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Israel-Hamas War: 'आम नागरिक भी लड़ने को तैयार, उन्हें भी बंदूकें दे सरकार', इजरायल के पूर्व PM नेफ्टाली बेनेट की अपील

इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्टाली बेनेट ने सरकार से अपील है कि आम लोगों को अपने इलाकों के बारे में सेना से ज्यादा जानकारी है, इसलिए बस्तियों में लोगों बंदूकें दे देनी चाहिए. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि मैं सरकार से सार्वजनिक रूप से नहीं, बल्कि शांत माध्यमों से ही मांग करता हूं.

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इजरायल के पूर्व पीएम नेफ्टाली बेनेट (फाइल फोटो)
इजरायल के पूर्व पीएम नेफ्टाली बेनेट (फाइल फोटो)

इजरायल में हर घंटे इमरजेंसी का अलार्म बज रहा है. वहीं गाजा पट्टी में इजरायली सेना का बारूदी हवाई हमला नॉनस्टॉप जारी है. इजारयल और हमास के सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों घायल हैं. इस बीच इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्टाली बेनेट ने सरकार से अपील है कि आम लोगों को अपने इलाकों के बारे में सेना से ज्यादा जानकारी है, इसलिए बस्तियों में लोगों बंदूकें दे देनी चाहिए.

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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, "मैं सरकार से सार्वजनिक रूप से नहीं, बल्कि शांत माध्यमों से ही मांग करता हूं, लेकिन यह मुद्दा जीवन बचाने के लिए जरूरी है और दुर्भाग्य से मैं शायद ही इस पर आगे बढ़ सकता हूं. इजरायली सरकार को तुरंत इजरायल के हर इलाके और हर पड़ोस को लंबे हथियारों और छोटे हथियारों से लैस करना चाहिए ताकि अतिरिक्त इकाइयां लड़ सकें.

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'नागरिक लड़ने के लिए तैयार'

नेफ्टाली ने आगे कहा, "मुझे कम अपेक्षित दिशाओं से हमलों का डर है. यह कोचाव येर, मेशगाव या रबाविड में हो सकता है. हमारे पास ऐसे नागरिक हैं जो नियमित लड़ाकू, बहादुर और लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन हथियारों और गोला-बारूद के बिना वे नहीं लड़ सकते. निःसंदेह, उत्तर और दक्षिण में बाड़ से सटी बस्तियों, यहूदी समुदाय के लिए पृथक्करण बाड़ से सटी बस्तियों, स्वयं यहूदी समुदाय समुदायों, गलील में समुदायों और अन्य को प्राथमिकता दें."

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'आईडीएफ आने से पहले तक नागरिक ही लड़ते रहे'

उन्होंने कुछ फैक्ट्स देते हुए कहा कि यहां एक तथ्य है जो आपको जानना चाहिए. जो लोग वास्तव में बस्तियों में लड़े और दुश्मन को खदेड़ दिया, वे स्टैंडबाय वर्ग से थे. कुछ मामलों में पूर्ण सफलता के साथ: नीर अम, अलुमिम, साद, मेफल्सिम और अन्य, कुछ में दुर्भाग्य से स्टैंडबाय दस्ते लड़े और युद्ध में उतर गए. बस्ती के बाशिंदे ही हैं जो लड़ते रहे. आईडीएफ बल बहुत बाद में पहुंचे. ऐसी कोई सफल, अनुभवी ताकत नहीं है जो बस्ती को वहां के निवासियों से बेहतर जानती हो. इसलिए आज हमें बंदूकें दो.

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