आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच रूस की कोशिशों के बाद हुआ सीजफायर का समझौता एक दिन भी नहीं टिक सका. आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच संघर्ष नार्गोवो-काराबाख इलाके को लेकर चल रहा है जिसमें 150 से ज्यादा नागरिकों की जानें जा चुकी हैं. नार्गोवो-काराबाख इलाका आधिकारिक रूप से अजरबैजान का हिस्सा है लेकिन यहां आर्मीनिया का कब्जा है. आर्मीनिया ईसाई बहुल देश है और अजरबैजान मुस्लिम बहुल लेकिन नार्गोवो काराबाख इलाके में आर्मीनियाई ज्यादा हैं.
इस लड़ाई में टर्की अजरबैजान के साथ मजबूती से खड़ा है जबकि आर्मीनिया से करीबी होने के बावजूद रूस खामोश है. टर्की ने कहा है कि अजरबैजान की क्षेत्रीय संप्रुभता का सम्मान करते हुए आर्मीनिया उसके इलाके से कब्जा छोड़े, तभी वो किसी शांति वार्ता का समर्थन करेगा. टर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दवान का कहना है कि रूस पिछले 30 सालों में आर्मीनिया-अजरबैजान के मुद्दे को सही तरीके से सुलझाने में नाकाम रहा है. यही वजह है कि आर्मीनिया टर्की पर संघर्ष को भड़काने का आरोप लगा रहा है.
टर्की की आक्रामकता के बीच रूस की खामोशी को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. सोवियत के पतन के बाद अक्सर ये बात कही जाती रही है कि रूस की नियति में अभी बहुत कुछ देखना लिखा है. आर्मीनिया और अजरबैजान की लड़ाई के बाद एक बार फिर से ये बात दोहराई जाने लगी है. कभी सोवियत का हिस्सा रहे देश अब मॉस्को के प्रभाव से निकलकर अपने क्षेत्रीय ताकतों के करीब जा रहे हैं. पश्चिम में यूक्रेन और बेलारूस अपने यूरोपीय पड़ोसियों के ज्यादा करीब हो गए हैं. चीन भी सोवियत का हिस्सा रहे पश्चिम एशियाई देशों पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. अब अजरबैजान भी टर्की के नजदीक जाता दिख रहा है.
टर्की रूस के सामने एक नई क्षेत्रीय ताकत के तौर पर उभर रहा है और अजरबैजान को अपना पूरा समर्थन दे रहा है. विश्लेषक आशंका जता रहे हैं कि अब दक्षिणी काकशस क्षेत्र (आर्मीनिया, अजरबैजान और जॉर्जिया) पर भी रूस की पकड़ कमजोर पड़ सकती है.
नागोर्नो-काराबाख इलाके को लेकर 90 के दशक में भी अजरबैजान-आर्मीनिया के बीच जंग छिड़ी थी जिसे रूस की मध्यस्थता में खत्म किया गया था. हालांकि, रूस ने आर्मीनिया के जीते हुए इलाके को लेकर यथास्थिति कायम रखी. आर्मीनिया के साथ रूस की सैन्य साझेदारी है हालांकि रूस के अजरबैजान के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं. रूस दोनों ही देशों को हथियारों की आपूर्ति करता है. आर्मीनिया और अजरबैजान दोनों ही सोवियत (USSR) का हिस्सा रहे हैं. साल 2016 में जब अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच संघर्ष छिड़ा तो रूस ने एक हफ्ते के भीतर ही दोनों को सीजफायर के लिए मना लिया था लेकिन इस बार ऐसा नहीं होने जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है टर्की.
टर्की के हथियार, कूटनीतिक समर्थन और कथित तौर पर टर्की के सहयोगी सीरियाई लड़ाकू के जंग में शामिल होने की वजह से अजरबैजान को लगने लगा है कि वह रूस के सामने झुके बिना आर्मीनिया के खिलाफ जंग जारी रख सकता है और अपने खोए हुए इलाके वापस हासिल कर सकता है. टर्की ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर वो अजरबैजान की मदद के लिए पूरी तरह से तैयार है.
इस नई हकीकत से रूस भी वाकिफ है और इसीलिए वो आर्मीनिया-अजरबैजान की जंग में सीधे तौर पर लड़ने से बच रहा है. जब तक ये संघर्ष आर्मीनिया के कब्जे वाले इलाके तक सीमित है, तब तक रूस इस जंग में शामिल नहीं होने वाला है. आर्मीनिया के साथ रूस का नाटो की तरह का सैन्य गठबंधन है और इस इलाके में रूस के एक सैन्य बेस में करीब 2500 सैनिक मौजूद हैं. इन सबके बावजूद, आर्मीनिया रूस को अपने साथ लाने में नाकाम रहा है. रूस ने फिलहाल अमेरिका और फ्रांस के साथ मिलकर खुद को सीजफायर की कोशिश तक ही सीमित रखा है. रूस, अमेरिका और फ्रांस मिंस्क समूह के भी सदस्य हैं. अजरबैजान-आर्मीनिया के बीच संघर्ष को सुलझाने की जिम्मेदारी पिछले 30 सालों से MINSK संगठन की रही है.
मॉस्को धर्मसंकट में है. अगर वो अजरबैजान पर आर्मीनिया के कब्जे के सामने झुकने के लिए दबाव बनाता है तो वह हमेशा के लिए टर्की के प्रभाव में चला जाएगा. अगर रूस आर्मीनिया का साथ देता है तो ये टर्की और रूस के बीच एक खतरनाक जंग में तब्दील हो सकती है. रूस की मजबूरी ये भी है कि वो टर्की के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहता है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की टर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दवान की विरोधाभासों से युक्त दोस्ती से रूस को कई भू-रणनीतिक फायदे हुए हैं. पश्चिम देशों को लेकर रूस और टर्की एक जैसी सोच रखते हैं और यही उनकी बेमेल दोस्ती का आधार भी है.
सीरिया और लीबिया के बाद ये तीसरा ऐसा क्षेत्रीय संघर्ष है जिसमें रूस और टर्की आमने-सामने हैं. अभी तक, पुतिन और एर्दवान इन विराधाभासों को किसी तरह संभालने में कामयाब रहे हैं. पांच साल पहले जब रूस और टर्की अलग-अलग खेमे में थे तो कई कूटनीतिक पंडितों ने इस दोस्ती के औंधे मुंह गिरने की भविष्यवाणी कर दी थी. अजरबैजान-आर्मीनिया के संघर्ष के बाद स्थिति और विकट हो गई है. हालांकि, टर्की और रूस को साथ लाने वाले आधार इतने मजबूत हैं कि वो इस परिस्थिति से भी निकलने की भरपूर कोशिश करेंगे. अगर दोनों देश एक-दूसरे से जंग लड़ते हैं तो ये दोनों के लिए ही विनाशकारी होगा. दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध भी हैं. सीरिया और लीबिया में भी दोनों देशों ने अपनी दुश्मनी को अपनी दोस्ती में आड़े नहीं आने दिया है.
विश्लेषकों का कहना है कि अगर रूस टर्की को क्षेत्रीय ताकत के तौर पर स्वीकार कर ले तो पूरी उम्मीद है कि वे सहयोग और प्रतिस्पर्धा के साथ यूं ही आगे बढ़ते रहेंगे. हालांकि, अभी तक शांति वार्ता में टर्की को शामिल करने की अजरबैजान की मांग को रूस ने स्वीकार नहीं किया है.
रूस की जनभावना
साल 2016 में जब अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच संघर्ष हुआ था तो रूस में एक पोल कराया गया था. इसमें कुछ लोगों की सहानुभूति आर्मीनिया को लेकर थी तो कुछ की अजरबैजान के साथ. इसकी वजह है कि रूस में दोनों देशों के ही लोग रहते हैं. रूस में 30 लाख आर्मीनियाई रहते हैं जबकि 20 लाख अजेरी.
आर्मीनिया और अजरबैजान की लड़ाई
नागोर्नो-काराबाख इलाके को आर्मीनियाई और अजेरी दोनों ही अपनी संस्कृति का गढ़ मानते हैं. आर्मेनियाई ईसाईयत को मानते हैं. ऑटोमन तुर्क साम्राज्य में आर्मेनिया के लोगों का भयंकर नरसंहार हुआ था. जबकि अजेरी मूल रूप से तुर्की ही हैं और उनकी भाषा भी टर्किश से मिलती है लेकिन वे अधिकतर शिया मुस्लिम हैं. शिया मुस्लिमों की करीबी पर्शियन साम्राज्य से रही है.
1988-94 की जंग में नागोर्नो-काराबाख को आर्मीनिया के हाथों खोना अजरबैजान के लिए बेहद अपमानजनक था. आबादी के मामले में अजेरी आर्मेनियाई से तिगुने थे. अजरबैजान के तमाम लोग आज भी सरकारी कैंपों में शरणार्थी की जिंदगी जी रहे हैं. अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव ने एक बयान में कहा था कि वे अपने देश की तेल संपदा से सैन्य ताकत मजबूत कर रहे हैं और एक दिन आएगा जब अजरबैजान अपनी खोई हुई जमीन वापस लेकर रहेगा. अजरबैजान के एक विश्लेषक इल्गर वेलिजादे ने लिखा है कि वो वक्त अब आ गया है. हमारे पास आर्मीनिया से ज्यादा संसाधन हैं. हम तेल और गैस के भंडारों की वजह से समृद्ध देश हैं और हम विदेशों से हथियार खरीदने के बजाय खुद अपने हथियार बना सकते हैं. जबकि आर्मीनिया रूस पर पूरी तरह से निर्भर है.वेलिजादे ने कहा, ये जंग जल्द खत्म नहीं होने वाली है क्योंकि आर्मीनिया कब्जा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. जब तक अजरबैजान की जमीन पर एक भी आर्मीनियाई रहता है, ये जंग चलती रहेगी.
अजरबैजान के विश्लेषक विलिजादे रूस की सतर्कता भरी भूमिका को लेकर संतुष्ट हैं. वो कहते हैं, रूस अजेरी या आर्मेनियाई के खिलाफ ना जाकर मध्यस्थता की भूमिका में बने रहकर सही कर रहा है. अगर इस समस्या का कोई कूटनीतिक समाधान होगा तो वो यूएन और मिन्स्क ग्रुप की तरफ से ही निर्धारित होगा. इसके लिए आर्मीनिया को अपना कब्जा छोड़ना होगा. नार्गोनो-काराबाख के दर्जे का फैसला आर्मेनियाई और अजेरी लोगों को ही करने देना चाहिए.
हालांकि, आर्मीनिया में मांग उठ रही है कि रूस अपना रुख स्पष्ट करे. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि रूस को लेकर आर्मीनिया में नकारात्मक छवि बन रही है. कुछ लोग रूस की मजबूरी समझते हैं. उन्हें पता है कि रूस को आर्मीनिया और अजरबैजान दोनों की ही जरूरत है और रूस के पास अभी यही रास्ता है कि वो कोई भी रास्ता ना चुने. लेकिन इसकी वजह से रूस की छवि खराब हो रही है और हो सकता है कि वो एक को या फिर दोनों को ही हमेशा के लिए खो दे.
रूस के एक विश्लेषक एलेक्जैंडर गोल्ट्स कहते हैं, दो हफ्तों की जंग में दोनों ही देश रूस के हथियारों की खेप मंगा रहे हैं. आर्मीनिया तो रूस के हथियारों पर ज्यादा निर्भर है. रूस को आगे चलकर एक रास्ता चुनना ही होगा कि वो किसके साथ खड़ा होगा? हालांकि, वो चाहे जो भी फैसला करेगा, दक्षिणी कॉकशस क्षेत्र में रूस का प्रभाव कम होना तय है.