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प्रणब मुखर्जी ने शेख हसीना के लिए तैयार रखा था विमान, 2009 के विद्रोह में भारत ने बचाई थी बांग्लादेशी PM की कुर्सी!

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इसके बाद वह देश छोड़ कर निकल गई हैं. अभी स्पष्ट नहीं है कि वह कहां जाएंगी या कहां जा रही हैं, लेकिन बांग्लादेश के आर्मी चीफ ने एक अंतरिम सरकार के गठन का ऐलान किया है. यह पहली बार नहीं है जब शेख हसीना पर मुसीबत आई है, आइए जानते हैं 2009 का वो विद्रोह जिसमें भारत ने बचाई थी उनकी कुर्सी.

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शेख हसीना
शेख हसीना

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपनी कुर्सी छोड़ने के साथ ही देश भी छोड़ना पड़ा है. पीएम पद से इस्तीफा देने के बाद वह चॉपर में सवार होकर ढाका से निकलीं. वह कहां गई हैं या कहां जा रही हैं, इसकी फिलहाल कोई जानकारी नहीं है. भारत बांग्लादेश का सबसे करीबी सहयोगी रहा है. शेख हसीना के इस्तीफे के बाद आर्मी चीफ ने एक अंतरिम सरकार बनाने का ऐलान किया है. आइए जानते हैं 2009 का वो विद्रोह, जब भारत ने हसीना की कुर्सी बचाई थी.

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फरवरी 2009 में, बांग्लादेश राइफल्स (बीडीआर) ने विद्रोह कर दिया था. इस दौरान बड़ी संख्या में बड़े सैन्य अधिकारियों, उनके परिवारों की हत्या कर दी गई थी. यह बांग्लादेश के इतिहास में सैन्य अधिकारियों के सबसे बुरे नरसंहार में से एक साबित हुआ. हसीना तब दो महीने पहले ही देश की प्रधानमंत्री बनी थीं और रक्षा विभाग भी उन्होंने अपने हाथ में रखा था. जब उन्हें खतरा महसूस हुआ तो उन्होंने भारत को याद किया. उनकी कुर्सी बची और 2009 से ही वह बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं.

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भारत ने जब बचाई शेख हसीना की कुर्सी

जैसे-जैसे विद्रोह बढ़ता गया और हिंसा बढ़ती गई, शेख हसीना ने भारत से मदद मांगी. उन्होंने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी से बात की. हसीना की मदद की गुहार पर विदेश मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने उन्हें मदद का आश्वासन भी दिया. जानकारी मिलने के तुरंत बाद विदेश सचिव रहे शिवशंकर मेनन ने अमेरिका से लेकर ब्रिटेन, जापान और चीन तक से बात की और शेख हसीना की मुश्किलों पर चर्चा की.

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शेख हसीना की तत्काल मदद की गुहार के बाद भारत ने पैराशूट रेजिमेंट की 6वीं बटालियन के पैराट्रूपर्स सहित सैन्य संसाधन तैयार किए. बांग्लादेश में संभावित लैंडिंग के लिए भारतीय सैनिकों को तैयार करने के आदेश जारी किए गए, जिसमें प्रमुख स्थानों पर पैराट्रूपर्स तैनात किए गए. भारतीय जवानों को ढाका एयरपोर्ट और तब पीएम रहीं हसीना की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई.

भारत ने बांग्लादेशी सैन्य नेतृत्व को कड़ा संदेश भेजा. विशेष रूप से सेना प्रमुख जनरल मोइन उद्दीन अहमद को, और चेतावनी दी कि अगर हसीना के खिलाफ किसी भी तरह के फोर्स का इस्तेमाल किया गया तो, भारत तत्काल हस्तक्षेप करेगा. इस सख्त चेतावनी के बाद विद्रोही शांत पड़ गए और भारत की तरफ से सैन्य हस्तक्षेप के बगैर ही मामला शांत हो गया. आने वाले महीनों में सैन्य तख्तापलट की  अफवाहें फैलती रहीं और नई सरकार अस्थिर हो गई.

क्या था पूरा मामला?

फरवरी 2009 के आखिरी में बांग्लादेश राइफल्स अपने वार्षिक तीन दिवसीय समारोह की तैयारी कर रहे थे, जिसे "बीडीआर सप्ताह" के रूप में जाना जाता था. यह एक ऐसा मौका था जब उच्च रैंकिंग वाले अधिकारी और जवान आपस में मिलते थे, चर्चा करते, परेड करते और हथियारों का प्रदर्शन करते और एक बड़ी पार्टी के साथ जश्न मनाते थे. आमतौर पर इस कार्यक्रम में सेना के वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा लिया करते थे. खुद शेख हसीना भी इस कार्यक्रम में पहुंचीं, लेकिन नरसंहार के एक दिन पहले.

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अगले दिन 25 फरवरी को दरबार सजाया गया, जो कि प्रमुख कार्यक्रमों में से एक माना जाता था. कार्यक्रम बांग्लादेश राइफल्स के पिलखाना मुख्यालय में हो रहा था. पिलखाना ढाका में एक पैरामिलिट्री कंटोनमेंट है. इस कार्यक्रम में बीडीआर का टॉप कमांडर भी मौजूद थे. दरबार समारोह में हथियार ले जाने की इजाजत नहीं होती थी, लेकिन 25 फरवरी को बीडीआर के कई जवान दरबार हॉल में हथियार के साथ पहुंचे.

कार्यक्रम शुरू होने के बाद, बीडीआर के महानिदेशक ने वहां मौजूद जवानों को उनकी शिकायतों के बारे में बात करना शुरू किया. लगभग 9:30 बजे, एक बीडीआर सदस्य ने अपनी बंदूक उठाई और मौजूद वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर तान दिया. इसके तुरंत बाद बीडीआर के अन्य हथियारबंद जवान खड़े हो गए. इस दौरान और भी ज्यादा संख्या में बीडीआर के जवान हथियारों के साथ इकट्ठा दरबार हॉल में प्रवेश कर गए.

बस क्या था, हॉल और बैरकों में हत्याओं की लहर शुरू हो गई, जिसमें बीडीआर जवानों ने या तो सैन्य अधिकारियों को बंधक बना लिया, या फिर अधिकारियों को गोली मार दी. हालांकि, इस विद्रोह में पूरा बीडीआर रेजिमेंट शामिल नहीं था. कहा जाता है कि उनमें से कई ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को बचाने की कोशिश भी की, और कुछ ने छिपकर अपनी जान बचाई.

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विद्रोह समाप्त होने तक 74 लोग मारे जा चुके थे, जिनमें 57 सैन्य अधिकारी शामिल थे. इनमें बीडीआर के महानिदेशक शकील अहमद की भी मौत हो गई थी. सैन्य अधिकारियों के अलावा, महानिदेशक की पत्नी और कुछ दोस्तों सहित छह नागरिक भी मारे गए.

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