17 FEB 2025
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आपने प्लेन में सफर किया होगा तो आपके दिमाग में एक बात जरूर आई होगी कि प्लेन चला रहे पायलट को कैसे पता लगता है कि आसमान में राइट मोड़ना है या लेफ्ट.
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आम तौर पर, कमर्शियल फ्लाइट 30,000 से 40,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हैं. यह ऊंचाई समुद्र तल से करीब 9 से 12 किलोमीटर होती है.
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प्लेन तीन तरह के होते हैं- हेलीकॉप्टर, कमर्शियल प्लेन और जेट प्लेन. कमर्शियल प्लेन 30,000 फीट से लेकर 50000 फीट के बीच उड़ता है. हेलिकॉप्टर सिर्फ 10000 फीट तक ही उड़ सकता है.
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क्या आपको भी लगता है कि प्लेन आसमान में उड़ते हैं तो कहीं भी उड़ सकते हैं, इन्हें जमीन पर चलने वाली गाड़ियों की तरह ट्रैफिक का सामना भी नहीं करना पड़ता होगा?
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अगर आप ऐसा सोचते हैं तो ये बिल्कुल गलत है. आपको ये बात जानकर हैरानी होगी कि जमीन से ज्यादा ट्रैफिक आसमान में उड़ने वाले पायलट को मिलता है.
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आपको बता दें कि हवाई जहाज का भी एक फिक्स रास्ता होता है, जिसके जरिए हवाई जहाज उड़ान भरते हैं.
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इन रास्तों को पायलट को बताने के लिए रेडिओ और रडार का उपयोग किया जाता है. इसके अलावा एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (ATC) होते हैं, जो पायलट को बताते हैं कि कितनी ऊंचाई पर उन्हें प्लेन को उड़ाना है.
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किसी भी पायलट को रेडियो और रडार की मदद से पता लगता है कि प्लेन को राइट लेना है या लेफ्ट. इसके साथ ही धरती पर एयर ट्रैफिक कंट्रोलर होते हैं जो फ्लाइट उड़ा रहे पायलट को जानकारी देता है कि प्लेन को किस दिशा में और कब मोड़ना है.
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प्लेन को रास्ता दिखाने के लिए Horizontal situation indicator (HSI) का इस्तेमाल किया जाता है.
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यह तकनीक पायलट के सामने लगे स्क्रीन पर गूगल मैप की तरह रास्ता दिखाने का काम करती है. जिससे पायलट आसानी से समझ जाते हैं कि उन्हें लेफ्ट लेना है या राइट.
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