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अमेरिका को नाराज करके ज्यादा कीमत पर रूसी तेल खरीद रहा भारत, क्यों?

रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के मकसद से अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश रूस पर आर्थिक प्रतिबंध और उसके तेल पर प्राइस कैप लगाए हुए हैं. इसके बावजूद भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है. खास बात यह है कि भारत प्राइस कैप से ज्यादा कीमत पर रूसी तेल खरीद रहा है.

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-रॉयटर्स)
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-रॉयटर्स)

अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों की ओर से रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत का रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदना जारी है. फाइनेंशियल एनालिसिस सॉफ्टवेयर Refinitiv Eikon के लेटेस्ट डेटा के अनुसार, अप्रैल महीने में रूस में लोडेड यूराल तेल कार्गो सबसे ज्यादा भारत और चीन पहुंचा है. यानी अप्रैल महीने में अभी तक सबसे ज्यादा रूसी तेल भारत और चीन ने खरीदा है. 

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रॉयटर्स कैलकुलेशन रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने अप्रैल महीने में जितना भी समुद्री रास्तों से तेल निर्यात किया है, उसका 70 प्रतिशत से अधिक भारत ने और लगभग 20 प्रतिशत चीन ने आयात किया है. सिर्फ 10 प्रतिशत तेल ही अन्य देशों ने आयात किया है. मार्च महीने में भी भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में रूसी तेल आयात किया था. पिछले छह महीने से रूस, भारत के लिए सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है.

प्राइस कैप से ज्यादा कीमत पर तेल खरीद रहा है भारत और चीन

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि दोनों देशों के द्वारा अप्रैल महीने में खरीदे गए ज्यादातर रूसी तेल की कीमत पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए प्राइस कैप 60 डॉलर प्रति बैरल से अधिक है. इसका मतलब यह है कि पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध और प्राइस कैप के बावजूद रूस कच्चा तेल बेचकर जबरदस्त रेवेन्यू कमा रहा है. जबकि अमेरिका, जी-7 और अन्य पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध और प्राइस कैप का मकसद ही रूसी अर्थव्यवस्था को कमजोर करना था. 

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रूसी रेवन्यू पर वर्तमान प्राइस कैप का ज्यादा प्रभाव नहीं होने के कारण पोलैंड जैसे यूरोपीय देश प्राइस कैप को और कम करने की मांग कर रहे हैं. प्राइस कैप का मतलब यह है कि रूस प्राइस कैप के तहत तय कीमत से ज्यादा कीमत पर तेल नहीं बेच सकता. हालांकि, जी-7 से जुड़े एक सूत्र ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बताया है कि पोलैंड जैसे देशों की ओर से लगातार दबाव बनाए जाने के बावजूद अभी रूसी तेल पर लागू प्राइस कैप 60 डॉलर प्रति बैरल ही रहने की संभावना है.

प्राइस कैप का समर्थन करने वालों का कहना है कि सस्ती कीमत पर तेल निर्यात करने के कारण रूस के राजस्व में कमी आई है. जबकि प्राइस कैप का विरोध करने वालों का कहना है कि रूस को यूक्रेन युद्ध से पीछे हटने के लिए उठाए गए उपायों में से यह एक कमजोर उपाय है.

प्राइस कैप का असर नहीं

भारत और चीन ने प्राइस कैप को शुरू से ही मानने से इनकार कर दिया है. इसके बावजूद, अमेरिका समेत पश्चिमी देशों को यह उम्मीद थी कि प्राइस कैप के उल्लंघन के बाद प्रतिबंधों का खतरा तेल व्यापारियों को प्राइस कैप से ऊपर तेल खरीदने से रोकेगा. प्राइस कैप से ऊपर तेल आयात पर कंपनियों को शिपिंग, बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सहायता नहीं देने का प्रावधान है. लेकिन इसका ज्यादा प्रभाव दिखा नहीं. 

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रूसी तेल पर प्राइस कैप लगाने के पक्षधर G7 के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "प्राइस कैप काम कर रहा था. हमारा मानना है कि जैसे-जैसे बाजार विकसित होता है, वैश्विक बाजार कीमतों के सापेक्ष रूस को मिलने वाली छूट में उतार-चढ़ाव होगा. लेकिन अभी भी रूस को अपने तेल के लिए मिलने वाली कीमतें अन्य उत्पादकों की तुलना में काफी कम है, जो प्राइस कैप के प्रभाव को दर्शाता है. 

रूसी तेल की कीमत में बढ़ोतरी के कारण

तेल व्यापारियों के अनुसार, भारत के लिए डीईएस (डिलीवर एक्स-शिप) के आधार पर ब्रेंट क्रूड की तुलना में रूसी यूराल पर औसत छूट 13 डॉलर प्रति बैरल है. जबकि चीन को मिलने वाली औसत छूट 9 डॉलर प्रति बैरल है. वहीं, बाल्टिक बंदरगाहों से भारत और चीन के बंदरगाहों तक लाने में शिपिंग लागत क्रमशः 10.5 डॉलर प्रति बैरल और 14 डॉलर प्रति बैरल है. इस आधार पर देखें तो अप्रैल में रूसी तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से अधिक ही रही है. 

इसके अलावा हाल ही में रूस और ओपेक प्लस ने तेल उत्पादन में प्रतिदिन लगभग 36 लाख बैरल की कटौती की घोषणा की है. इस घोषणा के बाद से ही तेल की कीमत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. ओपेक + के इस कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 8% तक बढ़ गई है. ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत बढ़ने का असर यह हुआ है कि रूसी तेल की कीमत में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. 

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हालांकि, पिछले कुछ सप्ताह की बात करें तो शिपिंग लागत में काफी कमी आई है क्योंकि रूसी बंदरगाह पर बर्फबारी कम हुई है और टैंकर भी अधिक उपलब्ध हो गए हैं. व्यापारियों के मुताबिक, दो सप्ताह पहले जिस कार्गो को बाल्टिक बंदरगाह से भारत लाने में 8 से 8.1 मिलियन डॉलर लागत आती थी, वो घटकर 7.5- $ 7.6 मिलियन डॉलर हो गई है. वहीं, बाल्टिक बंदरगाहों से चीन जाने वाली जिस टैंकर की लागत लगभग 11 मिलयन डॉलर आती थी, वह गिरकर 10 मिलियन डॉलर हो गई है. 

 

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