सोलोमन आइलैंड्स में हाहाकार के बाद कई देशों ने अपनी सेना को यहां भेजने का फैसला किया है. दरअसल, बीते बुधवार को सोलोमन आइलैंड्स में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे. लगभग 8 लाख की आबादी वाले इस देश में ये प्रदर्शन हिंसक होते चले गए जिसके बाद पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है.
गौरतलब है कि सोलोमन आइलैंड्स के लोग गरीबी, बेरोजगारी और द्वीपों के बीच होने वाले विवाद के चलते प्रदर्शन कर रहे थे. बता दें कि सोलोमन आइलैंड्स एक संप्रभु राष्ट्र है. ये देश छह मुख्य द्वीपों से मिलकर बना हुआ है और इस देश में 900 छोटे छोटे द्वीप भी शामिल हैं. सोलोमन आइलैंड्स में तनाव कम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के बाद फिजी की सेना भी पहुंच गई है.
अंतरराष्ट्रीय शांति सेना के तहत फिजी ने बीते सोमवार को सोलोमन आइलैंड्स में भेजा है. बता दें कि सोलोमन आइलैंड्स की राजधानी होनियारा में सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे. दंगाई भीड़ ने तीन दिनों तक हिंसा की थी और संसद पर चढ़ाई की कोशिश भी कर डाली थी.
सोलोमन आइलैंड्स में हालात तब बद से बदतर हो गए जब चाइना टाउन इलाके का अधिकतर हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया और दंगाई भीड़ ने प्रधानमंत्री मनासेह सोगवारे के आवास को भी जलाने की कोशिश की गई थी. इसके बाद ही प्रधानमंत्री मनासेह ने मदद की अपील की थी जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने अपनी सेना के जवानों को सोलोमन आइलैंड्स की राजधानी भेजा था.
ऑस्ट्रेलियाई सेना के जवानों के सोलोमन आइलैंड्स की राजधानी होनियारा भेजने के बाद इस क्षेत्र में शांति बहाल हो पाई है. सिर्फ ऑस्ट्रेलिया ही नहीं बल्कि कुछ और देशों से भी इस देश में सेना को बुलाया गया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सोलोमन आइलैंड्स में शांति स्थापित करने के लिए 200 सुरक्षाबल तैनात हैं.
इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इनमें से ज्यादातर ऑस्ट्रेलियाई हैं. इसके अलावा 30 से ज्यादा सैनिक पापुआ न्यू गिनी के हैं. इसके अलावा फिजी ने भी सोलोमन आईलैंड्स में अपने सैनिकों को भेजा है. फिजी के प्रधानमंत्री फ्रैंक बेनिमरामा ने कहा है कि 50 सैनिकों को भेजा गया है और 120 सैनिकों को फिर से दंगा भड़कने के हालातों में तैयार रहने के लिए कहा गया है.
बता दें कि दंगाइयों ने तनाव के दौरान अधिकतर चीन के व्यापार की जगह को लूट लिया है. चीनी समुदाय को तब भी निशाना बनाया गया था जब सोलोमन की सरकार ने 2019 में अपनी राजनयिक नीति को बदल दिया था और ताइवान की जगह उसने चीन से रिश्ते कायम किए थे. अंतरराष्ट्रीय मदद पर चल रहे देश में इस नीति के चलते कई समुदाय गुस्से से भर गए थे.
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