पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ का 79 साल की उम्र में दुबई के अमेरिकन अस्पताल में निधन हो गया. मुशर्रफ 1999 में सैन्य तख्तापलट कर सत्ता में आए थे. मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तान ने कई ऐसे फैसले लिए जो अमेरिका के हित में थे. इस बात से पाकिस्तान के कई आतंकी संगठन मुशर्रफ से नाराज हो गए थे. 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका पर अल कायदा के हमलों के बाद मुशर्रफ ने ओसामा बिन लादेन को शरण देने वाले तालिबान का समर्थन न करने का फैसला किया. उनके इस निर्णय के चलते पाकिस्तानी आतंकी संगठन उनसे काफी नाराज हो गए थे. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक मुशर्रफ पर तीन बार आतंकी हमले हुए थे.
14 दिसंबर 2003 को मुशर्रफ की हत्या करने की कोशिश की गई थी. इसमें वह बाल-बाल बच गए थे. उन्होंने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा में भी किया है. उन्होंने बताया था कि इस्लामाबाद के नजदीक रावलपिंडी के गैरीसन इलाके में उनका काफिला एक ब्रिज से गुजरा था. उनके काफिले के गुजरते समय ही पुल पर जोरदार धमाका हुआ था, जिसमें उनकी कार के परखच्चे उड़ा गए थे, हालांकि वे हमले में बाल-बाल बच गए थे.
25 दिसंबर 2003 को यानी पहले हमले के दो सप्ताह के अंदर ही मुशर्रफ को दूसरी बार कत्ल करने की कोशिश की गई. उन पर हमला उसी ब्रिज पर हुआ था, जिस पुल पर पहला हमला हुआ था. उनके काफिले पर ट्रक से आत्मघाती हमला किया गया. इस हमले में 14 लोग मारे गए. मुशर्रफ की कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई. वह जब अपने घर पहुंचे थे तो उनके शरीर पर खून के छींटे लगे हुए थे.
अक्टूबर 2003 में एक पाकिस्तानी अदालत ने तीन आतंकियों को अप्रैल 2002 में मुशर्रफ के खिलाफ हत्या की साजिश में शामिल होने का दोषी ठहराया था. सभी को 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी. अलकायदा से संबंधित आतंकी हरकत-उल मुजाहिदीन के अल-अल्मी गुट से संबंधित थे. पाकिस्तान की आतंक विरोधी अदालत ने कहा था कि इन लोगों ने कराची में एक जनसभा को संबोधित करने जा रहे मुशर्रफ को मारने की साजिश रची थी.
साल 2008 में राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान मुशर्रफ पर महाभियोग चलाने की पूरी तैयारी हो गई थी. दो सियासी दल एक मंच पर आकर मुशर्रफ के खिलाफ महाभियोग चलाना चाहते थे, उनकी मांग थी कि या तो मुशर्रफ इस्तीफा दे दें या फिर महाभियोग के लिए तैयार हो जाएं. फैसला काफी कठिन था, लेकिन मुशर्रफ ने महाभियोग का सामना करने की जगह राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा देना ही ठीक समझा और पद छोड़ने के कुछ समय बाद ही ब्रिटेन चले गए.