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कश्मीरी आतंकवाद से क्या रहा है तालिबान का कनेक्शन? पूर्व राजनयिक की किताब से खुलासे

तालिबान और कश्मीर का पुराना वास्ता रहा है. इतिहास के कुछ पन्ने मोड़कर देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि तालिबान की दहशतगर्दी ने घाटी में भी माहौल खराब किया है.

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तालिबान वापसी से भारत की बढ़ी चुनौती ( गेटी इमेज)
तालिबान वापसी से भारत की बढ़ी चुनौती ( गेटी इमेज)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • तालिबान वापसी से भारत की बढ़ी चुनौती
  • कश्मीर को लेकर चिंतित हुआ भारत
  • तालिबान का कश्मीर से सीधा कनेक्शन

अफगानिस्तान में फिर तालिबान का कब्जा है. राष्ट्रपति भाग गए, सेना ने सरेंडर कर दिया है और तालिबान की दहशत हर जगह साफ महसूस की जा सकती है. कहा जा रहा है कि 20 साल बाद तालिबान और ज्यादा ताकतवर बनकर उभरा है. लेकिन तालिबान का ताकतवर बनना भारत के लिए भी खतरे की घंटी है. जिस जम्मू-कश्मीर को कई सालों बाद फिर शांति के रास्ते पर लाया गया है, तालिबान का उभरना उसे भंग करने की क्षमता रखता है.

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तालिबान का कश्मीर से क्या कनेक्शन?

तालिबान और कश्मीर का पुराना वास्ता रहा है. इतिहास के कुछ पन्ने मोड़कर देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि तालिबान की दहशतगर्दी ने घाटी में भी माहौल खराब किया है. 1989 में शुरू हुई सशस्त्र मिलिटेंसी की वजह से जम्मू-कश्मीर में भयंकर हिंसा का दौर शुरू हुआ था. सड़कों पर पत्थरबाजी करता युवक था, आर्मी पर हमले करने वाले आतंकी थे और दहशत में जीने को मजबूर था हर कश्मीरी. लेकिन उस माहौल को खराब करने में सिर्फ स्थानीय आतंकी या मिलिटेंट का हाथ नहीं था, बल्कि कई विदेशी आतंकी भी घाटी में सक्रिय हो गए थे. इन्हीं विदेशी आतंकियों से था तालिबान का नाता.

एक्सपर्ट क्या बताते हैं

एक्सपर्ट बताते हैं कि उस दौर में पाकिस्तान को तालिबान का पूरा साथ मिला था. अफगानिस्तान की धरती पर ही पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह दी जाती थी. पूरी ट्रेनिंग मिलती थी और फिर कश्मीर में घुस आतंक की लकीर खींच दी जाती. जब 1996 में पहली बार तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार बनाई थी, तब जम्मू-कश्मीर में स्थिति भी बद से बदतर होनी शुरू हुई. विदेशी आतंकियों की ना सिर्फ दखलअंदाजी काफी ज्यादा बढ़ गई थी, वहीं उसी दौर में करगिल युद्ध, सदन पर आतंकी हमला जैसी वारदातें देखने को मिलीं. ऐसे में तालिबान की वापसी से कश्मीर का माहौल बिगड़ेगा, इस आशंका से मुंह नहीं फेरा जा सकता.

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कश्मीर में हिंसा, तालिबान के खिलाफ क्या सबूत?

पूर्व भारतीय राजदूत और लेखक राजीव डोगरा ने अपनी किताब Where Borders Bleed में भी इस बारे में विस्तार से बताया है. उन्होंने कहा है कि जब अफगानिस्तान में तालिबान का राज था, तब जम्मू-कश्मीर में स्थिति कैसे बिगड़ रही थी. उनके मुताबिक तब के तालिबानी चीफ मुल्लाह रब्बानी के पाकिस्तनी ISI से करीबी रिश्ते थे. तब ISI चाहता था कि तालिबान के कुछ लड़ाकों को कश्मीर की तरफ भेज दिया जाए. वहां पर अंशाति और आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जाए. पाकिस्तान की पूरी मंशा थी कि तालिबान के करीब 10 हजार से 15 हजार आतंकवादियों को कश्मीर में माहौल खराब करने की जिम्मेदारी दी जाए. ऐसा कर पाकिस्तान एक तरफ अपना दामन साफ रखना चाहता था, वहीं दूसरी तरफ तालिबान के सहारे कश्मीर में भी हिंसा का स्वरूप हमेशा के लिए बदलना चाहता था.

राजीव डोगरा ने अपनी किताब में बताया है कि तब के तालिबानी चीफ मुल्लाह रब्बानी ने पाकिस्तान को आश्वस्त किया था उसकी तरफ से कश्मीर की तरफ 1 लाख लड़ाके भेजे जाएंगे. तो कुछ ऐसा ही था पाकिस्तान और तालिबान का रिश्ता. एजेंडा दोनों के अलग थे, लेकिन माध्यम हमेशा से आतंकवाद रहा.

कंधार कांड ने खोली थीं भारत की आंखें

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इसी आतंकवाद की एक कड़ी 24 दिसंबर 1999 में तब सामने आई जब हवाई जहाज आईसी-814 को हाइजैक किया गया. पांच दिन के उस खौफजदा मंजर ने सभी को अंदर तक झकझोर दिया था. भारत के लिए चुनौती तब और ज्यादा बढ़ गई थी कि जब आतंकियों ने अंत में आईसी 814 को अफगानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर लैंड करवा दिया. मांग स्पष्ट थी, जैश-ए -मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई करवानी थी.

ऐसा कहा जाता है कि कंधार कांड के दौरान भारत सरकार की आतंकियों से तो लगातार बातचीत जारी रही, लेकिन तब की अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार ने कोई सहयोग नहीं किया था. उल्टा उसकी तरफ से मौलाना मसूद अजहर को पाकिस्तान भेजने में पूरी मदद की गई थी. तालिबान की वजह से ही रिहाई के बाद अजहर को अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान भेजा गया था. मतलब आतंकी पाकिस्तान के थे, लेकिन पूरा समर्थन तालिबान का भी रहा. 

तालिबान की भारत से पुरानी दुश्मनी

वैसे भी तालिबान के भारत से कभी अच्छे रिश्ते नहीं रहे हैं. भारत ने हमेशा से अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार की मांग की है. अफगानिस्तान में शांति स्थापित रहे, यही हिंदुस्तान का एक मात्र उदेश्य है. इसी वजह से जब 1996 में तालिबान का अफगानिस्तान में राज था, तब भारत ने उस सरकार को कभी मान्यता नहीं दी. उस दौर में सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा ही उस सरकार को मान्यता मिली. ये भी एक वजह रही कि भारत हमेशा तालिबान की आंखों में चुभा है. तालिबान का आरोप रहा कि भारत ने हमेशा से ही अफगान सेना की पीछे से मदद की है और पक्षपात वाला रवैया अपनाया है.

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इस सब के अलावा तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी क्यों हो रही है, इसका भी कश्मीर से सीधा कनेक्शन रहा है. जब 1989 के दौर में अफगानिस्तान में तालिबान का सोवियत संघ संग युद्ध खत्म होने वाला था, उस दौर में कश्मीर में हिंसा का पनपना शुरू हुआ था. मतलब जैसे ही सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान छोड़ गई, तब तालिबान शक्तिशाली हुआ और उसने धीरे-धीरे पूरे अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया. उसके कई लड़ाकों ने घाटी का माहौल खराब किया और पाकिस्तान को भी सीधी मदद दी.

इमरान खान के बयान ने बढ़ाई चिंता

अब 2021 में फिर वहीं पैटर्न देखने को मिल रहा है. सिर्फ फर्क इतना है कि इस बार सोवियत संघ की जगह अमेरिकी सेना यहां से भागी है और तालिबान को उभरने का एक और मौका मिल गया है. पाकिस्तान के वजीर ए आजम इमरान खान ने भी जिस खुले दिल से तालिबान राज का स्वागत किया है, नीयत पर तो सवाल उठे ही हैं, भारत की कश्मीर को लेकर चिंता भी बढ़ी है. इमरान ने कहा कि जब आप किसी की संस्कृति को अपनाते हैं तो आप इसे श्रेष्ठ मानते हैं और आप इसके गुलाम बन जाते हैं. यह मानसिक गुलामी की एक प्रणाली बनाता है जो वास्तविक गुलामी से भी बदतर है.

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मतलब एक बार फिर तालिबान की मदद से पाकिस्तान, अफगानिस्तान को दहशतगर्दी का अड्डा बनना चाहता है. उस पर आरोप ना लगे इसलिए दूसरे की धरती पर आतंकियों को पनाह दिलवाना चाहता है. ये पाकिस्तान की कोई नई रणनीति नहीं है. जब अमेरिका की तरफ से अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने का फैसला हुआ, तब पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया था. उसने खुद को इस शांति वार्ता के साथ सीधे तौर पर जोड़ लिया था. ऐसे में जितनी भी तालिबान संग शांति वार्ता हुईं, पाकिस्तान उसका हिस्सा रहा. छिपा एजेंडा सिर्फ यही था- अभी अमेरिका की मदद की जाए, फिर बाद में कश्मीर मुद्दे पर उससे मदद मांगी जाएगी. पाकिस्तान का वो सपना तो पूरा नहीं हुआ लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान का राज स्थापित हो गया.

अभी के लिए तालिबान भारत संग अच्छे रिश्तों की बात कर रहा है. वो कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय विवाद बता रहा है. जोर देकर कह रहा है कि इस विवाद से वो दूर रहने वाला है. लेकिन तालिबान की करनी और कथनी में कितना फर्क है, ये बात इतिहास के पन्नों में दर्ज है. ऐसे में भारत सतर्क है और कश्मीर में सुरक्षा को और मजबूत करने पर विचार कर रहा है.

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