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फिनलैंड के NATO में जाने से रूस क्यों बौखलाया? पुतिन की टेंशन का है ये कारण

फिनलैंड के विदेश मंत्री ने जब अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को नाटो की सदस्यता प्रक्रिया को पूरा करने के दस्तावेज सौंपे. उसके साथ ही वह नाटो का 31वां सदस्य बन गया. लेकिन फिनलैंड और नाटो का यह कदम पुतिन को रास नहीं आया और उसने इसका हर्जाना भुगतने की धमकी तक दे डाली. 

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व्लादिमीर पुतिन
व्लादिमीर पुतिन

रूस का पड़ोसी देश फिनलैंड मंगलवार को आधिकारिक रूप से नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) में शामिल हो गया है. फिनलैंड का नाटो का सदस्य बनना रूस के लिए कतई अच्छी खबर नहीं है. यूक्रेन पर हमले के पहले से ही रूस नाटो के विस्तार को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता आया है. 

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फिनलैंड के विदेश मंत्री ने जब अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को नाटो की सदस्यता प्रक्रिया को पूरा करने के दस्तावेज सौंपे. उसके साथ ही वह नाटो का 31वां सदस्य बन गया. लेकिन फिनलैंड और नाटो का यह कदम पुतिन को रास नहीं आया और उसने इसका हर्जाना भुगतने की धमकी तक दे डाली. 

नाटो के इस कदम से क्यों खफा हैं पुतिन?

यह कोई पहली बार नहीं है, जब किसी पड़ोसी देश के नाटो में शामिल होने से रूस खफा है. इससे पहले 2008 में जॉर्जिया ने नाटो से जुड़ने की कोशिश की थी, जिससे रूस आगबबूला हो गया था. पुतिन ने उस समय इसे उनके देश पर सीधा हमला तक बता दिया था. 

नाटो से पुतिन की नाराजगी की एक वजह इस सैन्य संगठन का सदस्य बनने पर सदस्यों को सुरक्षा का आश्वासन देना है.  नाटो के गठन के समय हुए समझौते से इसमें शामिल होने वाले सभी यूरोपीय देशों के लिए खुले दरवाजे की नीति अपनाई गई थी. इसके तहत इसमें कोई भी यूरोपीय देश शामिल हो सकता था. इसके सदस्य देशों के लिए एक सुरक्षा का प्रावधान भी था, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई बाहरी देश इसके सदस्य देशों पर हमला करता है तो फिर सभी सदस्य देश मिलकर उसकी रक्षा करेंगे.

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ऐसे में फिनलैंड के नाटो का सदस्य बनने पर नाटो की सेनाएं उसकी सीमा पर तैनात होंगी, जो रूस के अनुरूप उसके लिए खतरे की घंटी होगी. यही वजह है कि नाटो में फिनलैंड का शामिल होना रूस के लिए बड़ा झटका है. फिनलैंड के नाटो में शामिल होने का मतलब है कि नाटो रूस की सीमा के बेहद नजदीक पहुंच गया है और पुतिन को यह कतई स्वीकार नहीं है.

नाटो मतलब क्या...?

NATO यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन. ये एक सैन्य गठबंधन है, जिसका मकसद साझा सुरक्षा नीति पर काम करना है. अगर कोई बाहरी देश किसी नाटो देश पर हमला करता है, तो उसे बाकी सदस्य देशों पर हुआ हमला माना जाएगा और उसकी रक्षा के लिए सभी देश मदद करेंगे.

नाटो का गठन 1949 में हुआ था. लेकिन इसकी नींव दूसरे विश्व युद्ध के समय ही पड़ गई थी. दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के इलाकों से सेनाएं हटाने से इनकार कर दिया था. 1948 में बर्लिन को भी घेर लिया. इसके बाद अमेरिका ने सोवियत संघ की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए 1949 में नाटो की शुरुआत की.

जब नाटो का गठन हुआ था, तब उसमें 12 सदस्य थे. इनमें अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नॉर्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क शामिल थे. फिनलैंड के शामिल होते ही अब इसमें 31 सदस्य हो गए हैं.

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ये देश हैं- अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक, एस्टोनिया, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, मोंटेनेग्रो, नॉर्थ मेसेडोनिया, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की और फिनलैंड.

लेकिन इससे पुतिन को दिक्कत क्या है?

ये समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया दो खेमों में बंट गई थी. दो सुपरपावर बन चुके थे. एक था- अमेरिका और दूसरा- सोवियत संघ.

लेकिन 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ भी टूट गया. टूटकर 15 नए देश बने. ये देश थे- आर्मेनिया, अजरबैजान, बेलारूस, एस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, कीर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान.

सोवियत संघ के बिखरने के बाद अमेरिका ही एकमात्र सुपरपावर बन गया. अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो अपना विस्तार करते चला गया. सोवियत संघ से टूटकर बने देश भी नाटो से जुड़ते गए. 2004 में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया नाटो में शामिल हो गए. 2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को भी नाटो में शामिल होने का न्योता मिला था, लेकिन उस समय दोनों देश सदस्य नहीं बन सके.

दिसंबर 2021 में पुतिन ने नाटो के विस्तार पर आपत्ति जताई थी. पुतिन ने कहा था, 'हमने साफ कर दिया है कि पूरब में नाटो का विस्तार मंजूर नहीं है. अमेरिका हमारे दरवाजे पर मिसाइलों के साथ खड़ा है. अगर कनाडा या मेक्सिको की सीमा पर मिसाइलें तैनात कर दी जाएं तो अमेरिका को कैसा लगेगा?'

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