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कहां गए अफगानिस्तान के वॉरलार्ड्स? क्या तालिबान पर कर सकते हैं पलटवार

अफगानिस्तान (Afghanistan) पर तालिबान (Taliban) का पूरी तरह से कब्जा हो गया है. तालिबान के खिलाफ जाने वाले कई लोगों को या तो मार दिया गया या फिर उन्हें नजरबंद कर दिया गया है. लेकिन तालिबान के खिलाफ मोर्चा संभाले अधिकांश वॉरलॉर्ड्स या तो तालिबान की पकड़ से बाहर हैं या पड़ोसी देशों की सीमाओं में पहुंचकर नई रणनीति बनाने में जुट गए हैं..

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इन लोगों को तालिबान अब तक नहीं पकड़ सका है. (फाइल फोटो)
इन लोगों को तालिबान अब तक नहीं पकड़ सका है. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • तालिबान की गिरफ्त से बाहर देश के 'वॉरलॉर्ड्स'
  • सिर्फ इस्माइल खान को ही पकड़ सका तालिबान

अफगानिस्तान (Afghanistan) पर तालिबान (Taliban) का पूरी तरह से कब्जा हो गया है. काबुल (Kabul) पर कब्जे के बाद राष्ट्रपति अशरफ गनी (Ashraf Ghani) ने देश छोड़ दिया. उनके साथ ही सरकार से जुड़े कई नेता और अधिकारियों के भी देश छोड़ने की खबरें आईं. 

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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना (US Army) की वापसी के बाद से ही तालिबान सक्रिय हो गया था और उसने ढूंढ-ढूंढकर अपने विरोधियों को या तो मार दिया या नजरबंद कर दिया. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें अफगानिस्तान का 'वॉरलॉर्ड्स' कहा जाता है और जो तालिबान के खुलकर लड़ाई लड़ते हैं, उन्हें तालिबान अब तक पकड़ नहीं सका है. सिर्फ इस्माइल खान ही ऐसे हैं जिन्हें तालिबान पकड़ पाया है.

1. अब्दुल रशीद दोस्तम

67 साल के अब्दुल रशीद दोस्तम अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं. वो 2014 से 2020 तक इस पद पर रहे हैं. माना जाता है कि 9/11 के हमले के बाद अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार को गिराने में दोस्तम ने अमेरिकी सेना की काफी मदद की थी. दोस्तम का अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में दबदबा है. उन्हें मजार-ए-शरीफ का 'बूढ़ा शेर' भी कहा जाता है. बताया जा रहा है कि वो इस वक्त उज्बेकिस्तान में हैं. 

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2. अता मोहम्मद नूर

1979 में जब सोवियत रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया तो अता मोहम्मद नूर ने रूसी सेना के खिलाफ लोगों को तैयार किया. इसके बाद सोवियत के खिलाफ बने जमीयत-ए-इस्लामी के कमांडर बने. जब 1996 में तालिबान ने सत्ता संभाली तो उन्होंने अहमद शाह मसूद के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया था. 57 साल के अता मोहम्मद नूर 2004 से जनवरी 2018 तक बल्ख प्रांत के गवर्नर रहे हैं.  अभी बल्ख प्रांत पर तालिबान के कब्जे के बाद से वे गायब हैं और माना जा रहा है कि ताजिकिस्तान के इलाके में चले गए हैं.

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3. अहमद मसूद

अहमद मसूद एंटी तालिबान नेता अहमद शाह मसूद के बेटे हैं. अहमद शाह मसूद ने 1980 के दशक में सोवियत रूस की सेना का डटकर मुकाबला किया था. साथ ही जब तालिबान का राज शुरू हुआ तो उसके खिलाफ भी मोर्चा संभाला. शाह मसूद को 'पंजशीर का शेर' कहा जाता था. उनके रहते पंजशीर पर कोई कब्जा नहीं कर पाया. अब यहां की कमान उनके बेटे अहमद मसूद संभाल रहे हैं. दावा है कि तालिबान अभी तक पंजशीर तक नहीं पहुंच सका है. हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि पंजशीर के नेताओं ने सरेंडर कर दिया है. 

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4. अमरुल्ला सालेह

अमरुल्ला सालेह अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति हैं. जब रविवार को काबुल पर तालिबान ने कब्जा किया तो खबरें आईं कि अमरुल्ला ने राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ देश छोड़ दिया है. हालांकि, बाद में उन्होंने कहा कि वो देश में ही हैं. अब खबरें आ रहीं हैं कि अमरुल्ला सालेह पंजशीर में ही हैं. पंजशीर के नेता अहमद मसूद के साथ मीटिंग की एक तस्वीर भी शेयर हुई है, जिसके बाद माना जा रहा है कि सालेह और मसूद तालिबान से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं.

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5. सलीमा मजारी

सलीमा का जन्म 1980 में ईरान में एक रिफ्यूजी के तौर पर हुआ था. उनकी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुईं. बाद में सलीमा अफगानिस्तान आ गईं. सलीमा बल्ख प्रांत के चारकिंट जिली के गवर्नर भी रहीं. सलीमा और तालिबान के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. तालिबान से निपटने के लिए उन्होंने अपनी फौज तैयार कर रखी है. बताया जाता है कि उनकी फौज में 600 से ज्यादा लोग शामिल हैं. फिलहाल सलीमा कहां हैं? इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन कहा जा रहा है कि सलीमा ईरान पहुंच गई हैं और वहीं से अपनी फौज को ऑपरेट कर रहीं हैं.

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6. इस्माइल खान

इस्माइल खान को 'हेरात का शेर' कहा जाता है. वो हेरात के गवर्नर रहे हैं. पिछले कई दिनों से वो तालिबान के खिलाफ लड़ रहे थे, लेकिन तालिबान ने उन्हें पकड़ लिया. बताया जा रहा है कि तालिबान ने उन्हें घर पर नजरबंद कर दिया है. वो शुरुआत से ही तालिबान के खिलाफ जंग लड़ रहे थे. 2001 में भी जब तालिबानी सरकार को सत्ता से बेदखल करना था, तब अमेरिका को भी इनकी मदद लेनी पड़ी थी. इस्माइल खान को भारत का अच्छा दोस्त भी माना जाता है.

 

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