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महसा अमीनी (Mahsa amini) की कब्र पर लगी तख्ती में फारसी में कुछ लिखा है. जब हमने इसका मतलब जानने की कोशिश की तो अर्थ निकला, 'जीना डियर...तुम मरोगी नहीं, तुम्हारा नाम एक प्रतीक बनकर रह जाएगा'. 22 साल की महसा अमीनी आज मरकर सचमुच में हिजाब के खिलाफ क्रांति का प्रतीक बन गई हैं. ऐसी क्रांति जिसकी चिंगारी अब तेहरान से निकलकर पूरी दुनिया में फैल रही है और इसकी ताप से ईरान का तख्तनशीं परेशान है.
आज एक महीने हो गए महसा अमीनी उर्फ जीना अमीनी की जिस 'मासूम गुनाह' पर ईरान की मोरैलिटी पुलिस (गश्त-ए-इरशाद) ने उसकी जान ले ली उस 'जुर्म-ए-संगीन' को ईरान की लड़कियां अब खुले आम चौक चौराहों पर कर रही हैं. जी हां, उन्होंने अपने सिर को ढकने वाले स्कॉर्फ को जला दिया है. वे अपने सिर धुन रही हैं, बाल लहरा रही है. ईरानी हुकूमत से प्रतिशोध में अपने बाल काटकर इसे तेहरान के स्क्वायर पर जला रही हैं.
इस आंचल से इक परचम बना लेती...
ईरान की गलियों में आज भारत के मशहूर शायर मजाज लखनवी की वो लड़की उतर आई है जिससे वो अपने शेर में मुखातिब हैं. ऐसी ही बागी लड़की के इरादों में जोश भरते हुए मजाज कहते हैं,
"तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था"
मजाज का पैगाम है कि तुम्हारे माथे आंचल तो खूब जंचता है मगर इसे अपनी कमजोरी मत बनने दे. वक्त का तकाजा है कि आप अपने इस आंचल से क्रांति का झंडा बनाएं और इस परचम को अपने अधिकारों के लिए उठाएं.
महसा अमीनी की मौत ने लोगों की चेतना झकझोर दी है. भारत, अमेरिका, फ्रांस समेत दुनिया के कई मुल्कों की ख्वातिनों ने अपने केश कतर दिए हैं. डॉक्टर, पत्रकार, अभिनेत्री, लेखिका महसा अमीनी की हेतु में शामिल होकर एक स्वर में बोल रही हैं. जीन...जीयन...आजादी. यानी कि वूमन, लाइफ, लिबर्टी. कुर्द की महिलाओं का ये नारा अब ईरान में बगावत का पैगाम हो गया है.
वो 13 सितंबर 2022 की दोपहर थी. ईरान के कुर्दिश बहुल इलाके साकेज की रहने वाली महसा अपने छोटे भाई अस्कान से मिले तेहरान आई थी. तेहरान के एक एक्सप्रेस पर जाने वो कौन सी मनहूस घड़ी थी कि मौरेलिटी पुलिस की नजरें उस पर पड़ गई. महसा फौरन तलब कर ली गई. उसे गश्त ए इरशाद ने गिरफ्तार कर अपने कस्टडी में ले लिया.
मगर उसका कसूर क्या था?
महसा के भाई को बताया गया कि उसने हिजाब ढंग से नहीं पहन रखा था. उसका हिजाब पहनने का सलीका सरकारी स्टैंडर्ड के अनुसार नहीं था, और उसके कुछ बाल दिख रहे थे. पुलिस ने उसे बताया कि महसा को बंदियों के एक कैंप में ले जाया जाएगा जहां उसे ये बताया जाएगा कि हिजाब कैसे पहनना चाहिए, फिर एक घंटे बाद उसे छोड़ दिया जाएगा. महसा के भाई के लिए घंटे भर का ये एक ऐसा इंतजार था जो ताजिंदगी जारी रहने वाला था.
हिजाब, सलीका और सरकार
महसा पर पुलिस कस्टडी में क्या गुजरी ये बताने से पहले हम आपको बताते हैं कि ईरान में ये मौरेलिटी पुलिस है क्या? हिजाब पहनने का कोई सरकारी तरीका भी होता है क्या? 1979 में ईरान की क्रांति महिलाओं के लिए बंदिशें लेकर आई. ईरानी सरकार ने महिलाओं के लिए ड्रेसकोड लागू कर दिया. देश के सबसे बड़े नेता खुमैनी ने हिजाब को महिलाओं के लिए अनिवार्य कर दिया. इस्लामिक व्याख्या के अनुसार इसे पहनने का तरीका और सलीका भी बताया गया. सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं का बिना हिजाब के जाना गुनाह घोषित कर दिया गया.
इसी कानून को सख्ती से लागू कराने का जिम्मा मौरेलिटी पुलिस यानी कि गश्त-ए-इरशाद के जिम्मे हैं. जिसे उन महिलाओं को 74 कोड़े लगाने का भी अधिकार है जिन्होंने इस पुलिस की समझ के मुताबिक तरीके से हिजाब नहीं पहना है. इस फौज को गाइडेंस पेट्रोल भी कहते हैं.
किसके कपड़े टाइट, किसके ओवरकोट छोटे
1979 के पहले ईरान के शासक शाह पहलवी के जमाने में स्वछंद जीवने जीने वाली ईरानी की आज की महिलाओं को इस पुलिस की निगाहें स्कैन करती रहती है. किसके बाल स्कॉर्फ से बाहर हैं? लड़कियों के पैंट और ओवरकोट छोटे तो नहीं, यूनिवर्सिटी जा रही किसी छात्रा के कपड़े टाइट तो नहीं.
मोटे तौर पर इस पुलिस का काम बाहर निकलने वाली महिलाओं के पहनावे और हिजाब की निगरानी करना है. ईरान की सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में ऐसे कामों के लिए 1180 बिलियन ईरानी रियाल (सितंबर 2022 तक 3.9 मिलियन डॉलर) का बजट जारी किया है.
सब्जेक्टिव है कपड़ों की साइज और रेंज मामला
ईरान की सरकार ने कानून तो बना दिया है. लेकिन इसके अनुपालन की जिम्मेदारी मौरेलिटी पुलिस को देखकर हुक्मरान ने लड़कियों के शोषण की भरपूर गुंजाइश छोड़ दी है. सवाल है कि इस कानून का पालन हो कैसे? ओवरकोट के ढीले या टाइट होने का मामला पूरी तरह से सब्जेक्टिव यानी कि लड़कियों के निजी पसंद पसंद का मुद्दा है.
एक कपड़ा जो कुछ सेंटीमीटर की ज्यादा चौड़ाई में किसी को ढीला लगता है वही लिबास दूसरों की नजर में टाइट हो सकता है. आखिर ये तय कैसे हो? जो कपड़ा किसी लड़की को सही जंचता है वही पोशाक गाइडेंस पेट्रोल को छोटा लग सकता है. इसकी सर्वमान्य व्याख्या कैसे तय हो सकती है.
यही नहीं मौरेलिटी पुलिस को कपड़ों की तड़क-भड़क से भी परेशानी है. जिस रंग के कपड़े किसी को फबते हों, हो सकता है वही कपड़ा दूसरे की नजर में भड़काऊ हो. यही वजह है कि ईरान में गाइडेंस पेट्रोल इन प्रावधानों की आड़ में खूब शोषण करते हैं.
इसी व्याख्या में गई महसा की जान
13 सितंबर को महसा अमीनी जब तेहरान में थी तो उस पर ऐसे ही किसी सनकी पेट्रोल पुलिस की नजर पड़ गई. एजेंसी रिपोर्ट के अनुसार महसा को कहा गया कि हिजाब से उसके बाल दिख रहे हैं और वो ढीले हैं. गश्त-ए-इरशाद ने महसा को कहा कि उसे हिजाब पहनने के नियमों के बारे में ब्रीफ किया जाएगा.
जब ये पुलिस महसा को पकड़कर ले जाने लगी तो वैन में उसे बेरहमी से पीटा गया. महसा के साथ गिरफ्तार की गई दूसरी लड़कियों ने मीडिया को बताया कि न सिर्फ बुरी तरह से पीटा गया बल्कि अपमानित भी किया गया.
थाने में ही महसा की नजर धुंधली होने लगी और वो बेहोश हो गई, कुछ देर में महसा कोमा में चली गई. महसा के भाई को बताया गया कि उसकी बहन को हार्ट अटैक आया है. महसा की गिरफ्तारी के दो घंटे बाद उसे कसरा हॉस्पिटल ले जाया गया.
48 घंटे कोमा में रही महसा
महसा दो दिनों तक यानी कि 14 और 15 सितंबर को तेहरान के कसरा अस्पताल में कोमा में रही. 16 सितंबर 2022 को मां-बाप की इकलौती बेटी और लॉ पढ़कर वकालत करने की ख्वाहिश रखने वाली महसा हॉस्पिटल के आईसीयू से दुनिया छोड़कर चली गई.
महसा के साथ गिरफ्तार लड़कियों का कहना है कि उसकी मौत पुलिस बर्बरता से हुई. महसा के साथ गिरफ्तार महिलाओं ने कहा कि जब इसके अलावा मीडिया में लीक सीटी स्कैन की रिपोर्ट भी कहती है कि अमीनी को ब्रेन हैमरेज हुआ था.
महसा की मौत पर उबल पड़ा तेहरान
महसा अमीनी की मौत की खबर जैसे ही अस्पताल से बाहर आई, ईरान में सियासी जलजला आ गया. तेहरान में लोगों ने अस्पताल को घेर लिया. नारेबाजी होने लगी. पुलिस को मिर्च पाउडर स्प्रे करना पड़ा. देखते ही देखते ये प्रदर्शन ईरान के कई शहरों में फैल गया. जल्द ही महसा के गृहनगर साकेज में लोग सड़कों पर निकल आए और Death to the dictator और woman, life, freedom के नारे लगाने लगे.
पुलिस ने दमन दिखाया और गोलियों की बौछार कर दी. ईरान ह्युमन राइट का कहना है कि पुलिस की फायरिंग में 8 अक्टूबर तक 185 लोग मारे जा चुके हैं. इस आंकड़ों में ईरान के दर्जनों युवा सपने हैं, लड़के हैं, आजादख्याली का सपना लिए लड़िकयां हैं. लेकिन उनके घरों में अब मौत की सिसकियां हैं. घायलों की संख्या तो हजारों में हैं.
कॉलेज, स्कूल, ऑयल फील्ड तक पहुंचा प्रदर्शन
गश्त ए इरशाद के खिलाफ मानो ईरानी जनता से गुस्से को अपने दिलों में लावे की तरह जमा कर रखा था जो महसा की हत्या के बाद पैदा हुए ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा. तेहरान में यूनिवर्सिटी, कॉलेज स्कूल में प्रोटेस्ट होने लगा. लड़कियां क्लास में बिना हिजाब के आने लगी. अपने बाल लहराती छात्राएं फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रही हैं. ये तस्वीरें ईरान की एंटी हिजाब क्रांति का प्रतीक बन गई हैं. यही नहीं ईरान के ऑयल फील्ड में काम करने वाला मजदूर तबका भी सरकार विरोधी इस आंदोलन में शामिल हो गया है.
सोशल की दुनिया से फूटा संवेदनाओं का सोता
महसा असमय ही इस दुनिया से चली गई, लेकिन उसकी मौत ने सोशल मीडिया पर बवंडर पैदा कर दिया. #MahsaAmini परशियन ट्विटर पर सबसे ज्यादा रिपीट होने वाला हैशटैग बन गया. इससे जुड़े ट्वीट और रीट्वीट की संख्या 80 मिलियन तक चली गई. इस विरोध का असर इतना व्यापक था कि ईरान की सरकार ने कई जगहों पर इंटरनेट बैन कर दिया. प्रदर्शन और बगावत फैल न पाए इस खातिर सरकार ने कुर्दिस्तान और अन्य इलाकों में व्हाटसएप और इंस्टाग्राम का इंटरनेट एक्सेस ब्लॉक कर दिया.
These schoolgirls have been forced to wear these headscarves from the age 7.
— Masih Alinejad 🏳️ (@AlinejadMasih) October 12, 2022
Today in Tehran they are waving their hijab in the air to say NO to Islamic Republic.
The man who took the video says; their bravery encouraged many people to join the protest.#MahsaAmini#مهسا_امینی pic.twitter.com/CdAGXzK8BN
दुनिया भर की हस्तियों ने महशा अमीनी के लिए न्याय की मांग का समर्थन किया. UN ने इसे हत्या करार दिया और इसकी स्वंतत्र जांच की मांग की.
हैरी पोटर की लेखिका जेके रॉलिंग ने ट्वीटर पर लिखा, 'महसा अमीनी 22 साल की उम्र में पुलिस कस्टडी में मर गईं क्योंकि उन्होंने हिजाब नियमों का उल्लंघन किया था. अब बाकी दुनिया को उनका नाम पुकारते रहना चाहिए.'
ईरान के पूर्व स्टार फुलबॉलर अली करीमी ने सरकार के खिलाफ गुस्सा उगलते हुए लिखा, 'जमजम का पानी भी तुम्हारे इस बेकद्री और कंलक को नहीं धो सकेगी.'
ये अधिकार यूनिवर्सल हैं
11 अक्टूबर को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रदर्शन कर रही ईरान की लड़कियों की तारीफ की और कहा कि आपने दिखा दिया है कि अन्याय को नहीं सहा जाना चाहिए. ओबामा ने कहा कि ईरान की लड़कियां जिन अधिकारों के लिए लड़ रही हैं वो सार्वभौम हैं, एक लड़की कैसा दिखना चाहती है, क्या पहनना चाहती है और अपना पहचान कैसे व्यक्त करना चाहती है इसका अधिकार उसी के पास होना चाहिए. इन लड़कियों को बिना भय दबाव और हिंसा के ऐसा करने की आजादी होनी चाहिए.
ओबामा के अलावा जर्मनी के चांसलर, अमेरिका के राष्ट्रपति, चिली के राष्ट्रपति समेत कई गैर सरकारी संगठनों ने लड़कियों के खिलाफ हिंसा के प्रयोग की निंदा की.
भारत की विडंबना
ये बड़ा विचित्र समय है कि जिस हिजाब से मुक्ति के लिए ईरान में इंकलाब का नारा बुलंद है. उसी हिजाब पर भारत में न सिर्फ सियासत बल्कि न्याय के पायदान पर मौजूद सर्वोच्च संस्था भी बंटी हुई है. भारत में हिजाब से जुड़ा सवाल लड़कियों की पंसद और सरकार के कानून बनाने के अधिकार के बीच फंस गया है. भारत के कर्नाटक में लड़कियों को हिजाब पहनने की स्वतंत्रता होगी या नहीं इसका फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी अदालत करेगी.
उसके बाल कितने सुंदर थे
महसा अमीनी की मौत ने ईरान में 1979 की 'धार्मिक क्रांति' की पृष्ठभूमि पर लिखी गई उन पंक्तियों को फिर से जिंदा कर दिया है जहां ईरानी लेखिका Moniro Ravanipour अपने उपन्यास These Crazy Nights में लिखती हैं, "वह नहीं चाहती हैं एक क्रांतिकारी बनना, इस क्रांति ने उसे बदसूरत बना दिया, उसे ढक दिया, उसके बाल कितने सुंदर थे जिन्हें उसे छुपाना पड़ा, उसके पैर कितने खूबसूरत थे जिन्हें उसे ढकना पड़ा."