रेलवे की तरह मेट्रो ट्रैक पर क्यों नहीं होते पत्थर? ये है वजह

23 Oct 2024

आपने हमेशा देखा है कि रेलवे ट्रैक्स पर छोटी-छोटी गिट्टियां या पत्थर बिछे होते हैं. वहीं अगर बात मेट्रो की करें तो मेट्रो ट्रैक्स पर ये पत्थर नहीं बिछे होते हैं.

Credit: Pexels

क्या आपने कभी सोचा है कि इन दोनों के ट्रैक्स में ये अंतर क्यों होता है? आइए जानते हैं.

सबसे पहले तो यह समझ लीजिए कि रेलवे ट्रैक पर बिछे इन पत्थरों को बैलेस्ट कहा जाता है. जब रेल इन ट्रैक पर चलती है तो तेज कंपन और काफी शोर होता है.

Credit: Pexels

ट्रैक पर पड़ी ये गिट्टियां इस शोर को कम करती हैं और कंपन के समय ट्रैक के नीचे की पट्टी, जिसे स्लीपर्स कहते हैं को फैलने से रोकती हैं.

Credit: Pexels

हालांकि, ट्रैक पर पड़ी इन गिट्टियों के रख रखाव में काफी खर्चा होता है. कई बार तो इनके रख-रखाव की प्रक्रिया के चलते रेलवे ट्रैक को ब्लॉक तक करना पड़ जाता है.

Credit: Pexels

दरअसल जब पटरी में पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है. तो पत्थर धीरे-धीरे बिखरते रहते हैं. जिसकी वजह से रेगुलर रखरखाव और मरम्मत की जरूरत पड़ती है.

Credit: Pexels

मेट्रो ट्रैक्स बहुत व्यस्त होते हैं, इसीलिए इनको बार-बार ब्लॉक नहीं किया जा सकता है इसीलिए इसे बैलेस्ट के बिना बनाया जाता है.

इसलिए छोटी दूरी के ट्रैक्स पर कंक्रीट से स्लीपर्स को फिक्स कर दिया जाता है और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. दूसरी तरफ पत्थर सस्ते होते हैं. हजारों किलोमीटर लंबी पटरियों को कंक्रीट से पाटना किफायती नहीं रहता. इसलिए वहां पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है

शहरी क्षेत्रों में मेट्रो ट्रैक कई बार एलीवेटेड (ऊंचे) या अंडरग्राउंड होते हैं, जहां गिट्टी डालने की जगह सीमित होती है ऐसे में इन जगहों पर गिट्टी वाले ट्रैक का मेंटेनेंस करना सम्भव नहीं हैं.

Credit: PTI

मेट्रो ट्रैक्स को बनाने में खर्चा थोड़ा ज्यादा होता है पर इनका मेंटेनेंस बिल्कुल न के बराबर होता है. गिट्टी रहित इन ट्रैक्स में कंपन को अवशोषित करने के लिए अलग-अलग प्रकार के डिज़ाइन होते हैं.

Credit: PTI