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इतिहास में कुछ ऐसे भी वैज्ञानिक रह चुके हैं, जिन्होंने जानवरों पर नहीं इंसानों पर ही साइंस के एक्सपेरिमेंट कर डाले. कुछ घटनाएं ऐसी हुईं, जिन्हें सुनकर आप भी दंग रह जाएंगे. आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या वैज्ञानिक इस हद तक भी जा सकते हैं? तो चलिए जानते हैं कुछ ऐसे ही एक्सपेरिमेंट्स के बारे में जिन्हें रोकने के लिए कई देशों की सरकार तक को आगे आना पड़ा.
आत्मा का वजन कितना?
अमेरिका में 1907 में डॉक्टर डंकन मैकडोगल (Dr. Duncan Macdougall) ने आत्मा का वजन नापने के लिए एक्स्पेरिमेंट किया. इसके लिए उन्होंने 6 ऐसे मरीजों को चुना जिनकी जल्द ही मौत होने वाली थी. या यूं कहें कि वे मरने की हालत में ही थे. उन सभी को वेट स्केल पर लेटाकर पहले उनका वजन नापा गया. ताकि मरने के तुरंत बाद पता लग सके कि आत्मा का वजन कितना है.
दरअसल, धार्मिक मान्यता के अनुसार यह माना जाता है कि मरने के बाद हमारी आत्मा शरीर को त्याग देती है. बस इसी को लेकर डॉक्टर डंकन ने सोचा कि जैसे ही किसी मरीज की मौत होगी, तुरंत उसका वजन नापा जाएगा. फिर पहले वाले वजन से उस वजन को घटा दिया जाएगा. फिर उससे आसानी से पता लग जाएगा कि आत्मा का वजन कितना होता है.
पहले पेशेंट के वजन में 21 ग्राम की कमी आई. दूसरे पेशेंट का वजन मरने के तुरंत बाद कम तो हुआ, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उनका वजन पहले जैसा ही हो गया. दो अन्य पेशेंट्स के वजन में भी कमी आई. लेकिन थोड़ी ही देर बाद दोनों का वजन पहले से थोड़ा ज्यादा बढ़ गया. जबकि एक पेशेंट की मौत मशीनों को सेट करने के दौरान ही हो गई. इससे उसके वजन का पता नहीं लग पाया.
वहीं, आखिरी पेशेंट के वजन में मौत के बाद कोई बदलाव नहीं आया. लेकिन एक मिनट के बाद उसका वजन 28 ग्राम कम हो गया. इस प्रयोग में सभी के वजन का अंतर अलग-अलग होने के कारण ये बात साबित नहीं हो पाई कि आत्मा जैसी कोई चीज होती है.
बाद में वैज्ञानिक ने बताया कि मरने के बाद वजन में बदलाव शरीर में हुए कुछ बदलावों के कारण होता है. जैसे ब्लड क्लॉटिंग होना, फेफड़ों से आखिरी सांस का बाहर आना, केमिकल रिएक्शन द्वारा उत्पन्न गैसों का शरीर छोड़ना आदि. इस प्रयोग का पता जब सरकार को लगा तो इस प्रयोग पर रोक लगा दी गई.
मृत इंसान को जिंदा करने का एक्सपेरिमेंट
साल 1934 में अमेरिका में एक ऐसा एक्सपेरिमेंट किया गया, जिसमें इंसान को मरने के बाद भी जिंदा करने की कोशिश की गई. ये एक्सपेरिमेंट किया गया था डॉक्टर रॉबर्ट ई. कोर्निश (Dr. Robert E. Cornish) द्वारा. उनका मानना था कि अगर मौत के बाद इंसान के शरीर में किसी तरह खून का प्रवाह फिर से शुरू कर दिया जाए, तो वह इंसान दोबारा जिंदा हो सकता है. क्योंकि जब मौत होती है तो सबसे पहले खून का प्रवाह ही रुकता है.
स प्रयोग के लिए उन्होंने कुछ मरे हुए मरीजों को चुना. उन्होंने कुछ साधारण उपकरणों की मदद ली. इनमें मुख्य था टीटरबोर्ड, जो एक आम सी-सॉ बोर्ड जैसा होता है. इस एक्सपेरिमेंट में रॉबर्ट मृत व्यक्ति को टीटरबोर्ड पर लेटाकर जोर-जोर से घुमाते थे, जिससे शरीर के अंदर रक्त प्रवाह वापस से शुरू किया जा सके. इस प्रयोग को सफल बनाने के लिए उसने मेडिकल प्रक्रिया भी आजमाई लेकिन, सफलता नहीं मिली.
फिर उन्होंने इस एक्सपेरिमेंट को जानवरों पर करने का मन बनाया. मई 1934 को रॉबर्ट ने अपने प्रयोग के लिए 5 कुत्तों का इस्तेमाल किया, जिसका नाम उसने लैजरस (I,II,III,IV और V)रखा. सभी कुत्तों को पहले नॉइट्रोजन गैस मिक्सचर देकर मार दिया गया. फिर वही एक्सपेरिमेंट उनके भी साथ किया गया. कुत्तों के शरीर को टीटरबोर्ड से बांध दिया.
इसके बाद इन कुत्तों के शरीर में इंजेक्शन से ऐसा मिक्सचर डाला गया जिसमें एड्रेनालाईन घुला हुआ था. फिर उनके मुंह में मशीन की मदद से ऑक्सीजन सप्लाई की गई. इस दौरान बोर्ड को आगे-पीछे घुमाया जा रहा था ताकि ये मिक्सचर आसानी से उनके शरीर में घुल जाए.
इस एक्सपेरिमेंट में दो कुत्ते तो जिंदा हो गए लेकिन बाकी तीन जिंदा नहीं हो पाए. इस एक्सपेरिमेंट में मिली कामयाबी के बाद वह इसे और बढ़ाना चाहते थे. लेकिन अमेरिका की सरकार ने ऐसे प्रयोगों पर बैन लगा दिया. क्योंकि यह माना गया कि किसी भी मृत इंसान के शरीर पर एक्सपेरिमेंट करना सभ्यता की दृष्टि से अनैतिक है. लेकिन इसके कुछ सालों बाद 1940 में एक ऐसा ही प्रयोग रूस में भी हुआ.
यहां वैज्ञानिकों ने कुत्ते के शरीर को जिंदा रखने की कोशिश की थी. इस एक्सपेरिमेंट में कुत्ते के गर्दन के भाग को शरीर से अलग कर दिया गया. फिर उसे जिंदा करने के लिए ऑटोजेक्टर मशीन द्वारा शुद्ध खून को नसों में सप्लाई किया गया. खून का प्रवाह दोबारा शुरू होने पर कुत्ते ने थोड़ी हलचल भी की. बाद में इस तरह के प्रयोग पर भी रोक लगा दी गई. क्योंकि इसे एनिमल अब्यूज माना गया.
मनोवैज्ञानिक एक्सपेरिमेंट
1963 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक स्टैनली मिलग्रम (Stanley Milgram) उन्होंने भी इंसानों पर एक प्रयोग किया. दरअसल, वह इंसान द्वारा अपने बॉस या उच्च अधिकारियों के आदेशों को मानने की इच्छा को मापना चाहते थे. वह जानना चाहते थे कि कैसे हिटलर के आदेशों पर उसके साथियों ने लोगों को यातना कैंपों में सालों तक यातना दी. ये एक साइकोलॉजिलक एक्सपेरिमेंट था.
उन्होंने दो कमरों में दो लोगों को रखा. जिनमें एक टीचर और एक सीखने वाला था. कमरे ऐसे थे कि वे दोनों एक दूसरे को सुन तो सकते थे. लेकिन देख नहीं सकते थे.
एक्सपेरिमेंट में टीचर को सीखने वाले से कुछ सवाल पूछने होते थे. फिर हर गलत जवाब पर सीखने वाले को बिजली का झटका लगाया जाता.
इस एक्सपेरिमेंट से यह पता लगा कि कोई भी व्यक्ति किसी की बात सिर्फ इसलिए मानता है, ताकि उसके साथ क्रूर व्यवहार न किया जाए. लोगों के अंदर डर इस कदर बैठ जाता है कि लोग वो भी करने को तैयार हो जाते हैं, जिसे वे कभी करना ही नहीं चाहते. इस एक्सपेरिमेंट का भी लोगों ने खूब विरोध किया. जिसके बाद ऐसे एक्सपेरिमेंट्स को बंद कर दिया गया.
जुड़वा बच्चों पर एक्सपेरिमेंट
विश्व युद्ध-2 के दौरान भी कई ऐसे एक्सपेरिमेंट सामने आए जिन्हें सुनकर रूह कांप जाती है. डॉक्टर जोसेफ मेंगले (Josef Mengele) नामक शख्स जिसे एंजल ऑफ डेथ भी कहा जाता था, उसने उस समय जुड़वा बच्चों पर खतरनाक एक्सपेरिमेंट किया था. जब भी नए बंदियों को डॉक्टर मेंगले के पास लाया जाता तो वह सभी को ध्यान से देखता.
दरअसल, वह जुड़वा बच्चों को लेकर पागल था. उसे जब भी यातना कैंप में कोई जुड़वा बच्चे दिखते तो वह एक्सपेरिमेंट के लिए उन्हें कमर से स्टिच करवा देता, ताकि वे आपस में जुड़ जाएं. कभी एक की आंख में डाई डाल देता और देखता कि इसका असर दूसरे पर भी होता है या नहीं. कभी उनके लिंगों को आपस में बदल देता तो कभी उनके आंख-कान को एक दूसरे से बदल देता.
इस एक्सपेरिमेंट के दौरान बच्चों को अक्सर गैंगरीन नामक बीमारी हो जाती, जिससे उनकी मौत हो जाती थी. यदि एक्सपेरिमेंट के दौरान किसी एक बच्चे की भी मौत हो जाती तो वह दूसरे को भी मार डालता.