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यूं ही अमेरिका से नहीं उलझता उत्तर कोरिया, तीसरा विश्व युद्ध छिड़े तो इस हद तक तबाही मचा सकता है ये छोटा-सा देश

अमेरिका और साउथ कोरिया के बीच न्यूक्लियर डील के बाद से नॉर्थ कोरिया गुस्से में है. वहां के सैन्य तानाशाह किंग जोंग की बहन किम यो जोंग ने चेतावनी दी कि इस डील से हालात और बिगड़ सकते हैं. ये पहली बार नहीं. नॉर्थ कोरिया लगातार अमेरिका के खिलाफ बोलता रहता है. लेकिन सोचने की बात है कि अमेरिका जैसे सुपरपावर के सामने उत्तर कोरिया कहां टिकता है?

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उत्तर कोरिया के सैन्य शासक किम जोंग उन. सांकेतिक फोटो (AP)
उत्तर कोरिया के सैन्य शासक किम जोंग उन. सांकेतिक फोटो (AP)

सबसे पहले समझते हैं कि क्या है वो डील, जिसने उत्तर कोरिया को उकसाया. हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साउथ कोरियाई राष्ट्रपति युन सुक येओल से मुलाकात की. इस दौरान बाइडेन ने वादा किया कि वो दक्षिण कोरिया में न्यूक्लियर वेपन रखेंगे, जिसके बदले में कोरिया न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं चलाएगा. इस डील को वॉशिंगटन डिक्लेरेशन कहा गया. इसके पीछे वजह भी उत्तर कोरिया ही है. वो अपने पड़ोसी दक्षिण कोरिया समेत अमेरिका को लगातार परमाणु हथियारों की धौंस दिखाता रहता है. 

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दक्षिण कोरिया ने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए हुए हैं, लिहाजा वो परमाणु ताकत नहीं जुटा रहा. इसके बदले में अमेरिका उसे सुरक्षा का वादा देता है. 

अब क्या बदल रहा है

रूस और यूक्रेन जंग छिड़ने के बाद से नॉर्थ कोरिया की आक्रामकता बढ़ी. ऐसे में सिओल के भीतर कहीं न कहीं ये डर आ गया कि अगर ऐन वक्त पर अमेरिका ने उतनी मदद न की तो देश की सेफ्टी को खतरा हो सकता है. अब दक्षिण कोरियाई आबादी का मन भी बदलने लगा है.

खुद साउथ कोरियाई जनता चाहती है मजबूती

अमेरिका स्थित कार्नेगी एंडोमेंट और शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स ने फरवरी में एक शोध पत्र प्रकाशित किया. इसके अनुसार, लगभग 70 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई चाहते हैं कि देश के पास परमाणु हथियार होना चाहिए. हालांकि डील तोड़कर वेपन बनाने के कई खतरे हैं. इससे दक्षिण कोरिया पर पाबंदियां लग सकती हैं. 

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अमेरिका और उत्तर कोरिया में लगभग 7 दशक से तनाव बना हुआ है. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

नॉर्थ कोरिया को अमेरिका पर गुस्सा क्यों है

ये कहानी 50 के दशक से शुरू होती है. तब कोरियाई युद्ध हुआ था. इस समय उत्तरी कोरियाई इलाके से दक्षिणी इलाके पर हमले होने लगे. रूस और चीन जैसे कम्युनिस्ट देश उत्तर के सपोर्ट में आ गए, जबकि अमेरिका ने साउथ कोरिया का साथ दिया. ये एक तरह से पूंजीवाद बनाम साम्यवाद की लड़ाई हो चुकी थी. 

बर्बाद हो गया था देश

अमेरिका ने ताकत दिखाने के लिए उत्तर कोरिया पर बमबारी शुरू कर दी. माना जाता है कि इस दौरान सैकड़ों-हजारों नहीं, लाखों मौतें हुई होंगी. लगभग तीन साल तक बड़े-छोटे हमले चलते रहे. इसके बाद युद्धविराम तो हुआ, लेकिन उत्तर कोरिया बुरी तरह से तबाह हो चुका था. उसके मन में आज भी अमेरिका को लेकर गुस्सा है. इसके बाद ये देश परमाणु ताकत जुटाने में लग गया. अमेरिका ने तुरंत उसपर पाबंदियां लगा दीं. नतीजा ये है कि वो दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ व्यापार भी नहीं कर सकता है. ये दोहरी मार थी, जिसने नॉर्थ कोरिया को गुस्से को बनाए रखा. 

क्या उसके गुस्से से डरा जाना चाहिए

भयंकर तबाही से निकलने के बाद दशकों से आइसोलेशन में रहता ये देश अगर धमकी देता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. अब तक इसने किसी पर सीधा हमला तो नहीं किया है, लेकिन तैयारी भरपूर है. ये परमाणु बम, हाइड्रोजन बम और यहां तक कि इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल तक का परीक्षण कर चुका.

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किम जोंग के देश में लगातार परमाणु परीक्षण होते रहे. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

कितनी परमाणु ताकत है इस देश के पास

जीडीपी में भले पिछड़ा हुआ हो, लेकिन न्यूक्लियर वेपन के मामले में उत्तर कोरिया काफी ताकतवर माना जाता है. वो लगातार ही कोई न कोई परीक्षण करता रहता है. इस बीच कई रक्षा संस्थाओं ने ये जानना चाहा कि आखिर उसके पास कितने परमाणु वेपन हैं. इसपर अलग-अलग अंदाजे मिले. फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंस्टिट्स के मुताबिक, किम जोंग के पास लगभग 37 न्यूक्लियर वेपन हैं. वहीं कई रिपोर्ट्स दावा करती हैं कि ये आंकड़ा 100 तक पहुंच चुका होगा. 

हिरोशिमा से 6 गुना ज्यादा खतरनाक हथियार

नॉर्थ कोरिया के पास सबसे खतरनाक हथियारों का अनुमान लगाते हुए यूनाइटेड स्टेट्स जिओलॉजिकल सर्वे (USGS) ने एक खौफनाक बात कही. साल 2017 के आखिर में उसने कहा था कि किम जोंग के पास जो सबसे घातक न्यूक्लियर हथियार है, वो हिरोशिमा-नागासाकी पर गिरे बमों से 6 गुना से भी ज्यादा ताकतवर है. साथ ही इसे बनाने में जो एक्सप्लोजिव ट्राइनाइट्रोटॉलिविन इस्तेमाल हुआ है, वो बाद में भी अपना घातक असर बनाए रखता है. 

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ये देश अपनी सैन्य सुरक्षा को लेकर खासा आक्रामक है. सांकेतिक फोटो (AP)

समुद्र में भी तबाही मचाने की बात 

उत्तर कोरिया चाहे तो समुद्र पर हमला करके सुनामी जैसा असर पैदा कर सकता है, ये बात खुद किम जोंग ने कही थी. टाइम मैगजीन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, उसके पास अंडरवॉटर अटैक ड्रोन हैं, जिनकी मदद से रेडियोएक्टिव सुनामी लाई जा सकती है. ऐसा तब होगा, जब ये देश पानी के जरिए न्यूक्लियर हमला करेगा. अगर ऐसा होता है, तो पानी में रहने वाले जीव-जंतु तो मरेंगे ही, पानी का इस्तेमाल करने वाले भी खतरनाक रेडियोएक्टिव संक्रमण का शिकार हो जाएंगे. इसका असर पीढ़ियों तक रह सकता है. 

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मिसाइल की पहुंच कितनी है

देश के पास बहुतेरी मिसाइलें हैं, जो अलग-अलग दूरी तक वार कर सकती हैं. सबसे लंबी दूरी तक जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल 15 हजार किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक अटैक कर सकती है. यानी ये दूसरे महाद्वीप पर भी हमला कर सकती है. इसके बाद 13 हजार किमी से लेकर 150 किमी तक अटैक कर सकने वाली मिसाइलें हैं. ये डेटा सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट का है. लगभग यही बात दूसरी संस्थाएं भी करती हैं. 

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उत्तर कोरिया के न्यूक्लियर वेपन इंटरकॉन्टिनेंटर हमला करने की क्षमता रखते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

हजारों टन नर्व एजेंट्स का भंडार

अगर केमिकल वेपन की बात आए तो किम जोंग का देश बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. कथित तौर पर यहां पर वीएक्स और सेरिन नाम के घातक नर्व एजेंट बनाए और जमा किए जा रहे हैं. नॉर्थ कोरिया खुद तो इस बारे में काफी सीक्रेटिव है, लेकिन साउथ कोरियन डिफेंस मिनिस्ट्री के मुताबिक 2020 में उसके पास ढाई से 5 हजार टन तक नर्व एजेंट्स थे. ये आंकड़ा सैटलाइट इमेजों के अलावा वहां से भागे वैज्ञानिकों ने बताया. कुल मिलाकर, इतनी मात्रा में लाखों लोगों को मौत दी जा सकती है. 

बता दें कि नर्व एजेंट्स की बहुत सूक्ष्म मात्रा भी जानलेवा हो सकती है. यही वजह है कि केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) में लगभग 190 देशों ने इसके इस्तेमाल की पाबंदी पर हामी भरी थी, लेकिन नॉर्थ कोरिया इसमें शामिल नहीं है.

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