निर्वासित अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार में रक्षा मंत्री, जनरल बिस्मिल्लाह मोहम्मदी ने ऐलान किया है किया है कि वे पंजशीर की सुरक्षा करते रहेंगे. उन्होंने कहा है कि पंजशीर घाटी तालिबानी ताकतों का विरोध लगातार करती रहेगी. घाटी में जंग जारी रहेगी. यह बयान एक ऐसे वक्त में आया है जब पंजशीर को छोड़कर अफगानिस्तान की सत्ता पर पूरी तरह से तालिबान काबिज हो गया है.
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी, काबुल में तालिबान के कब्जे से पहले ही देश छोड़कर भाग गए थे. उन्होंने यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) में शरण ली है. हाल ही में खुद यूएई की तरफ से पुष्टि की गई थी और कहा गया था कि मानवीय आधारों पर उन्हें शरण दी गई है.
ऐसी स्थिति में जनरल बिस्मिल्लाह मोहम्मदी के ऐलान को तालिबान के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है. पंजशीर में सेना तालिबान से टक्कर लेने के लिए तैयार है. जाहिर तौर पर तालिबान के लिए भी पंजशीर घाटी पर फतह करना अब भी सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है.
अफगानिस्तानः पांच शेरों की इस घाटी से क्यों दूरी बनाकर रखता है तालिबान? पढ़ें इनसाइड स्टोरी
अफगानिस्तान पर जीत पर पंजशीर में चुनौती!
तालिबानी लड़ाकों ने देखते ही देखते पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया, वहीं पंजशीर में उनके मंसूबे फेल हो गए. तालिबान ने पंजशीर घाटी से अब तक दूरी बनाकर रखी है. पंजशीर का मतलब होता है पांच शेरों की घाटी. यहां तालिबान का जोर नहीं चल रहा है. इसे अफगानिस्तान का अभेद्य किला माना जा रहा है.
पंजशीर के लोग देंगे तालिबान को चुनौती!
पंजशीर के लोगों का कहना है कि वे तालिबानी ताकतों के खिलाफ डटकर मुकाबला करेंगे. यहां के लोगों को तालिबान से खौफ नहीं है. पंजशीर घाटी की आबादी महज 2 लाख है. काबुल के उत्तर में यह इलाका महज 150 किलोमीटर दूर है. यहां पहले भी तालिबान का जोर नहीं चला था. तालिबान को करारी हार मिली थी, अब भी मिल रही है.
70-80 के दशक में भी मिली थी करारी हार
70 और 80 के दशक में एक वक्त ऐसा आया जब तालिबान ने पंजशीर घाटी को जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. फिर भी उन्हें पंजशीर में कामयाबी नहीं मिली. वहीं इसी दौरान जब सोवियत सैनिकों ने अफगानिस्तान पर हमला किया था, तब भी पंजशीर के लड़ाकों ने उन्हें शिकस्त दी थी. ताजिक समुदाय के रहने वाले लोग चंगेज खान के वंशज हैं. यह समुदाय लगातार तालिबानियों के लिए चुनौती बना हुआ है.
10 हजार से ज्यादा फौजी तालिबान को देंगे टक्कर!
पंजशीर के तेवर हमेशा से तालिबान के खिलाफ रहे हैं. तालिबान से लड़ाई के लिए यहां 10 हजार से ज्यादा फौजी तैयार बैठे हैं. ऐसे में तालिबान के लिए यहां की जंग आसान नहीं रहने वाली है. पंजशीर में तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और अफगानिस्तान के वॉर लॉर्ड कहे जाने वाले जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम की फौजें शामिल हैं. वहीं अब जनरल बिस्मिल्लाह मोहम्मदी के ऐलान से तालिबान पर दबाव बढ़ने वाला है.