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विश्व

PAK के कारण तालिबान में आपस में ही पड़ी फूट! मुल्ला बरादर और हक्कानी आमने-सामने

Taliban internal conflict
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अफगानिस्तान में सरकार बनाने को लेकर तालिबान में अंदरुनी गुटबाजी सामने आ रही है. इनमें प्रमुख रूप से तीन नाम सामने आ रहे हैं. मुल्ला अब्दुल गनी बरादर, हिब्तुल्लाह अखुंदजादा और सिराजुद्दीन हक्कानी. रिपोर्ट्स के अनुसार, मुल्ला बरादर और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच सरकार बनाने को लेकर काफी तनातनी है और इसके अलावा भी कुछ वजहें हैं जिसके चलते अफगानिस्तान में सरकार बनने को लेकर अड़चनें पेश आ रही हैं.

(प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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1994 में तालिबान का गठन करने वाले चार लोगों में मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का भी नाम था. साल 2001 में अफगानिस्तान में जब अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बेदखल किया था तो मुल्ला बरादर विद्रोह के खिलाफ अहम चेहरे बने थे.  बरादर के बारे में कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यकों से जुड़े तत्वों को सरकार में शामिल कराना चाहते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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हालांकि, हक्कानी नेटवर्क के लीडर सिराजुद्दीन हक्कानी किसी के साथ भी सत्ता को साझा नहीं करना चाहते हैं. हक्कानी नेटवर्क तालिबान के साथ होने के बावजूद अपना एक ताकतवर वजूद अफगानिस्तान में रखता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का भी समर्थन हासिल है. (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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आईएसआई के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद तालिबान के समर्थक माने जाते हैं और उन्होंने हाल ही में काबुल में जाकर हक्कानी नेटवर्क से मुलाकात की थी. उनकी इस मुलाकात के बाद अफगान लोगों ने अफगानिस्तान के मामलों में पाकिस्तान के दखल के चलते कई जगह विरोध भी दर्ज कराया था. आईएसआई इससे पहले हक्कानी नेटवर्क का इस्तेमाल काबुल में मौजूद भारतीय दूतावास पर टारगेट करने के लिए कर चुका है. (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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रिपोर्ट्स के अनुसार, जनरल हमीद इसके अलावा अहमद मसूद और अमरूल्ला सालेह द्वारा तैयार पंजशीर के लड़ाकों के खिलाफ तालिबान के ऑपरेशन्स की गतिविधियां को मॉनीटर करने भी गए थे.  काबुल के मामले पर निगाह बनाने वाले एक सूत्र का कहना है कि हक्कानी नेटवर्क ने बरादर को पीछे हटने के लिए कहा है क्योंकि उन्होंने काबुल पर अपना वर्चस्व बनाया हुआ है. (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के समर्थन के चलते हक्कानी नेटवर्क एक ऐसे तालिबान राज के पक्ष में हैं जो मध्ययुगीन धर्मतंत्र पर चलता हो. अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क द्वारा नियंत्रित सरकार पाकिस्तान की सेना के लिए उपयुक्त मानी जा रही है क्योंकि ये पाकिस्तान को भारत के खिलाफ रणनीतिक मजबूती दे सकता है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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ये साफ है कि काबुल में सत्ता पाने के लिए संघर्ष के हिंसक होने की संभावना है क्योंकि हक्कानी नेटवर्क ने दोहा वार्ताकारों से कहा है कि उन्होंने अपनी ताकत के माध्यम से काबुल में जीत हासिल की है और और चूंकि उन्हें चीन का समर्थन है, ऐसे में उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किसी भी तरह की वैधता में कोई दिलचस्पी नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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वहीं, इस मामले में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का बयान भी आ चुका है. उन्होंने साफ किया था कि अफगानिस्तान में एक ऐसी सरकार होनी चाहिए जो अफगान के लोगों द्वारा चुनी गई हो और इस सरकार को ईरान समर्थन भी देगा. चीन ने भी ईरान की बात का समर्थन दिया था. ये साफ है कि फिलहाल तालिबान को पाकिस्तान से कहीं ज्यादा चीन और ईरान की जरूरत है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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इसके अलावा पंजशीर और तालिबान का विद्रोह भी लगातार सुर्खियों में है. तालिबान कहता रहा है कि उसने पंजशीर पर कब्जा कर लिया है लेकिन नार्दन एलांयस ने बार-बार इन दावों को खारिज किया है. अफगानिस्तान के आर्थिक हालात भी चिंताजनक है और अफगानिस्तान फिलहाल अंतराष्ट्रीय मदद और नई सरकार की मान्यता को लेकर जूझ रहा है.


(प्रतीकात्मक तस्वीर/Getty images)

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