखिलेश द्विवेदी ने रिश्तों पर व्यंग्य किया, उन्होंने पढ़ा-

'हम अपना दर्द बांटें या न बांटें, पर हंसी बांटें
भुलाकर सारे गम अपने सभी के संग खुशी बाटें.'

बनारस का महामूर्ख सम्मेलन... जब कवियों की महफिल में गूंजे ठहाके और बहा हास्य का सैलाब!

वहीं भोपाल से आए संजय सिंह ने भी अपनी रचना पेश की-
सच बात पूछती बताना न बाबू जी
छुपाना न बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं...

महामूर्ख सम्मेलन बनारस की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है. यहां हर साल लोग ठहाकों के सागर में गोते लगाते हैं. इस सम्मेलन का आयोजन पिछले 57 वर्षों से किया जा रहा है और यह बनारस की अनूठी परंपरा को दर्शाता है.

कार्यक्रम को लेकर हास्य कवि दमदार बनारसी ने कहा कि इस सम्मेलन का उद्देश्य समाज में फैली निराशा को दूर करना है. हम चाहते हैं कि लोग हंसें और खुश रहें. स्थानीय निवासी कन्हैया दुबे ने कहा कि यह सम्मेलन बनारस की संस्कृति को जीवंत बनाता है. ऐसी हंसी-ठहाकों वाली शाम कहीं और देखने को नहीं मिलती.

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महामूर्ख सम्मेलन में शामिल दर्शकों ने कहा कि वे इस तरह के आयोजनों का बेसब्री से इंतजार करते हैं. अगले साल फिर से महामूर्खों का यह कारवां काशी में उतने ही जोश और उत्साह के साथ लौटेगा. दुनिया बुद्धिमान बनने की होड़ में है, वहीं बनारस के लोग मूर्ख बनने का जश्न इसी अंदाज में मनाते रहेंगे.

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