28 Jan 2025
महाकुंभ 2025 में श्रद्धालुओं और साधुओं की सुविधा के लिए पांटून पुल बनाए गए हैं. इन पुलों को बनाने में एक हजार लोगों ने 10 घंटे का समय लिया है.
इन पुलों के माध्यम से करोड़ों लोग प्रयागराज में गंगा पार कर रहे हैं. यह पुल सिलेंडर जैसे गोल और काले होते हैं, और उनके ऊपर एक सड़क बनी होती है. इन पुलों को पीपा पुल भी कहा जाता है.
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अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर ये अनोखे पुल बनते कैसे हैं इनके अंदर क्या होता है? आइए हम आपको बताते हैं.
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ये पांटून पुल (Pantoon Bridge) 2500 साल पहले (480 ईस्वी पूर्व) फारसी इंजीनियरों ने तैयार किए थे.
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पांटून पुल के सभी सिलेंडर आपस में बांधा जाता है और फिर इनके ऊपर गाटर सेट किए जाते हैं. इनमें लॉक लगाने की व्यवस्था होती है.
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नट बोल्ट से इन्हें बांधा जाता है फिर इसके बाद हाइड्रा के जरिए नदी में धकेल दिया जाता है.
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इंजीनियर तमाम चीजों को देखकर इसे बनाते हैं. इसके अंदर कुछ भी भरा नहीं होता, बस हवा होती है.
बड़ी-बड़ी नाव जिस मॉडल पर बनती है, उसी तरह से यह भी बनते हैं. इसलिए ज्यादा वजन के बावजूद यह नहीं डूबते.
पांटून के दोनों तरफ 20-20 मीटर लंबे मोटी रस्सी से लकड़ी का एक बड़ा टुकड़ा पानी में डाल दिया जाता है. यह हिस्सा मिट्टी में समा जाता है जिससे पांटून इधर-उधर नहीं जाता.
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इसके चारों तरफ लोहे के ऐंगल भी लगाए जाते हैं और लकड़ी भी लगाई जाती है. इसके बाद पुल को तारों से कसा जाता है.
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पांटून पुल लगभग पांच टन तक का भार उठा सकते हैं.
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