ब्रिटेन में हुए ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने शिरकत की थी. क्लाइमेट चेंज जैसी गंभीर चुनौती से निपटने के लिए दुनिया के कई प्रमुख देशों ने मौजूदगी दर्ज कराई थी. हालांकि, इस सम्मेलन को लेकर तुर्की ब्रिटेन से खफा है. तुर्की ने इस बात पर विरोध दर्ज कराया कि ब्रिटेन ने सम्मेलन में भारत को ज्यादा तवज्जो दी.
दरअसल, इस सम्मेलन का आयोजन स्कॉटलैंड की राजधानी ग्लासगो शहर में हुआ था. इस वैश्विक कार्यक्रम की मेजबानी के लिए यूके के पास पर्याप्त साधन नहीं थे. यही कारण है कि इस सम्मेलन में शामिल होने वाले देशों के प्रतिनिधिमंडलों से यूके ने होटल शेयर करने का आग्रह किया था. इसके अलावा कई देशों के प्रमुखों को सम्मेलन स्थल तक ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई थी.
तुर्की के राष्ट्रपति ने नाराज होकर बनाई सम्मेलन से दूरी
लेकिन यूके, अमेरिका और भारत इस मामले में अपवाद थे. दरअसल, इन तीनों ही देशों के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को उन होटलों में रहने की अनुमति दी गई थी जिसे उन्होंने अपने लिए बुक किया था. वहीं, जो बाइडेन, नरेंद्र मोदी और बोरिस जॉनसन कारों के काफिले के साथ ग्लासगो पहुंचे थे. तुर्की के राष्ट्रपति ने सवाल उठाया कि आखिर भारत के लिए अलग इंतजाम क्यों किए गए थे.
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रोटोकॉल में भेदभाव पर तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी. एर्दोगन रोम में G20 शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ बैठक करने के बाद स्कॉटलैंड में ग्लासगो की यात्रा करने वाले थे लेकिन फिर उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी.
तुर्की के राष्ट्रपति ने इस मामले में कहा था कि कुछ सुरक्षा प्रोटोकॉल थे जिनकी हमने मांग की थी. उन्होंने कहा कि हमें अंतिम समय में बताया गया था कि हमारी मांगें पूरी नहीं हो पाएंगी. हमें बाद में पता चला कि इससे पहले भी एक देश के लिए अपवादस्वरूप कुछ कदम उठाए गए थे जो राजनयिक प्रोटोकॉल के खिलाफ है. हम इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए. फिर हमने ग्लासगो नहीं जाने का फैसला किया. ये फैसला हमारे देश की प्रतिष्ठा को लेकर था. हम अपने देश के लोगों के हितों की रक्षा के लिए बाध्य हैं. हमने दिखाया है कि हम निष्पक्ष दृष्टिकोण से ही एक निष्पक्ष दुनिया का निर्माण कर सकते हैं.