सीरिया, ईरान और अमेरिका का ट्राईएंगल समझने के 12 साल पीछे लौटते हैं, जब सीरिया में अरब स्प्रिंग आंदोलन चला था. सीरियाई तानाशह बशर अल-असद के खिलाफ आई जनता उन्हें सत्ता से हटाना चाहती थी. विद्रोह को दबाने के लिए सरकार क्रूरता पर उतर आई. इसमें ईरान ने भी तानाशाह का साथ दिया. इसपर अमेरिका सीरियाई जनता के साथ आ गया. इसकी वजह केवल तानाशाही खत्म करना नहीं, बल्कि ईरान से दुश्मनी भी थी. रूस भी ईरानी तानाशाह की मदद करने लगा. इसने आग में घी का काम किया. तब से सीरिया में अमेरिकी सैनिक हैं.
सीरिया में यूएस आर्मी
अब किसी भी समय सीरिया में अमेरिका के 900 सैनिक और काफी सारे दूसरे लोग आम लोगों की तरह रह रहे हैं. कुल मिलाकर, सीरिया में तख्तापलट की लड़ाई अब ईरान बनाम अमेरिका जंग बनकर रह चुकी है. गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है, वो अलग. हर साल बहुत से सीरियाई लोग शरण लेने के लिए भाग रहे हैं. कुल मिलाकर अमेरिकी सेना के जाने से क्या फर्क पड़ा, ये ग्लोबल तरीके से साफ नहीं.
अफगानिस्तान में बिताए 2 दशक
अफगानिस्तान में अमेरिका लगभग 20 सालों तक टिका रहा. उसने साल 2001 में तालिबान के खात्मे के लिए अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी थी. ये 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद की घटना है. अमेरिका पूरी तरह से अलकायदा के पीछे लगा हुआ था. वहां आर्मी बेस बनाने और आतंकियों को ठिकाने के लिए पानी की तरह पैसे बहाए गए.
कितने पैसे हुए थे खर्च
प्राइस ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के मुताबिक अमेरिका ने इस युद्ध पर 2260 अरब डॉलर खर्च किए हैं. सिर्फ युद्ध लड़ने में ही 815 अरब डॉलर खर्च हो गए. अमेरिका ने रिटायर्ड सैनिकों के इलाज और देखभाल पर 296 अरब डॉलर खर्च किए हैं. युद्ध के बाद अफगानिस्तान के राष्ट्र निर्माण की अलग-अलग परियोजनाओं में 143 अरब डॉलर खर्च हो गए.
इस बात के साथ हुई सेना भेजने की शुरुआत
इक्का-दुक्का नहीं, 70 से ज्यादा देशों में अमेरिका के 8 सौ मिलिट्री बेस हैं. ये दुनिया में सबसे ज्यादा हैं. इस बारे में यूएस मिलिट्री एकेडमी एट वेस्टपॉइंट, न्यूयॉर्क से कई इंटरनेशनल मीडिया ने पड़ताल करनी चाही.इसकी एक नहीं, कई वजहें मिलीं. सबसे बड़ी और पहली वजह अमेरिका ये देता है कि वो हर उस देश की मदद करता है, जो लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं. इस वजह के साथ वो आतंक के मारे सारे देशों में अपने सैनिक भेजने लगा.
पहला मकसद रूस को फैलने से रोकना था
इसकी शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद नाटो की स्थापना से हुई थी. असल में युद्ध खत्म होने के बाद भी सोवियत संघ यूरोप से अपनी सेना हटाने को राजी नहीं था. डेमोक्रेटिक देशों को डर लगने लगा कि कहीं उनके लोग भी सोवियत की तरह कम्युनिस्ट न होने लगें. अमेरिका का रूस से तनाव था ही. तो अप्रैल 1949 में उसने नाटो की स्थापना की, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई यूरोपियन देश थे. तब का मकसद साफ था, रूस को अपने पैर पसारने से रोकना. इसी के साथ यूएस आर्मी देशों के भीतर पहुंचने लगे.
काफी लंबा-चौड़ा है सैन्य बजट
अमेरिकी मिलिट्री बजट लगातार बढ़ने लगा. डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ये 886 बिलियन डॉलर के साथ दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य बजट बन गया. चीन जो सेना पर खुलकर पैसे खर्च कर रहा है, उसका बजट इसका चौथाई और रूस का बजट इसका 10वां हिस्सा ही था. सोशल सिक्योरिटी के बाद यूएस में सबसे ज्यादा पैसे सेना और हथियारों पर लग रहे हैं. लेकिन तब भी ये घाटे का सौदा नहीं है.
वॉर इंडस्ट्री को हो रहा फायदा
असल में वहां एक पूरी की पूरी वॉर इंडस्ट्री है, जो इसी दम पर फल-फूल रही है. अगर अमेरिकी सेना युद्ध-प्रभावित देशों या शांत देशों में शांति बनाए रखने के नाम पर जाना कम कर देगी तो इस इंडस्ट्री पर असर होगा. दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान पनपी इंडस्ट्री ने लीडर्स को पकड़ लिया. वे चुनाव प्रचार के दौरान उनपर पैसे लगाने लगीं. बदले में अलिखित डील रहती है कि वे फलां-तलां देश में सेना को बनाए रखेंगे.
एक वजह और भी है
जिस भी देश में अमेरिकी सेनाज्यादा बड़ी संख्या में होती है, वहां की पॉलिसी से लेकर पॉलिटिक्स पर अमेरिका का असर दिखता है. आर्मी के साथ-साथ एक छोटा-मोटा शहर उस देश में बस जाता है, जहां सबकुछ अमेरिकी हिसाब का होता है. हाल में जर्मनी पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आरोप लगाया था कि वो अमेरिका के कब्जे में है.
अमेरिकी ट्रूप्स की भारी उपस्थिति को लेकर कई बार कई देशों ने आरोप लगाया कि जर्मनी में अब भी अमेरिकी दबदबा है. दरअसल जर्मनी में दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद से ही भारी संख्या में यूएस आर्मी तैनात रही, जो अब भी वापस नहीं लौटी है. फिलहाल जर्मनी एक शांत और स्थिर देश है, ऐसे में भारी फौज का रहना वाकई में संदेह को बल तो देता है.