scorecardresearch
 

जिहादियों की ऑनलाइन भर्ती से लेकर फंडिंग जुटाने तक, आतंकी गुट ISIS ने ऐसे किया सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल, सीरिया में था मीडिया हेडक्वार्टर

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) भले ही कट्टरपंथ की बातें करता था लेकिन आतंकियों की भर्ती वो ऑनलाइन करता था. इसके लिए बाकायदा उसके पास मीडिया विंग थी. अल-हयात मीडिया सेंटर नाम की ये शाखा लगातार अपनी सोच, तौर-तरीकों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालती. उसने फेसबुक से लेकर ट्विटर और इंस्टाग्राम तक पर अपना जाल बिछा रखा था, वो भी खुले में.

Advertisement
X
ISIS के दौर में सीरिया में दूसरे धर्मों की सारी निशानियां ध्वस्त कर दी गईं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
ISIS के दौर में सीरिया में दूसरे धर्मों की सारी निशानियां ध्वस्त कर दी गईं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

द केरला स्टोरी फिल्म की रिलीज डेट करीब आ चुकी. इसके साथ ही जो शब्द चर्चा में है, वो है इस्लामिक स्टेट यानी आईएसआईएस. इराक और सीरिया से पूरी दुनिया में आतंक फैलाते इस गुट के तौर-तरीके खासे आधुनिक थे. वो सोशल मीडिया पर ऐसी बातें लिखता, ऐसी वीडियो डालता कि लोग खिंचे चले आएं. किसी भी टेररिस्ट संगठन से पहले ISIS ने सोशल मीडिया की ताकत पहचान ली थी. जब तक सरकार या मीडिया प्लेटफॉर्म्स उसकी चाल समझ सकें, उसने अपना जाल बिछा भी दिया था. 

Advertisement

कहां था मीडिया सेंटर और कैसे करता था काम?

अल-हयात मीडिया सेंटर सीरिया के राका शहर में था. ये एक तरह से ISIS की राजधानी था, जहां से सीरिया और इराक दोनों का काम चलता. साल 2014 से 2017 तक राका में अल-हयात ने जमकर काम किया. इसकी बिल्कुल सही लोकेशन तो किसी को नहीं पता, लेकिन माना जाता है कि वो शहर के बीचों-बीच किलेनुमा कोई इमारत होगी. असल में इस्लामिक स्टेट के दौर में बहुत सी बिल्डिंगों में गोपनीय काम चलते रहते, तो पता लगना मुश्किल था कि कहां, क्या होता है. इमारतों पर कड़ा पहरा भी होता था. 

क्या कभी इंटरनेशनल मीडिया ने इस पर ऊंगली उठाई?

वो दौर इस्लामिक स्टेट का था. पूरी दुनिया में आतंक का माहौल बना हुआ था. खासकर उनके चरमपंथी रंग-ढंग लोगों को डराए हुए थे. किसी की पत्रकार का सीरिया या इराक जाकर खुलेआम रिपोर्ट करना आसान नहीं था. इसी दौर में सीक्रेट तरीकों से अल-हयात पर कई जानकारियां निकालीं.

Advertisement
islamic state of iran and syria used social media platforms for online recruitment of jihadis
सीरिया के राका में किसी खुफिया इमारत-में सोशल मीडिया वॉर चलता रहता.  सांकेतिक फोटो (Pixabay)

स्काई न्यूज के लोगों ने ये जगह विजिट भी की और एक रिपोर्ट निकाली. द ISIS प्रोपेगंडा मशीन- इनसाइड ए ब्रिगेड्स प्रॉडक्शन सेंटर नाम से आई रिपोर्ट में वहां बनने वाले वीडियो फुटेज और काम करने वालों के इंटरव्यू तक थे. यूनाइटेड नेशन्स की काउंटर-टेररिज्म कमेटी ने भी इस जगह पर तैयार होते खौफनाक इरादों पर एक रिपोर्ट निकाली थी, जिसमें आतंकियों के सोशल मीडिया तरीकों को फेल करने की तोड़ भी बताई गई थी. 

कौन काम करता था वहां?

चरमपंथी गुट अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ था. इसका बड़ा हिस्सा जेहादियों का था, जो लड़ाकों का काम करते. हथियारों के जरिए आतंक फैलाना इनका काम था. वहीं एक समूह ऐसा था, जो इंटरनेट के जरिए एक साथ कई काम करता. ये अल-हयात था, जो संगठन के लिए फंड भी जुटाता और लोगों की भर्तियां भी करता. इसके लिए खास लोग काम करते थे, जो इंटरनेट के बारे में बहुत कुछ जानते. वे जानते थे कि लोगों को कैसे फंसाया जा सकता है. ये एक तरह से साइकोलॉजिकल वॉर करते और लोगों का मन बदलकर उन्हें अपने संगठन में शामिल होने के लिए मना लेते थे. 

सोशल मीडिया मालिकों ने क्यों नहीं कसी लगाम?

असल में 2014 में जब इस्लामिक स्टेट ने ये सब तामझाम रचा, तब तक किसी को अंदाजा भी नहीं था कि आतंकी भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं. उनके पास ऐसी कोई पॉलिसी या नियम नहीं था, जो उन्हें रोक सके. टेररिस्ट सीधे-सीधे हत्या या बम-धमाके की बात नहीं करते थे, बल्कि विक्टिम-कार्ड खेलते. वे बताते थे कि वेस्ट की ज्यादतियों के चलते वे कितने खराब हालातों में रह रहे हैं और अब उन्हें लोगों के साथ की जरूरत है. धार्मिक संदेश दिया करते. 

Advertisement
islamic state of iran and syria used social media platforms for online recruitment of jihadis
ट्रेंड आतंकी अल-हयात में सोशल मीडिया संभाला करते. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

जब खुफिया संदेशों की बात आती तो वे इन्क्रिप्शन तकनीक का इस्तेमाल करते. इससे मैसेज सेंडर से रिसीवर तक ही पहुंचता था. बीच में कोई उसे देख नहीं पाता था. 

किस तरह होती थी जेहादियों की भर्ती?

- अल-हयात मीडिया सेंटर बहुत ही शानदार क्वालिटी के वीडियो-ऑडियो बनाता. ये इस तरह से डिजाइन होते थे कि लोगों को धक्का पहुंचाएं या उन्हें उकसाएं. 

- वीडियो में चरमपंथी समूह की लड़कियां वेस्ट के हाथों प्रताड़ित दिखाई जातीं. वे बतातीं कि कैसे उनके साथ गलत हुआ और किस तरह ISIS ने उनकी मदद की. 

- अक्सर युवा एड्रेनिल रश की तलाश में होते हैं. आतंकी समूह उन्हें इसके लिए उकसाता. वो बताता कि उनसे जुड़ने पर लोग इंसाफ की लड़ाई लड़ सकेंगे. 

- फाइनेंशियल इंसेटिव भी बड़ी वजह था. सोशल मीडिया पर गरीब तबकों को पहचानकर, उन्हें पैसे, नौकरी या मकान दिलवाने का वादा किया जाता और बदले में अपने साथ जुड़ने की शर्त रखी जाती. 

ये आतंकवादी संगठन भी करते रहे सोशल मीडिया का उपयोग

इस्लामिक स्टेट के अलावा भी कई आतंकी संगठन हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया को अपनाया ताकि अपने हित पूरे कर सकें. ग्लोबल टेररिज्म डेटाबेस (GTD) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2012 से 2019 के बीच कई आतंकी गुटों ने खुद को फैलाने के लिए इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया. GTD की मानें तो सबसे ज्यादा लोगों ने यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर को खंगाला. ट्रेंड आतंकवादी इसके जरिए लोगों की भर्तियां और छुटपुट फंड रेजिंग किया करते. धीरे-धीरे वे ज्यादा संगठित होते गए. इसमें अलकायदा, बोको हराम, हिजबुल्लाह से लेकर तालिबानी ताकतें भी शामिल रहीं.

Advertisement
Advertisement