ईरान में हेलिकॉप्टर हादसे में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री समेत 9 लोगों की मौत हो गई है. ईरान ने अपने दो अहम नेताओं को ऐसे समय खोया है, जब इजरायल के साथ उसके रिश्ते टकराव की स्थित में पहुंच गए हैं. हालांकि, ईरान में सत्ता का संकट नहीं है, क्योंकि वहां राष्ट्रपति से भी ज्यादा पावरफुल सुप्रीम लीडर होता है और इस समय ईरान में सुप्रीम लीडर 85 साल के अयातुल्लाह खामेनेई हैं. सोमवार को उन्होंने दो बड़े फैसले लिए. सबसे पहले रईसी के निधन पर संवेदना जताई और देश में पांच दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है. उसके बाद उपराष्ट्रपति मोहम्मद मोखबर (68 साल) को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया है. अब तक राष्ट्रपति रईसी को खामेनेई का उत्तराधिकारी माना जाता था. लेकिन अब नए चेहरे को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. पहले जान लेते हैं कि ईरान में सुप्रीम लीडर कैसे चुना जाता है?
ईरान में क्या हो गया है?
ईरान में रविवार शाम पहाड़ी क्षेत्र में खराब मौसम की वजह से राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया है. इस हेलिकॉप्टर में विदेश मंत्री, गर्वनर और क्रू मेंबर्स समेत 9 लोग सवार थे. सभी लोगों की मौत हो गई है. जब हादसा हुआ, उस समय रईसी अजरबैजान बॉर्डर पर एक कार्यक्रम में शामिल होकर लौट रहे थे. उनके काफिले में शामिल दो अन्य हेलिकॉप्टर सुरक्षित लौट आए. सोमवार को दुर्घटनाग्रस्त हेलिकॉप्टर का मलबा मिला. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने उपराष्ट्रपति मोहम्मद मोखबर (68 साल) को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया है. मोखबर अधिकतम 50 दिन तक ही इस पद पर रह सकते हैं यानी उन पर इस अवधि के अंदर चुनाव कराए जाने की बड़ी जिम्मेदारी होगी.
खामेनेई ने एक बयान में कहा, मोखबर अब कार्यकारिणी की देखरेख करेंगे और वो विधायिका और न्यायपालिका के साथ मिलकर ज्यादा से ज्यादा 50 दिनों के अंदर नया राष्ट्रपति चुनने में मदद करने के लिए बाध्य होंगे. मोखबर को भी खामेनेई का वफादार माना जाता है.
यह भी पढ़ें: लेजर बीम से मोसाद की साजिश तक... ईरानी राष्ट्रपति रईसी की मौत पर कौन-कौन सी थ्योरी की हो रही चर्चा?
ईरान में सबसे ताकतवर होते हैं सुप्रीम लीडर
मध्य पूर्व एशिया में ईरान को सबसे शक्तिशाली और शिया बहुल देश माना जाता है. ईरान में सुप्रीम लीडर को सबसे बड़ा धर्मगुरु भी माना जाता है. किसी भी जरूरी मुद्दे पर उनका फैसला आखिरी माना जाता है और वही दुनिया के लिए ईरान की नीतियों और तरीकों का फैसला करते हैं. ईरान में सुप्रीम लीडर के बाद दूसरा नंबर राष्ट्रपति का आता है. इस समय ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई सुप्रीम लीडर हैं. वे 1989 से इस पद पर बने हुए हैं. यानी 35 साल से सबसे ऊंचे पद पर बैठे हैं. सुप्रीम लीडर देश से जुड़े सभी मामलों पर अंतिम फैसला देते हैं. राष्ट्र प्रमुख और सशस्त्र बलों के 'कमांडर इन चीफ' की जिम्मेदारी भी संभालते हैं. विदेश नीति भी तय करते हैं. सुप्रीम लीडर के पास बाकी पदों पर लोगों को नियुक्त करने या उन्हें बर्खास्त करने की पावर भी होती है. खामेनेई अब तक दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें इस पद के लिए चुना गया है. खामेनेई के नेतृत्व में मध्य-पूर्व एशिया के अंदर ईरान का प्रभाव बढ़ा है.
ईरान में कैसे चुना जाता है सुप्रीम लीडर?
ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सुप्रीम लीडर का पद बनाया गया था. सिर्फ पुरुष ही सुप्रीम लीडर बन सकते हैं. कोई भी सुप्रीम लीडर आजीवन या मृत्यु अथवा बर्खास्त होने तक पद पर बना रह सकता है. पहले सुप्रीम लीडर इस्लामिक रिपब्लिक ईरान के संस्थापक अयातुल्ला रुहोल्लाह खामेनेई बने थे. उनके निधन के बाद 1989 में अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर चुने गए. चूंकि, ईरान में इस्लामिक कानून लागू है. इसके मुताबिक, सुप्रीम लीडर बनने के लिए अयातुल्ला होना जरूरी है. यानी ये पद शीर्ष स्तर के धर्मगुरु को ही दिया जा सकता है. लेकिन जब खामेनेई को सुप्रीम लीडर बनाया गया था, तब वे अयातुल्ला नहीं थे. इसलिए उन्हें सुप्रीम लीडर बनाने के लिए कानून में संशोधन में भी किया गया था.
यह भी पढ़ें: 'देखते हैं ईरान की जांच में क्या निकलता है...', रईसी की मौत पर आया अमेरिका का बयान
सुप्रीम लीडर की नियुक्त की क्या है पूरी प्रक्रिया?
ईरान में इस्लामिक जानकारों का 88 सदस्यीय एक ग्रुप होता है. ये ग्रुप ही सुप्रीम लीडर के नाम पर अंतिम मुहर लगाता है. इस ग्रुप को असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स भी कहा जाता है. इस ग्रुप के मेंबर्स का 8 साल में चुनाव होता है और ईरानी के नागरिक इन सदस्यों को चुनते हैं. हालांकि, असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स चुनाव में उम्मीदवार कौन-कौन होंगे, यह काउंसिल ऑफ गार्जियन नाम की कमेटी तय करती है. काउंसिल ऑफ गार्जियन संसद की गतिविधियों की देखरेख करती है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गार्जियन काउंसिल के सदस्यों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सुप्रीम लीडर ही चुनते हैं. इसके 12 सदस्यों में से 6 की नियुक्ति सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर करता है. यानी सुप्रीम लीडर का असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स और गार्जियन काउंसिल दोनों ही कमेटियों पर प्रभाव होता है. कई दशकों से खामेनेई ने गार्जियन काउंसिल के लिए इस्लामिक कट्टरपंथियों को चुना है, जो उनके इशारे पर काम करते हैं. ईरान के संविधान के अनुसार असेंबली ऑफ एक्सपर्ट सैद्धांतिक रूप से सुप्रीम लीडर को बर्खास्त भी कर सकता है.
अब खामेनेई के उत्तराधिकारी पर चर्चाएं
इब्राहिम रईसी को सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का बेहद करीबी माना जाता था. यहां तक कि रईसी को खामेनेई के उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जाता था. खामेनेई 1989 में सुप्रीम लीडर बनने से पहले खुद राष्ट्रपति का पद संभाल चुके हैं. रईसी के शुरुआती करियर से लेकर राष्ट्रपति चुने जाने तक में खामेनेई की बड़ी भूमिका मानी जाती है. रईसी को खामेनेई का पूरा समर्थन हासिल था. हर प्रमुख विषय पर खामेनेई और रईसी के विचार एक-दूसरे से मेल खाते थे. इतना ही नहीं, रईसी ने सुप्रीम लीडर की प्रत्येक नीतियों को लागू भी करके दिखाया. हालांकि, खामेनेई ने अभी किसी उत्तराधिकारी के नाम का ऐलान नहीं किया है. ईरान पर नजर रखने वालों का कहना है कि खामेनेई के उत्तराधिकारी की दौड़ में नाम तो काफी हैं, लेकिन पहला नाम रईसी का था. दूसरा खामेनेई के बेटे मोजतबा का नाम दौड़ में आगे है. मोजतबा के बारे में कहा जाता है कि वो पर्दे के पीछे खासा प्रभाव रखते हैं.
यह भी पढ़ें: 'सिग्नल सिस्टम थे ही नहीं या आखिरी वक्त में काम नहीं आए...', ईरानी राष्ट्रपति रईसी की मौत पर तुर्किए ने जताया संदेह
जॉन हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर वली नस्र कहते हैं, ईरान में एक ग्रुप ऐसा भी है, जो रईसी को सुप्रीम लीडर के तौर पर देखना चाहता था. हालांकि, अब उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. नस्र ने कहा, फिलहाल कोई अन्य उम्मीदवार नहीं है और यही कारण है कि ईरान में राष्ट्रपति चुनाव चाहे जैसे भी हों, लेकिन आगे क्या होगा, इसके बारे में हर किसी की नजर है.
सूत्र कहते हैं कि मोजतबा की संभावित उम्मीदवारी पर संदेह देखने को मिल रहा है. मोजतबा मीडिएम कैटेगिरी के मौलवी हैं और शिया पवित्र शहर कोम में स्थित मदरसा में धार्मिक शिक्षा देते हैं. सूत्र कहते हैं कि खामेनेई ने अपने बेटे की उम्मीदवारी का विरोध करने का संकेत दिया है. क्योंकि वो देश में वंशानुगत सिस्टम को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं.
यह भी पढ़ें: बर्फीला तूफान, घने जंगल और ऊंची पहाड़ियां... इन हालात में क्रैश हुआ ईरानी राष्ट्रपति का हेलिकॉप्टर