अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और रिपब्लिकन पार्टी के नेता डोनाल्ड ट्रंप एक बार पावर में आ गए हैं. ट्रंप अगले साल जनवरी में सत्ता संभालेंगे लेकिन उनकी घरेलू और विदेश नीति क्या रहेगी, इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. ट्रंप ऐसे वक्त में चुनाव जीतकर आए हैं जब पूरा मध्य-पूर्व युद्ध की चपेट में है और वहां के भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे है. इजरायल अमेरिका के समर्थन से जहां एक तरफ हमास और हिज्बुल्लाह से लड़ रहा है वहीं, दूसरी तरफ ईरान से भी वार-पलटवार की स्थिति बनी हुई है.
मध्य-पूर्व में ट्रंप के लिए इस बार हैं अलग चुनौतियां
ट्रंप के पहले कार्यकाल (जनवरी 2017- जनवरी 2021) में ईरान के खिलाफ अमेरिका को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दोनों का साथ मिल रहा था. उस दौरान ट्रंप प्रशासन ने ईरान के प्रति एक रणनीति अपनाई जिसे 'मैक्सिमम प्रेशर कैंपेन' कहा गया.
इस कैंपेन में 2015 के ईरान के साथ परमाणु समझौते से हटना और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध फिर से लगाना शामिल था. ट्रंप ने 2018 में ईरान के साथ परमाणु समझौते से हटने की घोषणा की थी जिसका लक्ष्य ईरान के परमाणु संवर्धन को रोकने, उसके बैलेस्टिक मिसाइलों पर प्रतिबंध लगाना शामिल था. ट्रंप चाहते थे कि ईरान पर अधिकतम प्रतिबंध लगाए जाएं जिससे वो अपने प्रॉक्सी हमास, हूती और हिज्बुल्लाह को भी समर्थन न दे पाए.
अमेरिका ने ईरान पर यह प्रतिबंध अकेले नहीं लगाए बल्कि इसमें अपने सहयोगियों, भागीदारों और यहां तक कि अपने विरोधियों को भी शामिल करने की कोशिश की ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाए और वो पूरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाए.
ईरान को लेकर सऊदी-यूएई की नीति में बदलाव
ट्रंप प्रशासन को इस मामले में कुछ हद तक सफलता मिली, खास तौर पर सऊदी अरब और यूएई से समर्थन जुटाने में. मध्य-पूर्व की ये दोनों शक्तियां उस वक्त ईरानी सरकार को कमजोर करने की इच्छुक थीं.
इससे पड़ोसी सऊदी अरब और यूएई दोनों ही देश ईरान के निशाने पर आ गए. गुस्साए ईरान ने ट्रंप के साथ समझौता करने के बजाए, ईरान ने अपने पड़ोसियों पर दबाव बढ़ा दिया और दोनों के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से सैन्य बल का इस्तेमाल किया.
सऊदी और यूएई को ईरान और उसके प्रॉक्सी की कार्रवाइयों से बेहद नुकसान हुआ. ईरान के प्रॉक्सी हूतियों ने दोनों देशों के तेल ठिकानों पर बड़े हमले किए. इससे परेशान दोनों देशों ने अंततः ईरान के साथ शांति बहाल करने में ही अपनी भलाई समझी.
यूएई ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिश करने वाला पहला देश था, जिसने अगस्त 2022 में संबंधों को सामान्य करने के लिए एक समझौता किया. सऊदी अरब ने भी यही किया और चीन की मध्यस्थता से हुए एक समझौते में मार्च 2023 में ईरान के साथ संबंध बहाल कर लिए.
ट्रंप के निर्वाचन के बाद सऊदी, यूएई ने ईरान को लेकर दे दिया है बड़ा संकेत
ईरान के साथ संबंधों की बहाली के बाद दोनों ही देशों ने उससे संबंधों को और मजबूत ही करने की कोशिश की है. ट्रंप की जीत के बाद सऊदी अरब के रियाद में इस्लामिक सहयोग संगठन और अरब लीग की संयुक्त बैठक हुई थी जिसमें ईरान के उप-राष्ट्रपति मोहम्मद रजा अरेफ को भी आमंत्रित किया गया था. इस सम्मेलन में सऊदी, यूएई जैसे देशों ने न केवल इजरायल के खिलाफ एकजुटता दिखाई बल्कि ईरान के साथ भी खड़े दिखाई दिए.
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सम्मेलन में इजरायल के खिलाफ खुलकर ईरान का साथ दिया था. उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इजरायल पर यह जिम्मेदारी डालनी चाहिए कि वह 'ईरान की संप्रभुता का सम्मान करे और उसकी संप्रभुता का उल्लंघन न करे.'
ट्रंप की बढ़ेंगी मुश्किलें
ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की बात कही है लेकिन इस बार मध्य-पूर्व के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदले हुए हैं. बहुत संभव है कि इस बार ट्रंप को ईरान के खिलाफ मध्य-पूर्व की दो बड़ी शक्तियों सऊदी अरब और यूएई का साथ नहीं मिलेगा.
ऐसे में ट्रंप के लिए ईरान पर अधिकतम प्रतिबंध लगाकर दबाव बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा और उनका ईरान को अलग-थलग करने का एजेंडा फेल हो सकता है.