जस्टिस मारकस स्मिथ की अदालत में नजाज अली बिना किसी वकील की मदद के स्काइप (वीडियो कॉल) से पेश हुए. अली ने जस्टिस स्मिथ के 2 अक्टूबर 2019 को सुनाए गए फैसले को चुनौती दी. इस फैसले में निजाम के पोतों को वैध वारिस घोषित किया गया. ऐसा भारत सरकार की ओर से निजाम के पोतों के साथ किए प्राइवेट समझौते को देखते हुए किया गया.
इस व्यवस्था पर आपत्ति करते हुए अली ने कहा, "उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि एस्टेट के प्रशासक की ओर से कौन सा तर्क और तरीका भारत और शहजादों (निजाम के पोतों) के बीच गोपनीय समझौते को लेकर अपनाया गया.”
ये विवाद भारत के बंटवारे के समय से ही शुरू हो गया था. 1948 में, हैदराबाद के निजाम आसफ जाह ने ब्रिटेन में तत्कालीन पाकिस्तान उच्चायुक्त के लंदन खाते में 10 लाख पाउंड और एक गिन्नी जमा कराए थे. ये ऐसे फंड के तौर पर जमा कराए गए थे कि अगर आक्रमण होता है तो भारत से हैदराबाद के ‘हितों को सुरक्षित रखने के विश्वास’ के तौर पर काम आए. उस समय, हैदराबाद की रियासत भारत सरकार के अधीन नहीं थी.
हालांकि, कुछ दिनों बाद, निज़ाम ने इस बात से इनकार किया कि फंड उनकी सहमति से ट्रांसफर किया गया था और बैंक से उन्होंने इसे वापस मांगा. लेकिन बैंक ने अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि पैसा निजाम के नाम पर नहीं था. बैंक ने कहा कि पाकिस्तान के समझौते के बिना फंड को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता था, जिसके पास अब फंड का लीगल टाइटल था.
निज़ाम ने 1950 के दशक में बैंक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की. यह मामला हाउस ऑफ लॉर्ड्स तक पहुंच गया, जिसने ये माना कि फंड का स्वामित्व किसके पास है, इसका फैसला नहीं किया जा सकता क्योंकि पाकिस्तान ने संप्रभु प्रतिरक्षा (इम्युनिटी) हासिल होने का दावा किया था.
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तब से ये पैसा लंदन के बैंक में फ्रीज हो गया. यह फंड अब ब्रिटेन के नैटवेस्ट बैंक में साढ़े तीन करोड़ पाउंड तक पहुंच चुका है.
2013 में, पाकिस्तान ने संप्रभु प्रतिरक्षा को हटाते हुए फंड के लिए दावा जारी किया. इसमे मौजूदा केस का रास्ता खुला. इस मामले में, अहम सवाल यह था कि मूल ट्रांसफर के बाद फंड का लाभार्थी होने का हकदार कौन था, निज़ाम या पाकिस्तान?
निज़ाम के अंतिम और सातवें पोते मुक्करम जाह अब तुर्की में रहते हैं. उन्होंने फंड को हासिल करने के लिए मुकदमे को आगे बढ़ाया. इस मामले में पैसे का दावा करने के लिए राजी किया. भारत सरकार और निजाम खानदान के बीच आखिरकार समझौता हुआ और भारत ने फंड पर निजाम के दावे का समर्थन किया.
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जस्टिस स्मिथ आखिर इस फैसले पर पहुंचे, "मैंने पहले ही फैसला कर लिया है कि भारत और शहजादों को पैसे का अधिकार है." उन्होंने आगे कहा, "तथ्य यह है कि पैसा पहले ही दिया जा चुका है. ऐसा कोई आधार नहीं है कि जो आदेश ट्रायल के बाद मैंने दिया, उसे मेरी ओर से दोबारा खोला जाए.’’