इस समय पूरी दुनियाभर में आबादी पर चर्चा की जा रही है. भारत इसी साल चीन को पछाड़कर आबादी के मामले में पहले पायदान पर पहुंच गया है. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या को लेकर एक और बयान दिया है, जिस पर यह विषय एक बार फिर चर्चा में आ गया है.
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि एक दंपति को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी समाज में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर 2.1 से नीचे आ जाती है तो वो अपने आप ही खत्म हो जाता है. इस समय भारत में फर्टिलिटी रेट 2.0 है. फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर का मतलब होता है कि एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म दे रही है.
लेकिन सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में फर्टिलिटी रेट में गिरावट आ रही है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 60 के दशक में दुनियाभर में एवरेज फर्टिलिटी रेट 5 से ज्यादा थी. अभी दुनिया में औसत फर्टिलिटी रेट 2.3 है. दुनिया के कई देश तो ऐसे हैं जहां फर्टिलिटी रेट एक से भी कम हो गई है.
फर्टिलिटी रेट बढ़ाने के लिए सरकारें कई तरह की तरकीबें अपना रहीं हैं. चीन की 'वन चाइल्ड पॉलिसी' अब 'थ्री चाइल्ड पॉलिसी' में तब्दील हो गई है. ज्यादा बच्चे पैदा करने पर इंसेंटिव, बोनस और सुविधाओं को प्रलोभन दिया जा रहा है. जापान में सब्सिडी, डेकेयर और जॉब सिक्योरिटी के वादे किए जा रहे हैं. साउथ कोरिया की सरकार बच्चे पैदा करने वाले परिवारों की मदद के लिए 200 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुकी है. लेकिन ये सारी तरकीबें काम नहीं आ रहीं हैं और फर्टिलिटी रेट लगतार घट रही है.
क्या गायब हो जाएगा साउथ कोरिया?
गिरती फर्टिलिटी रेट का सबसे बुरा असर साउथ कोरिया पर हो रहा है. साउथ कोरिया में फर्टिलिटी रेट 0.72 पहुंच गई है और ऐसी आशंका है कि 2100 तक यहां की आबादी आधी हो जाएगी.
बढ़ती आबादी को थामने के लिए साउथ कोरिया ने 60 के दशक में फैमिली प्लानिंग पर जोर दिया था. इससे यहां बढ़ती आबादी की रफ्तार धीमी पड़ी और अर्थव्यवस्था ने तेजी पकड़ी. लेकिन 1983 के बाद से यहां फर्टिलिटी रेट लगातार गिरती गई. ऐसा अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक साउथ कोरिया की आबादी सिर्फ 1.7 करोड़ हो जाएगी. कुछ स्टडीज में तो ऐसा भी अनुमान है कि 2100 तक इस देश की 70 फीसदी आबादी खत्म हो जाएगी.
जन्मदर बढ़ाने और लोगों को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए साउथ कोरिया ने कई तरकीबें आजमाई हैं. यहां बच्चों को संभालने के लिए लोग विदेशी लोगों को नौकरी पर रख सकते हैं. ज्यादा बच्चे पैदा करने पर टैक्स में छूट मिलती है. और तो और अगर 30 साल की उम्र से पहले तक तीन या उससे ज्यादा बच्चे पैदा किए तो सेना में सर्विस करने से भी छूट मिलती है. अभी साउथ कोरिया में हर व्यक्ति को सेना में सर्विस करना जरूरी है. लेकिन इसके बाद भी यहां लोग बच्चे पैदा करने के लिए बहुत ज्यादा उत्साह नहीं दिखा रहे हैं.
साउथ कोरिया की सरकार बच्चे पैदा करने वाले परिवारों की मदद के लिए 200 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुकी है. लेकिन ये सारी तरकीबें काम नहीं आ रहीं हैं.
चीन भी नीतियां बदलने को मजबूर
घटती जन्मदर से चीन भी जूझ रहा है. चीन के लिए घटती आबादी उसकी चिंता बढ़ाती जा रही है. यही वजह है कि वहां कई सालों से शादी और बच्चे पैदा करने के लिए लुभावनी योजनाएं लाईं जा रहीं हैं. चीन के लिए एक चिंता की बात ये भी है कि जन्म दर कम होने से युवा आबादी घट रही है और बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है.
चीन के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में देश में जन्म दर प्रति हजार लोगों पर 6.77 थी, जबकि 2021 में ये 7.52 थी. 1949 के बाद ये पहली बार था जब चीन में जन्म दर में गिरावट आई.
1980 में 'वन चाइल्ड पॉलिसी' लागू की. इससे आबादी की रफ्तार तो थमी, लेकिन इसके नतीजे उल्टे भी पड़े. चीन में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ने लगी. इससे निपटने के लिए चीन ने बाद में 'टू चाइल्ड पॉलिसी' लागू की, लेकिन इसका भी कोई खास असर नहीं दिखा. लोग एक बच्चा ही पैदा कर रहे थे और सीमित जिम्मेदारी या जिम्मेदारी मुक्त हो चुका समाज दूसरा बच्चा नहीं चाहता था. दूसरे बच्चे का सामान्य सा अर्थ है जिम्मेदारियों में इजाफा और खर्चे में बढ़ोतरी.
दो साल पहले ही चीन ने 'थ्री चाइल्ड पॉलिसी' को लागू किया है. हालांकि, इसके बावजूद जन्म दर में गिरावट जारी है. अब वहां हालात ऐसे हैं कि परिवारों के लिए ज्यादा बच्चे पालना न तो आर्थिक तौर पर आसान है और न ही मानसिक तौर पर.
आबादी बढ़ाने के लिए चीन की सरकार नई-नई तरकीबें आजमा रहीं हैं. चीन में पहले सिर्फ शादीशुदा लड़कियों को ही मां बनने की मंजूरी थी, लेकिन इसी साल जनवरी में सरकार ने बिनब्याही लड़कियों को भी मां बनने की कानूनी मंजूरी दे दी गई है. इसके अलावा युवाओं को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से टैक्स में छूट, घर खरीदने में छूट और तीसरा बच्चा पैदा करने पर मुफ्त या सब्सिडी वाली शिक्षा शामिल है.
रूस में सेक्स मिनिस्ट्री खोलने पर विचार
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, फर्टिलिटी रेट 2.1 होनी चाहिए. ऐसा इसलिए ताकि पीढ़ी आगे बढ़ सके. लेकिन ज्यादातर देशों में अब फर्टिलिटी रेट 2 से भी कम हो गई है. रूस में भी फर्टिलिटी रेट 1.4 पर आ गई है.
घटती फर्टिलिटी रेट को बढ़ाने के लिए कई तरह की तरकीबें अपनाई जा रहीं हैं. रूस में हाल ही में 'सेक्स एट वर्कप्लेस' का प्रस्ताव रखा गया था. इसके तहत लोगों को सुझाया गया था कि वो ऑफिस में लंच या कॉफी ब्रेक लेकर सेक्स करें और बच्चे पैदा करें.
हाल ही में खबर आई थी कि घटती फर्टिलिटी रेट को बढ़ाने के लिए रूस अब 'सेक्स मिनिस्ट्री' बनाने की सोच रहा है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की करीबी नीना ओस्तानिया 'सेक्स मिनिस्ट्री' खोलने के प्रस्ताव का रिव्यू कर रही हैं.
इटली भी अछूता नहीं
यूरोपीय देश इटली में भी गिरती फर्टिलिटी रेट के संकट का सामना करना पड़ रहा है. हाल ही में इटली की सरकार ने बताया था कि देश में कम बच्चे पैदा हो रहे हैं. इटली की सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जनवरी से जुलाई के बीच पिछले साल की तुलना में 2.1 फीसदी कम बच्चे पैदा हुए. इटली में इसे 'नेशनल इमरजेंसी' माना जाता है.
2023 में इटली में 3.79 लाख बच्चों का जन्म हुआ था. ये 2022 की तुलना में 3.4 फीसदी और 2008 की तुलना में 34 फीसदी कम था. इटली में फर्टिलिटी रेट मात्र 1.2 है.
यूरोप के बाकी देशों की तुलना में इटली में फर्टिलिटी रेट सबसे ज्यादा कम है. युवाओं को शादी और ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उत्साहित करने के लिए सरकार अरबों डॉलर खर्च कर रही है. इसके लिए सरकार ने इस साल के बजट में 1 अरब यूरो का फंड रखा था.
इटली में परमानेंट कर्मचारियों को हर साल 3 हजार यूरो सोशल सिक्योरिटी के लिए देने पड़ते हैं. लेकिन अगर दो या उससे ज्यादा बच्चे हैं तो ऐसी महिलाओं को इस कंट्रीब्यूशन से छूट मिलती है. इतना ही नहीं, बच्चा पैदा होने पर माता-पिता को पैरेंटल लीव के दौरान मिलने वाला अलाउंस भी 80 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है.
इटली में कामकाजी माता-पिता 11 महीने तक पैरेंटल लीव ले सकते हैं. इस दौरान उन्हें उनकी सैलरी का 80 फीसदी तक मिलता है. जबकि पहले ये 60 फीसदी ही था. इटली की सरकार ने 10 साल से कम उम्र तक के बच्चों के लिए मिलने वाला किंडरगार्टन बोनस भी बढ़ाकर 3,600 यूरो कर दिया है.
कितनी चिंता बढ़ाती है ये बात?
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की एक रिपोर्ट बताती है कि ताइवान में फर्टिलिटी रेट 0.85 तक पहुंच गई है, जिस कारण वहां स्कूल बंद हो रहे हैं. जापान में ये 1.21 है और इस कारण डाइपर की बिक्री घट गई है. ग्रीस में 1.26 है और वहां कई गांवों में सालों से कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ है. इस कारण लोगों को हफ्ते में छह दिन काम करना पड़ रहा है.
साइंस जर्नल लैंसेट में इसी साल मार्च में एक स्टडी छपी थी. ये स्टडी वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने की थी. इसमें 204 देशों की 1950 से 2021 तक की फर्टिलिटी रेट का विश्लेषण किया गया था. साथ ही 2100 का अनुमान भी लगाया गया था. इसमें कहा गया था कि हम एक ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां फर्टिलिटी रेट बहुत कम होगा.
इस स्टडी में अनुमान लगाया गया था कि 2050 तक दुनिया के तीन चौथाई देश ऐसे होंगे, जहां फर्टिलिटी रेट औसत से भी कम होगी. 2100 तक दुनिया के 97% देश ऐसे हो जाएंगे.
लैंसेट में छपी स्टडी बताती है कि आने वाले समय में दुनिया के सिर्फ छह देश ऐसे होंगे, जहां फर्टिलिटी रेट 2.1 या इससे ज्यादा होगा. इसमें सामोआ, सोमालिया, टोंगा, नाइजर, चाड और ताजिकिस्तान हैं. ये सभी अफ्रीकी देश हैं. अभी भी दुनिया में सबसे ज्यादा फर्टिलिटी रेट अफ्रीकी देशों में ही है.
स्टडी के मुताबिक, 2021 तक दुनिया में हर 4 में से 1 बच्चा अफ्रीकी देश में पैदा होता था. साल 2100 तक हर दो में से एक बच्चा अफ्रीकी होगा. बहरहाल, आबादी बढ़ाने के लिए तमाम तरकीबों के बीच 'पॉपुलेशन एक्सचेंज' के आइडिया पर भी विचार चल रहा है. इसमें अगर किसी देश में आबादी नहीं बढ़ रही होगी तो दूसरे देशों के लोगों का बसाया जाएगा और बच्चे पैदा करवाए जाएंगे.