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भारत के वो राजा जो द्वितीय विश्व युद्ध में पोलैंड के लिए बने मसीहा, इतने साल बाद भी यूरोपीय देश में किए जाते हैं याद

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 1939 में, पोलैंड पर सोवियत संघ और जर्मनी द्वारा आक्रमण किया गया और विभाजित कर दिया गया. नतीजा यह हुआ कि जनरल सिकोरस्की के नेतृत्व वाली पोलिश सरकार लंदन में निर्वासन में चली गई. बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएं, अनाथ और विकलांग लोगों को सोवियत संघ में निर्वासित कर दिया गया, जहां उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. इस मानवीय संकट से निपटने के लिए महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने इन बच्चों को अपने राज्य नवानगर में शरण दी.

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फोटो साभार: Centre for Poland-Asia Studies
फोटो साभार: Centre for Poland-Asia Studies

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 अगस्त को दो दिवसीय पोलैंड यात्रा पर जा रहे हैं. यह चार दशकों से अधिक समय में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली पोलैंड यात्रा है. पोलैंड और भारत के संबंधों का इतिहास बेहद दिलचस्प है जो द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ा है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जामनगर के महाराजा और कोल्हापुर के छत्रपति ने पोलैंड के हजारों शरणार्थियों को शरण दी थी.

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पोलैंड में आज भी भारतीय महाराजा के योगदान को याद किया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है. अपनी पोलैंड यात्रा के दौरान पीएम मोदी जाम साहब ऑफ नवानगर मेमोरियल भी जाएंगे. नवानगर के शासक, महाराजा जाम साहेब दिग्विजयसिंहजी रणजीतसिंहजी जडेजा ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में 1,000 पोलिश बच्चों को बचाया था. इन बच्चों के लिए एक दूसरा कैंप कोल्हापुर में भोसले छत्रपति ने भी स्थापित किया था.  

भारत ने पोलिश शरणार्थियों को दी शरण

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 1939 में, पोलैंड पर सोवियत संघ और जर्मनी द्वारा आक्रमण किया गया और इसे विभाजित कर दिया गया था. नतीजा यह हुआ कि जनरल सिकोरस्की के नेतृत्व वाली पोलिश सरकार लंदन में निर्वासन में चली गई. बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएं, अनाथ और विकलांग लोगों को सोवियत संघ में निर्वासित कर दिया गया, जहां उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा.

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जनरल सिकोरस्की ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से पोलिश लोगों के लिए शरण की मांग की थी. चर्चिल ने तब भारत की ओर देखा जो उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था. जल्द ही, दिल्ली में नवानगर (अब जामनगर, गुजरात) के महाराजा जाम साहब दिग्विजय के राज्य में एक शरणार्थी शिविर स्थापित करने का निर्णय लिया गया.

कैंप में हर मूलभूत सुविधा की सुनिश्चित

इस मानवीय संकट से निपटने के लिए महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने इन बच्चों को अपने राज्य नवानगर में शरण दी. उन्होंने छात्रावास बनवाए और शरणार्थियों के लिए भोजन, कपड़े, मेडिकल केयर और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित कीं. उन्होंने बच्चों के लिए पढ़ाई-लिखाई की खास व्यवस्था की. उन्होंने पोलिश टीचर्स का इंतजाम किया जो शरणार्थी बच्चों को पढ़ाते थे. उनके इन प्रयासों से अशांति से जूझ रहे लोगों को सामान्य स्थिति का आभास हुआ.

पोलैंड में है 'स्क्वायर ऑफ द गुड महाराजा'

उन्होंने थिएटर ग्रुप, आर्ट स्टूडियो और सांस्कृतिक गतिविधियों की भी व्यवस्था की. बालाचडी में पोलिश अनाथों को शरण देने के लिए जाम साहब को आज भी पोलैंड में याद किया जाता है. पोलैंड ने राजधानी वारसॉ में एक चौराहे का नाम उनके नाम पर रखकर महाराजा दिग्विजयसिंहजी को सम्मानित किया है, जिसे 'स्क्वायर ऑफ द गुड महाराजा' के नाम से जाना जाता है. 

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उन्हें एक स्कूल भी समर्पित किया गया है. उन्हें मरणोपरांत पोलैंड गणराज्य के कमांडर क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया. महाराजा यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से ग्रेजुएट थे. वह दो दशकों तक ब्रिटिश सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट भी रहे.

कोल्हापुर में भी स्थापित किया गया कैंप

दूसरी तरफ छत्रपति भोंसले के नेतृत्व में भी कोल्हापुर में कैंप स्थापित किया गया जिसने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को शरण दी. इस कैंप ने महिलाओं और बच्चों सहित 5,000 से अधिक पोलिश शरणार्थियों को शरण दी, जो युद्ध में बेसहारा हो चुके थे. कई शरणार्थियों को साइबेरिया और सोवियत संघ के अन्य हिस्सों में निर्वासित कर दिया गया था, जहां उन्हें कठोर मौसम की मार और जबरन श्रम झेलना पड़ रहा था. 

कोल्हापुर के शिविर ने शरणार्थियों को भोजन, आश्रय और चिकित्सा देखभाल के साथ-साथ शैक्षिक और मनोरंजक सुविधाएं भी प्रदान कीं. शिविर 1950 के दशक की शुरुआत तक कार्यात्मक था, जब कई शरणार्थी अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों में चले गए.

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