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सुरक्षा, संबंध और रणनीति... हसीना के एग्जिट से भारत-बांग्लादेश की दोस्ती पर क्या पड़ेगा असर?

शेख हसीना को बांग्लादेश की सत्ता गंवानी पड़ी है और वह फिलहाल भारत में हैं. उनके सत्ता गंवाने से भारत के लिए एक बड़ी मुश्किल साबित हो सकती है. मसलन, अब फिर से यहां बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी जैसे चीन समर्थक गुटों का उदय हो सकता है, जिसका भारत की सीमा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर गंभीर असर पड़ सकता है.

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शेख हसीना, पीएम मोदी
शेख हसीना, पीएम मोदी

शेख हसीना का बांग्लादेश के पीएम पद से इस्तीफा और उनका देश छोड़ना दक्षिण एशिया के जियो-पॉलिटिक्स में अहम बदलाव को दर्शाता है. उनकी सरकार भारत के लिए एक विश्वसनीय सहयोगी रही है. वह भारत विरोधी कट्टरपंथी तत्वों पर नकेल और भारत-चीन के साथ संबंधों में एक संतुलन बनाए रखती थीं. आइए जानते हैं कि आखिर शेख हसीना के जाने से भारत पर क्या असर पड़ सकता है.

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शेख हसीना के बांग्लादेश की सत्ता गंवाने से, भारत विरोधी भावनाओं के फिर से उभरने की संभावना बढ़ गई है. मसलन, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी जैसे चीन समर्थक गुटों का उदय हो सकता है, जिससे बांग्लादेश की विदेश नीति में बदलाव की आशंका है, जो भारत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

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भारत की मुश्किलें, सुरक्षा बड़ी चिंता

शेख हसीना के जाने के बाद बांग्लादेश के राजनीतिक उथल-पुथल से भारत के लिए सुरक्षा चिंता पैदा हुई है. पड़ोस में अस्थिरता की वजह से भारत को सीमा सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. विद्रोही गतिविधियों को रोकने और पूर्वोत्तर सीमाओं पर शांति बनाए रखने की शेख हसीना की पिछली कोशिशों के उलट, भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ सकती है.

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बांग्लादेश में पैदा हुई अस्थिरता की वजह से बांग्लादेश से शरणार्थियों का आगमन बढ़ सकता है, जिससे भारत के लिए सीमा सुरक्षा में मुश्किलें पैदा हो सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां सुरक्षा पहले से ही एक गंभीर चिंता बनी हुई है.

भारत में कांग्रेस की सरकार थी, जब शेख हसीना ने 2009 में बांग्लादेश की कमान संभाली. भारत के लिए उन्हें और उनके परिवार तक को शरण देना राजनयिक हितों को अपने अनुकूल बनाए रखने में फायदेमंद रहा है.

हालांकि, नरेंद्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत हुए हैं. शेख हसीना भी अपना चौथा कार्यकाल शुरू करने के बाद सबसे पहले भारत दौरे पर आईं.

मसलन, अनंत एस्पेन सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची बताती हैं, "हसीना भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशील रही हैं. बदले में, भारत एक उदार पड़ोसी रहा है, जिसने बांग्लादेश के विकास में मदद की है और साथ ही दोनों देशों के बीच आर्थिक और सुरक्षा निर्भरता को दर्शाने के लिए कनेक्टिविटी को बढ़ाया है."

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भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर

शेख हसीना के जाने से भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक संबंध बाधित हो सकते हैं. उनके कार्यकाल के दौरान, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे - जैसे क्षेत्रों में अहम सहयोग के साथ दोनों देशों के बीच अच्छा-खासा व्यापार होता रहा है.

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हसीना के जाने से भारत और बांग्लादेश के बीच राजनयिक संबंधों में फिर से बदलाव हो सकता है. उनके नेतृत्व में, भारत ने बांग्लादेश को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा है, जिसके आपसी हित एक जैसे थे.

अब, उनके जाने से राजनीतिक रूप से शून्य विपक्षी ताकतें फिर से सक्रीय हो सकती हैं, जैसा कि वे एक अंतरिम सरकार के गठन की कोशिशों में लगे हैं और इसके लिए राष्ट्रपति से भी मुलाकात की है.

रणनीतिक स्तर पर भारत की सिरदर्दी

शेख हसीना के जाने से दक्षिण एशिया में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, खासतौर पर चीन के बढ़ते प्रभाव को और मजबूती मिल सकती है, जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है. मसलन, तीस्ता सींचाई परियोजना पर चीन अपनी नजर गराए हुआ था, लेकिन भारत के इसमें सहयोग के ऑफर से शेख हसीना ने अपनी नीतियां भी बदलीं.

प्रोजेक्ट का लोकेशन सिलिगुड़ी कॉरिडोर के करीब है, जो कि भारत के लिए रणनीतिक सिरदर्दी है. यह कॉरिडोर चिकन नेक के रूप में मशहूर है, जो कि सड़क मार्ग से उत्तर पूर्व को जोड़ने का एकमात्र रास्ता है.

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चीन इस परियोजना को हाईजैक करने की पूरी कोशिश में था, जिसके लिए हसीना के नेतृत्व में इसे हासिल करना मुश्किल था, लेकिन बीएनपी और उसकी सहयोगी पार्टियां उसके लिए इसे हासिल करना आसान बना सकती हैं.

ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आसिफ नजरुल कहते हैं, "शेख हसीना ने भारत-चीन के साथ बड़ी ही समझदारी से संबंधों को संभाला है. उन्हें सत्ता बनाने रखने के लिए भारत और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए चीन का साथ अहम था." यही वजह है कि तीस्ता परियोजना को लेकर भी उनपर दबाव था, और यही वजह है कि भारत के साथ वह यह प्रोजेक्ट साइन नहीं कर सकीं.

आसिफ नजरुल बताते हैं कि लोग सवाल करते हैं कि बांग्लादेश भारत को पोर्ट और रेलवे कॉरिडोर दे रहा है, लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? उन्होंने कहा, "लोग इस तरह के कंसेशन को भारत के सपोर्ट से हसीना के सत्ता में बने रहने के लिए (एक ट्रिक) के तौर पर देखते हैं." उन्होंने बताया कि हालिया विरोध-प्रदर्शनों में भी एंटी-इंडिया सेंटीमेंट्स, इन्हीं सब वजहों से देखा गया है.

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