श्रीलंका पहले महंगाई और आर्थिक संकट की आग में जल रहा था. अब हिंसा और दंगों की आग में भी जल रहा है. जिसकी शुरुआत तब हुई जब 9 मई को इस्तीफा देने वाले प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के समर्थकों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमला कर दिया. उसके बाद स्थिति इतनी ज्यादा बेकाबू हो गई कि प्रधानमंत्री राजपक्षे को जान बचाकर भागना पड़ा.
आर्थिक संकट को लेकर बढ़ते विरोध-प्रदर्शन के बीच राष्ट्रपति गोटबाया गोटबाया राजपक्षे ने देश में बिगड़ते हालात की बात करते हुए इमरजेंसी लगाने का फैसला लिया था. श्रीलंका में जब इमरजेंसी लगाने का फैसला लिया गया, बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे.
आरोप है कि राजपक्षे परिवार के भ्रष्टाचार और अदूरदर्शी नीतियों की वजह से ही श्रीलंका की ये हालत हुई है. जिन्होंने अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए टैक्स की दरें कम कर दीं. जिससे हालात बिगड़े. श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को तो चीन का करीबी माना जाता है.
श्रीलंका के प्रधानमंत्री का पद छोड़ चुके महिंदा राजपक्षे पर जाफना में तमिलों के नरसंहार से लेकर देश को कर्ज में डुबोने तक के गंभीर इल्जाम लग चुके हैं. महिंदा राजपक्षे 2004 में श्रीलंका के 13वें पीएम बने थे. तब भी देश तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा था लेकिन फिर भी जनता ने उन पर भरोसा जताया था.
साल 2000 के बाद से श्रीलंका पर ज्यादातर राज उन्हीं का रहा, लेकिन इन्हीं दो दशकों में श्रीलंका आबाद से बर्बाद भी हो गया. जानते हैं राजपक्षे के उदय से लेकर अस्त होने तक की दास्तान.
6 अप्रैल 2004: सुनामी की आपदा को संभाला
2004 में महेंद्र राजपक्षे की प्रधानमंत्री के तौर पर ताजपोशी हुई. जिस पोर्ट सिटी हंबनटोटा पर इन दिनों चीन की एक तरह से हुकूमत चल रही है, राजपाक्षे वहीं से आते हैं. उनको पॉलेटिकल बैकग्राउंड विरासत में मिली थी. दुर्भाग्य से उसी साल दिसंबर में सुनामी आई.
सबसे ज्यादा बर्बाद होने वाले देशों में श्रीलंका दूसरे नंबर पर था. खैर चार दिन बाद ही सही राजपक्षे जाफना गए, जहां तमिलियंस पर बर्बरता की खबरों ने पूरी दुनिया में खलबली मचाई थी. सुनामी की आपदा को राजपाक्षे ने ठीक ठंग से संभाला. यही वजह थी कि अगले साल राजपाक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव जीता.
18 नवंबर 2005: तमिल आंदोलन को दबा दिया
यह वर्ष राजपक्षे के राज का शीर्षकाल था. इससे पहले कि उनके राजकाल का हनीमून पीरिएड खत्म होता, तमिल आंदोलन ने एक बार सिर उठाया और सरकार ने उसे सख्ती से कुचल दिया. अप्रैल 2006 में त्रिंकोमाली में 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया.
2009: तमिल मुख्यालय को कब्जे में लिया
2009 में श्रीलंकाई फौज ने तमिल मुख्यालय को कब्जे में ले लिया. इसके पहले तक किलिनोच्ची पर विद्रोहियों का कब्जा था, उनकी फोर्स थी, उनकी अदालत, उनका कानून, उनका प्रशासन. राजपाक्षे ने इसे सख्ती से कुचल दिया.
18 मई 2009: प्रभाकरण को मार गिराया
श्रीलंका की स्पेशल फोर्स ने 18 मई 2009 को लिट्टे के लीडर वेलुपिल्लई प्रभाकरन को उस वक्त मार गिराया, जब वो वॉर जोन से भाग निकलने की तैयारी में था. अपने लिए अलग देश की मांग करने वाले लिट्टे के इस आंदोलन या खूनी संघर्ष में तबतक 1 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे. खैर प्रभाकरन की मौत के बाद वो आंदोलन भी खत्म हो गया.
2010: कानून की शक्तियां अपने हाथ में लीं
वेलुपिल्लई प्रभाकरन को खत्म करने के बाद नतीजा यह हुआ कि 2010 में राजपक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव भारी बहुमत से जीता और कानून की तमाम शक्तियों को संविधान संशोधन कर अपने हाथ में ले लिया.
2014: राजपक्षे के खिलाफ दुनियाभर में विरोध
2014 में यूनाइटेड नेशन के सामने बहुत से लोगों ने राजपक्षे की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया. पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने राजपाक्षे को तमिल कम्युनिटी के खिलाफ राजपक्षे की नीतियों की निंदा की.
इस बीच राजपक्षे ने चीन और जापान के साथ कई द्विपक्षीय समझौतों पर साइन किया. खासकर श्रीलंका में निवेश के बाद से चीन से उधार पर उधार लेते रहे और यहीं से ड्रैगन के चक्रव्यूह में घिरते गए.
2015: घूस तक के लगे आरोप, हार गए चुनाव
अपनी नीतियों के कारण विरोध झेल रहे महिंदा राजपक्षे 2015 में चुनाव हार गए. उनके सबसे करीब सहयागी ने ही उन्हें सबसे बड़ा आघात दिया था. राजपक्षे के खिलाफ घूस से लेकर चुनाव में चंदा उगाही तक के आरोप लगे. उनके खिलाफ जांच भी हुई.
2019: भाई ने फिर से बना दिया प्रधानमंत्री
महेंद्र राजपाक्षे का सूरज तब फिर चमका जब 2019 में उनके भाई गोटाबाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने और उन्होंने महेंद्र राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया.
2022: और बेकाबू हो गए देश के हालात
2022 में जब महंगाई आसामान छूने लगी, चीन से लिए कर्ज में श्रीलंका डूबने लगा, विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया, जनता ने विद्रोह कर दिया, राजपक्षे को आखिरकार अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी है.