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बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठन सक्रिय, अंतरिम सरकार के प्रमुख यूनुस से मिले हिफाजत-ए-इस्लाम के नेता

हिफाजत-ए-इस्लाम एक इस्लामवादी की वकालत करने वाला समूह है, जिसने 2010 में अपने गठन के बाद से बांग्लादेश में धार्मिक उपदेश देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. संगठन मुख्य रूप से कौमी मदरसों के शिक्षकों और छात्रों से बना है, जिसका उद्देश्य इस्लाम के रूढ़िवादी मूल्यों को संरक्षित करना है और प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तनों का विरोध करना है.

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बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार है.
बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार है.

बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच अब देश की मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार कट्टरपंथियों को संभालने में जुट गई है. विवादित नेता राजधानी ढाका में सरकारी प्रतिनिधियों से मुलाकात करते दिख रहे हैं. शनिवार को अंतरिम सरकार के प्रमुख डॉ. यूनुस ने ढाका में कट्टरपंथी समूह हिफाजत-ए-इस्लाम के नेता मामूनुल हक और उनके समूह के अन्य सदस्यों से मुलाकात की. सूत्रों का कहना है कि आधिकारिक तौर पर हिफजात नेताओं और डॉक्टर यूनुस के बीच बैठक में चुनाव सुधार को लेकर बातचीत हुई. प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर चर्चा की गई. हालांकि तस्वीरें आने के बाद विवाद छिड़ गया है.

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यहां बताना जरूरी है कि मामूनुल हक को शेख हसीना शासन के दौरान हिंसा भड़काने समेत गंभीर आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया था. जब शेख हसीना ने बांग्लादेश छोड़ा तो विपक्षी दल के अधिकांश नेता को नए शासन ने रिहा कर दिया. इसमें कट्टरपंथी इस्लामी समूह के नेताओं के नाम भी शामिल हैं.

जमात-ए-बांग्लादेश संगठन भी सक्रिय

मामूनुल हक उन लोगों में से थे, जिन्हें नई सरकार ने रिहा कर दिया. बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी संगठन भी काफी सक्रिय देखा जा रहा है. इस खुली बैठक के बाद सवाल उठ रहे हैं. हिफाजत-ए-इस्लाम और उनके नेता भारत विरोधी रुख अपनाने और अक्सर भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के लिए जाने जाते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे के दौरान कट्टरपंथी हिफाजत-ए-इस्लाम नेता मामूनुल हक ने विरोध प्रदर्शन किया था. यह कट्टरपंथी संगठन बांग्लादेश में मदरसे चलाता है और अक्सर अपने उपदेशों में बांग्लादेश के संविधान का विरोध करता है.

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हिफाजत-ए-इस्लाम एक इस्लामवादी की वकालत करने वाला समूह है, जिसने 2010 में अपने गठन के बाद से बांग्लादेश में धार्मिक उपदेश देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. संगठन मुख्य रूप से कौमी मदरसों के शिक्षकों और छात्रों से बना है, जिसका उद्देश्य इस्लाम के रूढ़िवादी मूल्यों को संरक्षित करना है और प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तनों का विरोध करना है. पिछले कुछ वर्षों में समूह ने विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने कठोर रुख के लिए सुर्खियां बटोरी हैं, जिसका अक्सर देश के भीतर धर्मनिरपेक्ष गुटों के साथ टकराव होता है. हिफाजत-ए-इस्लाम से जुड़े कट्टरपंथी मौलवी मामूनुल हक विवादास्पद शख्स के रूप में उभरे हैं. 1973 में जन्मे हक ने कई प्रसिद्ध मदरसों में अध्ययन किया और अपनी वाक्पटुता और इस्लामी ज्ञान के कारण तेजी से चर्चा में आए. अपने उग्र भाषणों और अडिग दृष्टिकोण के लिए जाने जाने वाले हक ने उत्साही समर्थकों और प्रखर आलोचकों दोनों को आकर्षित किया है.

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