भारत आने वाले समय में तालिबान शासन को मान्यता देगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है. भारत वेट एंड वाच की स्थिति में है क्योंकि अफगानिस्तान में हालात अस्थिर हैं. भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत अफगान के हालात पर नजर बनाए हुए है.
बहरहाल, माना जा रहा है कि भारत का तालिबान को मान्यता देना लोकतांत्रिक देशों की प्रतिक्रियाओं पर भी निर्भर करता है. आने वाले हफ्तों में अफगानिस्तान के नए आकाओं के आचरण पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. ये पश्चिमी लोकतांत्रिक देश हो सकते हैं, क्वाड जैसे गुट, वो एशियाई साझेदार जिन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ मिलकर काम किया है. भारत ऐसे देशों के साथ मिलकर तालिबान पर आगे का रास्ता तय करेगा.
(पीएम नरेंद्र मोदी, फोटो-PTI)
इस बीच, अफगानिस्तान पर भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि अफगान लोगों के साथ संबंध ऐतिहासिक हैं और यह जारी है. यह आने वाले दिनों में अफगानिस्तान के प्रति हमारे नजरिये को तय करेगा. ये शुरुआती दिन हैं. इस समय हमारा ध्यान भारतीय नागरिकों (अफगानिस्तान में) की सुरक्षा पर है. तालिबान के साथ बातचीत के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि इस समय हमारी नजर काबुल के तेजी से बदलते हालात पर है. तालिबान और उसके प्रतिनिधि काबुल में हैं. हमें उनसे वहां से बात करनी होगी.
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क्या है दुनिया के देशों की रायः दुनिया के कई देशों के साथ भारत पहले ही यह जता चुका है कि बंदूक की नोंक की दम पर सत्ता पर काबिज होने वालों को मान्यता नहीं दी जाएगी. भारत, अमेरिका और चीन समेत 12 देश संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों के साथ यह फैसला पहले ही कर चुके हैं कि वे अफगानिस्तान में किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देंगे जो बलपूर्वक नियंत्रण हासिल करना चाहती है.
भारत, अमेरिका, कतर, संयुक्त राष्ट्र, चीन, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जर्मनी, नॉर्वे, ताजिकिस्तान, तुर्की और तुर्कमेनिस्तान के प्रतिनिधि 12 अगस्त को एक क्षेत्रीय सम्मेलन में शामिल हुए जिसमें अफगानिस्तान में तेजी से खराब होती सुरक्षा स्थिति को नियंत्रित करने के तरीकों पर चर्चा की गई. सम्मेलन की मेजबानी कतर ने की थी.
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भारत ने इससे पहले मुल्ला उमर के नेतृत्व वाले तालिबान को मान्यता नहीं दी थी. लेकिन इसके विपरीत माना जा रहा है कि मौजूदा हालात पर भारत नए सिरे से विचार कर सकता है. भारत अफगानिस्तान की स्थिति पर नजर बनाए हुए है.
(तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद, फोटो-AP)
अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति की तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है. क्योंकि तालिबान नेतृत्व ने अभी तक औपचारिक रूप से अफगानिस्तान का नेतृत्व करने का दावा नहीं किया है. हालांकि, उसने शासन के ढांचे को औपचारिक रूप देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
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किस बात से डरती है दुनियाः कई देश तालिबान के आने से अफगानिस्तान के आतंक का पनाहगाह बनने की आशंका जता चुके है. हालांकि तालिबान बार बार कह रहा है कि वो अफगान धरती का दूसरे देशों के खिलाफ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगा. ऐसे में तालिबान से रिश्ता कैसा हो, यह इस बात पर निर्भर करेगा है कि अफगानिस्तान दूसरे देशों के खिलाफ आतंकी पनाहगाह न बन जाए. दूसरा, तालिबान का अफगान नागरिकों के साथ सलूक कैसा रहता है. आशंका है कि तालिबान कहीं फिर से अफगानिस्तान में बर्बर कानून न लागू कर दे.
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ब्रिटेन पहले ही कह चुका है कि वह तालिबान को मान्यता नहीं देगा क्योंकि मानवाधिकार के मानकों पर यह गुट खरा नहीं उतर रहा है. ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक राब का कहना था कि ब्रिटेन तालिबान के साथ संबंध नहीं रखेगा, और यदि इसकी जरूरत सामने आई भी तो वह थर्ड पार्टी के जरिये रिश्ता रखेगा.
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पाकिस्तान की रणनीतिक बढ़तः काबुल पर कब्जे के बाद पाकिस्तान की भी नजर तालिबान के साथ रिश्तों पर रहेगी. माना जा रहा है कि तालिबान के आने से पाकिस्तान की अफगानिस्तान पर पकड़ मजबूत होगी और इस्लामाबाद इसका फायदा उठा सकता है. यानी बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि तालिबान अपनी प्राथमिकताओं की पहचान कैसे करते हैं और वे पाकिस्तान के हितों को कितना पूरा करेंगे.
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बढ़ी तालिबान की ताकतः तालिबान पहले से ज्यादा मजबूत और आत्मविश्वास से लबरेज नजर आ रहा है. काबुल पर कब्जे के बाद वो और अधिक उत्साहित दिख रहा है. खुद को इस्लामिक दुनिया के नए केंद्र के रूप में देखने वाले तालिबान के पड़ोसी मुल्क की खुफिया एजेंसी आईएसआई का साझेदार बनने को लेकर पाकिस्तान से आमना-सामना भी हो सकता है.
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फिर भी, पाकिस्तान के पास हक्कानी नेटवर्क में मजबूत सहयोगी हैं और वे ये सुनिश्चित करना चाहेंगे कि वे नई सरकार में महत्वपूर्ण विभागों पर पैबस्त हो जाएं. तालिबान को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराने में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका थी, लेकिन सिराजुद्दीन हक्कानी जैसे सहयोगियों का रक्तपात का इतिहास तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने में बाधा खड़ी करेगा.
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सूत्रों का कहना है कि काबुल पर तालिबान के कब्जे में पाकिस्तान की स्पष्ट भूमिका रही है जिससे तालिबान को अफगानिस्तान पर काबिज होने में किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा. यह भी अभी देखा जाना बाकी है कि तालिबान अपने शासन में गैर पश्तूनों को जगह देता है या नहीं. साथ ही यह भी देखा जाना है कि नए शासक के रूप में किसी नेता या अमीर को थोपा जाता है या कोई लोया जिरगा प्रक्रिया होगी जिससे तालिबान की वैधता बढ़ेगी.
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सावधानी से आगे बढ़ रहा तालिबानः अफगानिस्तान पिछले 20 वर्षों में काफी बदल गया है. लिहाजा तालिबान अब तक बड़ी सावधानी से आगे बढ़ा है. उन अफगानों की अच्छी-खासी आबादी है जो शिक्षित हैं, प्रगतिशील हैं, और दुनिया देख रहे हैं. लिहाजा, उत्पीड़न और भय के बावजूद अफगानिस्तान में अब बर्बरता और दमन की नीति पूरी तरह कामयाब नहीं होगी.
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