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माओ के 27 और जिनपिंग के 10 साल में चीन में क्या बदला? जिनपिंग को माओ जितना पावरफुल क्यों बताया जा रहा

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कांग्रेस में जब राष्ट्रपति जिनपिंग ने पार्टी के सदस्यों को संबोधित किया तो राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि जिनपिंग माओत्से तुंग की राह पर चल पड़े हैं. माओत्से तुंग यानी कि वो नेता जिन्हें आधुनिक विश्व में कम्युनिज्म का सबसे बड़ा नायक कहा जाता है.

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और माओत्से तुंग की तस्वीरें (फोटो- GETTY)
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और माओत्से तुंग की तस्वीरें (फोटो- GETTY)

बीजिंग के द ग्रेट पीपुल्स हॉल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ताधर्ता अपना नया नेता चुनने के लिए सैकड़ों घंटों की एक मैराथन बैठक कर रहे हैं. उम्मीद है कि इस 22 अक्टूबर को जब ये मीटिंग खत्म होगी तब तक शी जिनपिंग को तीसरी बार चीन का राष्ट्रपति चुन लिया जाएगा.

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति बनते ही शी जिनपिंग शक्ति, लोकप्रियता और आभामंडल के मामले में आधुनिक चीन के निर्माता माओत्से तुंग की बराबरी करने लगेंगे. 

चीन की राजनीति का ये दौर शी जिनपिंग के इर्द-गिर्द घूम रहा है. शी जिनपिंग चीनी राष्ट्रवाद का पोषण कर रहे हैं. देश की संस्थाओं पर उनका अघोषित कब्जा है. जिनपिंग के विरोधी आश्चर्यजनक रूप से करप्शन केस में सजा पा रहे हैं कुछ लोगों को तो मौत की सजा भी मिल रही है.

दरअसल ये पूरा दौर शी जिनपिंग की पर्सनैलिटी कल्ट के रूप में विकसित हो रहा है. कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो ने उन्हें आधिकारिक रूप से rénmín lǐngxiù यानी की पीपुल्स लीडर का खिताब दिया. ये उपाधि अबतक माओ को ही मिला है. 
 
1949 में जब  माओत्से तुंग ने कम्युनिस्ट चीन की स्थापना की थी तो वे भी इसी 'लोकप्रियता' के शिखर पर थे. माओ ने चीन में चल रहे गृह युद्ध का नेतृत्व किया और कम्युनिस्टों की जीत का मार्ग प्रशस्त खोल दिया. कम्युनिस्ट पार्टी के साहित्य में माओत्से तुंग या माओ को क्रांति का जनक कहा जाता है जिन्होंने चीन में सर्वहारा की सरकार स्थापित की. 

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राजनीतिक सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है

माओत्से तुंग द्वारा कही गई एक लाइन क्रांतिकारियों की फेरविट पंक्ति है. वे कहा करते थे- राजनीतिक सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है. इसका अर्थ यह है कि सैन्य शक्ति से ही राजनीतिक शक्ति हासिल होती है.  1949 में आधुनिक चीन की स्थापना के बाद से ही माओ ने सुनिश्चित किया कि चीन की शक्तिशाली पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी पर सरकार नहीं बल्कि पार्टी का नियंत्रण होगा. इस तरह माओ ने राजनीतिक और सैन्य सत्ता का एकीकरण कर दिया. तब से लेकर अबतक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वेसर्वा (महासचिव) ही सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का चेयरमैन होता है. भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसी व्यवस्था अकल्पनीय है. 

माओ ने चीन के जनमानस में क्या बदलाव किया?

चीन में कम्युनिस्ट क्रांति करने के बाद माओ ने 1949 में जनवादी चीनी गणतंत्र की स्थापना की और अपने मृ्त्यु (1976) तक चीन का नेतृत्व करते रहे. इस तरह 27 सालों तक उन्होंने चीन की राजनीति को प्रभावित किया. उन्हीं के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक फैसलों का असर है कि चीन ने अमेरिका और रूस की दादागिरी वाली दुनिया में अपने दम पर अपनी पहचान बनाने में सफर रहा.  

चीनी और कम्युनिस्ट थिंक टैंक मानते हैं कि माओ ने अपनी नीति और कार्यक्रमों के जरिए चीनी जनता की जिंदगी में आर्थिक, तकनीकी एवं सांस्कृतिक बदलाव लाया और चीन को दुनिया की प्रमुख शक्तियों की कतार में खड़ा कर दिया.  

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1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना 

1958 से 1962 के बीच माओ द्वारा चीन के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए चलाई गई द ग्रेट लीप फॉरवर्ड की पॉलिसी ने चीन का कायाकल्प कर दिया. इस नीति का उद्देश्य चीन का तेजी से औद्योगिकीकरण और सामूहिक कृषि के माध्यम से देश की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को औद्योगिक अर्थव्यवस्था में तब्दील करना था. 

चीन ने मास प्रोडक्शन की नीति पकड़ी. इसका असर 20 और 30 साल के बाद देखने को मिला. जब 90, 2000 और 2010 के दशकों में चीन के सस्ते सामान दुनिया की बाजारों में छा गए. भारत भी इससे अछूता न रहा. चाइनीज झालर, खिलौने, कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल मूर्तियां और न जाने कितने सामानों से भारत के बाजार पट गए.  

माओ ने अपनी लाल सेना के जरिए चीन में 'सांस्कृतिक क्रांति' को अंजाम दिया और नागरिकों की ऐसी कैटेगरी तैयार की जो साम्यवाद का समर्थक था, माओ को पूजता था और पूंजीवाद से नफरत करता था. इस जनता की वैचारिक शक्ति का सहारा लेकर माओ ने चीन पर तीन दशकों तक शासन किया.  

हालांकि तीन दशकों के इस कार्यकाल में ऐसा समय भी आया जब माओ पर तानाशाह होने का आरोप लगा. जिन लोगों ने उनका विरोध किया उन्हें साम्यवादी क्रांति में बाधा बताकर समाप्त कर दिया. ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है. 

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शी जिनपिंग ने पकड़ी माओ की राह

माओ के शिष्य शी जिनपिंग ने वही राह पकड़ी. 2012 में सत्ता संभालते ही उन्होंने सबसे पहले सैन्य शक्ति अपने हाथ में ले ली और वे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के चेयरमैन बन गए. शी जिनपिंग 2012 से कम्युनिस्ट पार्टी के चीफ हैं, 2012 से ही वे मिलिट्री कमीशन के चेयरमैन हैं यानी की चीन की सेना का सारा कंमाड उनके हाथ में है और 2013 से वे चीन के राष्ट्रपति हैं.  

सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के बाद जिनपिंग ने देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए औद्योगीकरण की रफ्तार चौथे गियर पर ले गए.  

सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार 2012 में जिनिपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन के ग्रामीण इलाकों में 99 मिलियन व्यक्ति गरीबी की सीमा रेखा से बाहर आए

2012 में चीन में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 564 मिलियन थी जून 2022 में ये संख्या बढ़कर 1.05 बिलियन हो गई है. 

2012 से चीन ने अपने हाई स्पीड रेल नेटवर्क में 32 हजार किलोमीटर का विस्तार किया है. 

चीन ने वृद्ध होती जनसंख्या की समस्या से निपटने के लिए 2015 में सिंगल चाइल्ड पॉलिसी में ढील दे दी और 2021 में इस देश ने थर्ड चाइल्स पॉलिसी को लागू कर दिया. 

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माओ की तरह शी जिनपिंग ने भी आलोचनाओं के बावजूद करप्शन हटाने के लिए सख्ती से काम किया है. 16 अक्टूबर को उन्होंने कहा था कि हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ एक्शन उठाने में एक मिनट की भी देरी नहीं करनी चाहिए. पिछले 10 सालों में चीन ने करप्शन के मामलों में 44 लाख लोगों को सजा दी गई है. इसमें चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के 2 लाख सदस्य भी शामिल हैं. विश्लेषकों कहना है कि जिनपिंग की एंटी-करप्शन मुहिम विरोधियों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को कुचलने के लिए किया गया. 

जिनपिंग ने चीनी राष्ट्रवाद की भावना का पोषण किया. माओ ने जैसे भारत के साथ सीमा विवाद उकसाकर भारत को धोखा दिया वैसे ही जिनपिंग ने अपने पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद तो भड़काया. चीन का आज भारत, फिलीपींस, वियतनाम, जापान, भूटान, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों के साथ सीमा विवाद है. राष्ट्रपति जिनपिंग की नजरें अब ताइवान पर है. 16 अक्टूबर को उन्होंने इसका संदेश भी दे दिया. 

राष्ट्रपति जिनपिंग ने चीन की सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए जिनपिंग की तरह की दमन की नीति पर जोर दिया. शी जिनपिंग ने शींजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों के विरोध को पूरी तरह से कुचल दिया. इसके लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं की जरा भी परवाह नहीं की.  

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