04 January 2025
कुछ एयरलाइंस अपनी फ्लाइट्स में फ्री वाई-फाई की सुविधा देते हैं. एयर इंडिया ने भी फ्री वाई-फाई देने की सेवा कुछ उड़ानों में शुरू की है. अब सवाल ये उठता है कि हवा में इतनी ऊंचाई पर प्लेन में वाई-फाई कैसे काम करता है.
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हवाई यात्रा के दौरान प्लेन में इंटरनेट की सुविधा दो प्रमुख तकनीकों पर आधारित होती है. एक होता है एयर-टू-ग्राउंड सिस्टम और दूसरा होता है सैटेलाइट बेस्ड वाई-फाई सिस्टम.
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एयर-टू-ग्राउंड सिस्टम के तहत विमान में लगा एंटीना नजदीकी जमीन पर मौजूद टावर से सिग्नल प्राप्त करता है. एक निश्चित ऊंचाई तक यह कनेक्शन सुचारू रूप से चलता रहता है.
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अगर विमान किसी ऐसे क्षेत्र से गुजरता है जहां ग्राउंड टावर नहीं हैं, तो कनेक्शन बाधित हो सकता है.
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ग्राउंड टावर सिग्नल को ऊपर की ओर प्रोजेक्ट करते हैं. इस प्रणाली में इस्तेमाल होने वाली एंटीना विमान के निचले हिस्से में फिट की जाती है.
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दूसरा होता है सैटेलाइट आधारित वाई-फाई सिस्टम. यह तकनीक आजकल ज्यादा पॉपुलर है.
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इसमें जमीन पर स्थित स्टेशन से सैटेलाइट के माध्यम से सिग्नल विमान तक पहुंचते हैं. इस प्रणाली में विमान के ऊपर एंटीना लगे होते हैं.
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यह तकनीक उन क्षेत्रों में कनेक्टिविटी प्रदान करने में अधिक उपयोगी है जहां ग्राउंड टावर नहीं हैं, जैसे समुद्र के ऊपर.
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सिग्नल विमान के अंदर एक राउटर के माध्यम से यात्रियों के डिवाइस तक पहुंचाए जाते हैं. जब विमान 3,000 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचता है, तो ऑन-बोर्ड एंटीना सैटेलाइट सेवा से जुड़ जाता है.
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वहीं फ्लाइट में मोबाइल डेटा बैन होता है. क्योंकि इनकी तंरगों से पायलट के नेविगेशन और रडार उपकरण, ग्राउंड कंट्रोल से संपर्क, यहां तक कि टकराव से बचाव तकनीक में भी बाधा उत्पन्न होती है.
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