टैक्सेशन किसी भी देश के लिए रेवेन्यू पैदा करने में सबसे अहम है. एक निश्चित आय के बाद हर कमाऊ व्यक्ति को टैक्स भरना होता है. सरकार तक पहुंचे ये पैसे सरकारी स्कीम्स में लगते हैं. इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल है- जैसे सड़कें, पुल, बांध बनना. हेल्थकेयर भी शामिल है और एजुकेशन भी.
मोटा-मोटी टैक्स दो हिस्सों में बांटा जाता है. डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स. डायरेक्ट टैक्स वो है, जो सीधे लिया जाता है. इनकम टैक्स, शेयर या किसी प्रॉपर्टी से होने वाली आय पर लगने वाले टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, विरासत में मिली संपत्ति पर टैक्स डायरेक्ट टैक्स के उदाहरण हैं. वहीं इनडायरेक्ट टैक्स सीधे तो नहीं जाता है लेकिन किसी तरह की सर्विस या खरीदी पर ये टैक्स लगता है.
इन देशों में नहीं लगता टैक्स
अब बारी आती है उन देशों की, जो टैक्स-फ्री हैं, या जहां बहुत कम कर लग रहा है. लगभग दर्जनभर देश ही ऐसे हैं. इनमें तेल-निर्यातक देश सबसे ऊपर हैं. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का नाम इसमें सबसे ऊपर है. यहां के लोगों को कोई टैक्स नहीं देना होता, लेकिन तब भी यहां विकास में कोई कमी नहीं. इसकी वजह है यहां तेल का अकूत भंडार.
तेल और टूरिज्म से कमाई
दुनिया के सबसे बड़े तेल-निर्यातक देशों में शामिल यूएई की जीडीपी में ऑइल इंडस्ट्री से खूब कमाई होती है. इसके अलावा यहां टूरिज्म भी फल-फूल रहा है. मिडिल ईस्ट के अलावा दुनिया के लगभग सभी देशों के सैलानी यहां घूमने और खरीदारी करने आते हैं. गोल्ड पर्चेजिंग के लिए भी लोग यहां आना पसंद करते हैं, जिसकी वजह ये है कि यूएई में सोना बाकी देशों की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत सस्ता मिल जाता है. इसका भी बड़ा अमाउंट टैक्स-फ्री होता है. तो इस तरह से टूरिज्म इंडस्ट्री भी इस देश की सरकार को जमकर कमाई करवा रही है. ऐसे में नागरिकों को टैक्स भरने की जरूरत नहीं पड़ती.
बहुत कम टैक्स लेने वाले देशों में बरमुडा भी शामिल
कैरेबियन द्वीप समूह को दुनिया के सबसे खूबसूरत लेकिन महंगे हिस्सों में गिना जाता है. यहां रहने वालों को किसी भी सर्विस के लिए भारी पैसे देने होते हैं. सैलेरी पर तो यहां कोई टैक्स नहीं लेकिन पेरोल टैक्स यहां लागू है. यानी कंपनी या कारखाने के मालिकों को टैक्स देना होगा. साथ ही लैंड टैक्स भी यहां चलता है. इसके अलावा अगर कोई लंबे समय के लिए किराए पर रह रहा है तो उसे भी जमीन का टैक्स भरना पड़ता है.
मोनैको टैक्स-फ्री, तब भी काफी अमीर
फ्रांस के भूमध्य सागर तट पर बसे देश मोनेको को भी टैक्स हैवन माना जाता है. लंबाई-चौड़ाई में ये न्यूयॉर्क सिटी के सेंट्रल पार्क से भी कम है. केवल 2.02 स्क्वैयर किलोमीटर में फैला ये देश अपनी बेहिसाब अमीरी के लिए जाना जाता है. यहां लगभग 40 हजार की आबादी में लगभग 12 हजार लोग ही इस देश के मूल नागरिक हैं, बाकी लोग दुनिया के दूसरे देशों से आकर बसे हैं ताकि टैक्स सेव हो सके. मोनेको में ही रहते हुए दुनियाभर में व्यापार करते हैं, जिसका उन्हें टैक्स नहीं देना पड़ता.
ये देश अपनी इकनॉमी के लिए पर्यटन और बैंकिंग पर टिका हुआ है. यहां का मौसम सालभर शानदार रहता है, जिससे सर्दियों में सीजनल डिसऑर्डर से बचने के लिए एक तरह से पूरा यूरोप यहां उमड़ आता है. विंटर ब्लूज से बचने के लिए बाकी पश्चिमी देशों से भी पर्यटक यहां आते हैं. उनके मनोरंजन के लिए यहां एक से बढ़कर एक रिसोर्ट और कैसिनो हैं.
लीगल रेजिडेंट परमिट भी आय का जरिया
मोनेको में लीगल रेजिडेंट परमिट पाना और देशों से काफी आसान और जल्दी होने वाली प्रोसेस है. सिर्फ तीन महीनों में ये हो सकता है, लेकिन उसके लिए आपको साढ़े 44 लाख रुपए वहां के बैंक में जमा करने होंगे. तो इससे समझा जा सकता है कि ये छोटा सा देश कैसे इतना अमीर है और क्यों आराम से चल रहा है.
सोशल सिक्योरिटी पर लगते हैं पैसे
इन देशों के अलावा मिडिल ईस्ट के कई देश, जैसे कतर, ओमान और सऊदी अरब में नागरिकों को पर्सनल इनकम टैक्स नहीं देना होता है. निजी आय पर कर नहीं होने के बावजूद कुछ न कुछ हिस्सा देश के राजस्व में जाता है. जैसे सोशल सिक्योरिटी के नाम पर ये सारे देश कुछ निश्चित प्रतिशत लेते हैं. बहरीन में नागरिकों को आयकर नहीं देना पड़ता, लेकिन इनकम का 7 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक सुरक्षा में जमा कराना पड़ता है. इसके अलावा लैंड टैक्स भी यहां लागू है.
क्यों हो सकता है खतरा?
टैक्स हैवन कहलाते इन देशों में आय का बड़ा जरिया वे विदेशी हैं, जो परमिट लेकर यहां रहते और व्यापार करते हैं ताकि कर न देना पड़े. हालांकि कई बार एक्सपर्ट इस बात को देशों की सुरक्षा में खतरा भी बता चुके. मिसाल के तौर पर कतर या मोनैको को लें तो वहां के मूल नागरिक बहुत कम हैं, जबकि बड़ा हिस्सा विदेशियों का है. ऐसे में अगर कभी तनाव के हालात बने तो देश की इकनॉमी से लेकर सेफ्टी तक को खतरा हो सकता है. इकनॉमी में योगदान दे रहे विदेशी अगर इन देशों से जाने लगे तो कुछ ही घंटों या दिनों में ऐसे देश दिवालिया होने की कगार पर भी पहुंच सकते हैं.