18 Jan 2025
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आज के समय में हर कोई अपनी फिटनेस पर ध्यान दे रहा है. लोग जिम या पार्क में वर्कआउट करने जाते हैं.
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कई लोग अपने घर पर भी वर्कआउट करते हैं. लेकिन अगर आप कभी जिम गए हैं तो आपने जिम एक कोने में बड़ी मशीन ट्रेड मिल को जरूर देखा होगा.
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क्या आप जानते हैं कि वर्कआउट कर पसीना बहाने वाला ये मशीन कभी सजा के लिए इस्तेमाल होता था? तो चलिए जानते हैं क्या है ट्रेडमिल की कहानी?
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19वीं सदी में इंग्लैंड की जेलों में कैदियों को सजा देने के लिए नए-नए तरीके खोजे जा रहे थे.
इसी दौरान ट्रेडमिल का आविष्कार हुआ, उस समय ट्रेडमिल को फिटनेस मशीन नहीं बल्कि सजा देने की मशीन मानी जाती थी.
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उस वक्त कैदी को सजा देने और टॉर्चर करने के लिए उस मशीन पर बिना रुके दो-दो घंटे तो कई बार दिन भर चलने की भी सजा दी जाती थी.
कहने को तो इसका इस्तेमाल कैदियों को सुधारने के लिए किया जाता था लेकिन असल में ये फिजिकल और मेंटल टॉर्चर था.
कई बार कई कैदी पुरे दिन इस मशीन पर चलते रहते थे और उनके पैरों के नीचे लोहे के बेलन होते थे. इसके साथ ही इस मशीन पर बड़े-बड़े पहिए लगे होते थे.
उस मशीन को चलाने से उपर लगी चक्की घूमती और चक्की से पानी की निकासी होती और अनाज पीसने या कोई भारी काम के लिए उपयोग किया जाता था.
इस मशीन का उद्देश्य कैदियों को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ना था ताकि उन्हें ये एहसास दिलाया जा सके कि उनकी इस मेहनत का कई मतलब नहीं है.
ये एक अंतहीन चक्कर था जो थकान,दर्द और निराशा से भरा हुआ था. धीरे-धीरे ये सजा इतनी क्रूर मानी जाने लगी और 1898 में इंग्लैंड ने इसे बंद कर दिया.
आपको बता दें कि ट्रेडमिल का आविष्कार सर विलियम क्यूबिट ने साल 1818 में किया था. उन्होंने इसे 'ट्रेडव्हील' नाम दिया था. इसका इस्तेमाल मक्का पीसने के लिए किया जाता था.