यूक्रेन में कई नए शेल्टर बन चुके हैं, जो बमबारी के समय लोगों की जान बचा सकें. इस देश में लगभग 5 हजार शेल्टर हैं. अब इनका इंस्पेक्शन चल रहा है ताकि एयर स्ट्राइक में कम से कम मौतें हों. यूक्रेन ये तो सब जंग के दौरान हो रहा है, लेकिन एक देश ऐसा भी है, जिसमें बिना युद्ध के ही इतने बंकर बने कि पूरा का पूरा देश घरों की बजाए बंकरों से भर गया. यूरोपियन देश अल्बानिया में करीब पौने 2 लाख बंकर हैं. काफी बंकरों के चलते यूरोप का ये देश काफी गरीबी में जीता रहा. कुछ समय पहले उसने बंकरों को टूरिस्ट स्पॉट में बदलने की शुरुआत की.
तानाशाह को होने लगा डर
उत्तर-पूर्वी यूरोपियन देश अल्बानिया पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पहले इटली और फिर जर्मनी का कब्जा हुआ. युद्ध खत्म होने के बाद देश आजाद तो हो गया, लेकिन लगातार गुलामी से वो बुरी तरह से तबाह हो चुका था. अब पहली जरूरत थी- अल्बानिया की तरक्की. हालांकि हुआ कुछ अलग ही. देश की कमान कम्युनिस्ट तानाशाह एनवर होक्सहा के हाथ में आ गई. दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है. यही हाल अल्बानिया के साथ भी हुआ. होक्सहा ने माना कि युद्ध खत्म तो दिख रहा है, लेकिन उनका देश सेफ नहीं है.
रेडी रहने का नारा दिया
उन्होंने अल्बानियन भाषा में एक नारा दिया, जिसका अंग्रेजी अर्थ है, हमेशा तैयार रहो. तैयार किसके लिए? जंग के लिए. होक्सहा को असल में शक था कि उसके पड़ोसी देश जैसे ग्रीस, यूगोस्लाविया, नाटो देश हर कोई मिलकर उसे धोखा दे सकता है. यहां तक कि हमेशा साथ निभाते रहे सोवियत संघ (अब रूस) पर भी उसे संदेह था.
वर्ल्ड वॉर बीतने के साथ ही उसने सबसे रिश्ता तोड़ दिया. यहां तक कि वारसॉ संधि से भी बाहर निकल गया. ये नाटो के जवाब में कम्युनिस्ट देशों का गठबंधन था, जिसमें रूस, चीन जैसे बड़े देश शामिल थे.
दोस्तों को छोड़कर वो बंकर बनाने लगा
हमले के खौफ में जीते हुए होक्सहा ने आदेश दिया कि देशभर में बंकर बनवाए जाएं. ये बंकर दो तरह के होंगे, सैन्य उपयोग के लिए, और आम नागरिकों के छिपने के लिए. साठ के दशक के मध्य में बंकर का डिजाइन तैयार हुआ और उसके बाद से लगातार 20 सालों तक देश में रिहायशी इमारतें या कारखाने नहीं, बल्कि बंकर बनते रहे. बंकराइजेशन का ये सिलसिला तानाशाह की मौत के बाद ही रुका.
इतने लाख बंकर हो चुके तैयार
साल 1985 में जब ये सिलसिला थमा, तब तक अल्बानिया में पौने 2 लाख बंकर बन चुके थे. कहीं-कहीं दावा किया जाता है कि पौने 2 नहीं, बल्कि 7 लाख से भी ज्यादा बंकर अल्बानिया में बनाए गए थे. ये रिहायशी इलाकों में, खेल के मैदान में, कब्रिस्तान में, पहाड़ों पर और समुद्र किनारे हर जगह थे.
कितना खर्च आया
कंक्रीट मशरूम्स नाम की किताब के लेखकों की मानें तो बंकर बनाने के इस प्रोजेक्ट पर लगभग ढाई बिलियन डॉलर का (अभी के हिसाब से) का खर्च आया. लंबे समय से गुलामी झेल रहे इस देश ने अपनी सारी दौलत इसी काम पर झोंक दी. उस दौर के अल्बानियन सैन्य इंजीनियर पेलम्ब दुराज ने तानाशाह की मौत के बाद माना था कि तब सैन्य रिसोर्सेज का 80% हिस्सा केवल इन बंकरों को बनाने में लग गया. ये बंकर व्लोर की खाड़ी से लेकर राजधानी तिराना की पहाड़ियों तक और फिर मोंटेनीग्रो की सीमा से लेकर यूनान के द्वीप कोर्फू तक फैले हुए हैं.
सिविलियंस को मिलने लगी ट्रेनिंग
बंकरों के बनने से साथ ही नागरिकों को ट्रेनिंग मिलने लगी कि हवाई हमले की खबर आने पर कैसे उन्हें इन बंकरों में छिप जाना है. लोगों को मिलिट्री ट्रेनिंग भी मिलने लगी. हर महीने 2 बार सिविल-डिफेंस ड्रिल होती, जिसमें बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता.
विरोध पर मौत की सजा
होक्सहा तब अल्बानिया में सबसे ताकतवर शख्स था, लेकिन इस काम ने काफी लोगों को उसके खिलाफ कर दिया. साल 1974 में खुद वहां के डिफेंस मिनिस्टर बकीर बालुकु ने अपनी स्पीच में कहा कि होक्सहा डरा हुआ इंसान है, जिसे लगता है कि सोवियत संघ से लेकर अमेरिका जैसी दो विपरीत ताकतें भी उसी का नुकसान करने वाली हैं. अल्बानिया को डर की नहीं, तरक्की की जरूरत है.
तानाशाह ने इसके तुरंत बाद डिफेंस मिनिस्टर पर चीन के लिए जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार करवा दिया और आनन-फानन मौत की सजा दी गई.
तोड़ने पर कितना खर्च
होक्सहा की मौत के बाद अल्बानिया में भूखे लोग थे और बंकर थे. टाइम मैगजीन की एक रिपोर्ट की मानें तो हर 4 अल्बानी नागरिकों पर 1 बंकर था. वो रेजिडेंशियल इलाकों से लेकर पहाड़ों और समुद्र किनारे तक फैला हुआ था. अब बड़ी समस्या थी कि इन्हें खत्म कैसे किया जाए. अंदाजा लगाया गया कि हर औसत साइज के बंकर को तोड़ने पर लगभग 8 सौ यूरो का खर्च आएगा.
इस तरह हुआ बंकरों का इस्तेमाल
कई देशों ने थोड़ी-बहुत मदद की, लेकिन उतना काफी नहीं था. तब अल्बानिया ने नया तरीका खोजा. पुराने लेकिन अच्छी कंडीशन के बंकरों को ठीक-ठाक करके वहां लोग रहने लगे, जबकि बड़े आकार के बंकरों को सरकार ने आर्ट गैलरीज में बदल दिया. कई बंकरों को म्यूजियम बना दिया गया, जबकि कुछ में सरकारी दफ्तर चलने लगे. बता दें कि लोहे और कंक्रीट से बने बंकर डोम शेप के हैं. नागरिकों के काम आने वाले बंकर इतने बड़े हैं कि 4 से लेकर 100 लोग भी उसमें समा सकें. वहीं सैन्य काम में आने वाले शेल्टर थोड़े छोटे हैं. इन्हें विदेशी टूरिस्टों को किराए पर भी दिया जाता है.